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Tokyo Paralympics: झाझरिया ने अपने पिता को समर्पित किया रजत पदक, बोले- उन्हीं की वजह से मैं यहां तक पहुंचा

Mon, 30 Aug 2021 03:02 PM IST
मुकेश कुमार झा स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, टोक्यो
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देवेंद्र झाझरिया - फोटो : social media
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टोक्यो पैरालंपिक में सिल्वर जीतने वाले देवेंद्र झाझरिया ने अपने पिता को पदक समर्पित किया। उन्होंने कहा कि पिता की वजह से ही मैं यहां तक पहुंचा हूं। मेरे पिता ने मुझे कड़ी मेहनत करने और एक और पदक जीतने के लिए प्रेरित किया। मुझे खुशी है कि आज मैंने उनका सपना पूरा कर दिया। उन्होंने आगे कहा कि उनके प्रयासों ने ही मुझे यहां तक पहुंचाया है। बता दें कि दो बार के स्वर्ण पदक विजेता देवेंद्र झाझरिया ने सोमवार को एफ46 वर्ग में 64.35 मीटर भाला फेंककर टोक्यो में सिल्वर मेडल जीता। एथेंस (2004) और रियो (2016) में स्वर्ण पदक जीतने वाले 40 वर्षीय झाझरिया ने इस दौरान अपना पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ा। झाझरिया के पहले 63.97 मीटर के साथ विश्व रिकॉर्ड दर्ज था। बता दें कि झाझरिया ने आठ साल की उम्र में करंट लगने की वजह से अपना बायां हाथ गंवा दिया था। वहीं, इस स्पर्धा में श्रीलंका के दिनेश प्रियान हेराथ ने 67.79 मीटर भाला फेंककर झाझरिया का स्वर्ण पदक की हैट्रिक पूरी करने का सपना पूरा तोड़ दिया। श्रीलंकाई एथलीट ने इस दौरान झाझरिया का पिछला विश्व रिकॉर्ड भी तोड़ा।

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अपने हौसले की एक और दास्तान दर्ज करवाई
झाझरिया ने ट्वीट कर कहा, 'आज टोक्यो पैरालंपिक में रजत पदक जीतकर पैरालंपिक के इतिहास में एक बार फिर से अपने हौसले की एक और दास्तान दर्ज करवाई। ओलंपिक और पैरालंपिक में तीन व्यक्तिगत पदक प्राप्त कर इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर अपना नाम दर्ज करवाया,आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत आभार।'

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पिता ने कभी निराश नहीं होने दिया

बीते वर्ष अक्तूबर माह में उनके पिता को फेफड़ों का कैंसर निकला। उन्होंने काफी जगह हाथ पैर मारे लेकिन सभी जगह जवाब दे दिया गया। वह पिता के साथ थे उनकी सेवा कर रहे थे। एक दिन पिता ने कहा कि तुम्हारे दो छोटे भाई यहां हैं। दोनों उन्हें संभाल लेंगे, लेकिन तुम यहां रुकोगे तो तुम्हारी तैयारियां प्रभावित होंगी। तुम्हें देश के लिए तीसरा पैरालंपिक स्वर्ण जीतना है जाओ गांधीनगर में तैयारियां करो। इसके बाद देवेंद्र जयपुर से गांधीनगर आ गए, लेकिन 23 अक्तूबर को फोन आया कि पिता की हालत नाजुक है। वह तुरंत वहां से भागे, लेकिन जब तक पहुंचे तब तक पिता जा चुके थे। देवेंद्र के मुताबिक यह उनके पिता थे, जिन्होंने उन्हें जीवन में कभी निराश नहीं होने दिया। वह उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करते थे। 
 

दूसरी बार गोल्ड जीत रचा था कीर्तिमान

झाझरिया ने उसी जोश के साथ इस हिस्सा लिया और दूसरी बार गोल्ड मेडल पर कब्जा किया। इस बार उन्होंने 2004 का रिकॉर्ड तोड़ते हुए नया कीर्तिमान रचा। उन्होंने 63.97 का थ्रो कर दूसरी बार विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। इस बार भी पूरे देश की निगाहें झाझरिया पर टिकी है। वह गोल्ड मेडल जीत के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। उन्होंने 65.71 मीटर भाला फेंककर टोक्यो पैरालंपिक के लिए क्वॉलिफाइ किया था। भारतीय खिलाड़ी पैरालंपिक में चुनौती पेश करने के लिए टोक्यो पहुंच चुके हैं। इस बार रिकॉर्ड 54 खिलाड़ी नौ खेलों में पदकों के लिए दावा पेश करेंगे। 
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आठ साल की उम्र में लगा था करंट

झाझरिया जब आठ साल के थे तब करंट लगने के उनका हाथ कारण बुरी तरह से जख्मी हो गया था। उनके लिए बाहर निकलना भी किसी चुनौती से कम नहीं थी। जब उन्होंने अपने स्कूल में भाला फेंकना शुरू किया तो उन्हें लोगों के ताने झेलने पड़े। लोगों को यकीन नहीं था कि वे भाला भी फेंक सकते हैं। लोगों ने यही समझा कि उनके लिए खेलों में कोई जगह नहीं है। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने फैसला किया कि वो लोगों की इन बातों से खुद को कमजोर नहीं होने देंगे। उन्होंने अपनी जिंदगी से यही सीखा कि जब सामने कोई चुनौती होती है तो आप सफलता प्राप्त करने के करीब होते हैं। इसलिए, उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया।
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