बीते वर्ष अक्तूबर माह में उनके पिता को फेफड़ों का कैंसर निकला। उन्होंने काफी जगह हाथ पैर मारे लेकिन सभी जगह जवाब दे दिया गया। वह पिता के साथ थे उनकी सेवा कर रहे थे। एक दिन पिता ने कहा कि तुम्हारे दो छोटे भाई यहां हैं। दोनों उन्हें संभाल लेंगे, लेकिन तुम यहां रुकोगे तो तुम्हारी तैयारियां प्रभावित होंगी। तुम्हें देश के लिए तीसरा पैरालंपिक स्वर्ण जीतना है जाओ गांधीनगर में तैयारियां करो। इसके बाद देवेंद्र जयपुर से गांधीनगर आ गए, लेकिन 23 अक्तूबर को फोन आया कि पिता की हालत नाजुक है। वह तुरंत वहां से भागे, लेकिन जब तक पहुंचे तब तक पिता जा चुके थे। देवेंद्र के मुताबिक यह उनके पिता थे, जिन्होंने उन्हें जीवन में कभी निराश नहीं होने दिया। वह उन्हें हमेशा प्रोत्साहित करते थे।
झाझरिया ने उसी जोश के साथ इस हिस्सा लिया और दूसरी बार गोल्ड मेडल पर कब्जा किया। इस बार उन्होंने 2004 का रिकॉर्ड तोड़ते हुए नया कीर्तिमान रचा। उन्होंने 63.97 का थ्रो कर दूसरी बार विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। इस बार भी पूरे देश की निगाहें झाझरिया पर टिकी है। वह गोल्ड मेडल जीत के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। उन्होंने 65.71 मीटर भाला फेंककर टोक्यो पैरालंपिक के लिए क्वॉलिफाइ किया था। भारतीय खिलाड़ी पैरालंपिक में चुनौती पेश करने के लिए टोक्यो पहुंच चुके हैं। इस बार रिकॉर्ड 54 खिलाड़ी नौ खेलों में पदकों के लिए दावा पेश करेंगे।
झाझरिया जब आठ साल के थे तब करंट लगने के उनका हाथ कारण बुरी तरह से जख्मी हो गया था। उनके लिए बाहर निकलना भी किसी चुनौती से कम नहीं थी। जब उन्होंने अपने स्कूल में भाला फेंकना शुरू किया तो उन्हें लोगों के ताने झेलने पड़े। लोगों को यकीन नहीं था कि वे भाला भी फेंक सकते हैं। लोगों ने यही समझा कि उनके लिए खेलों में कोई जगह नहीं है। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने फैसला किया कि वो लोगों की इन बातों से खुद को कमजोर नहीं होने देंगे। उन्होंने अपनी जिंदगी से यही सीखा कि जब सामने कोई चुनौती होती है तो आप सफलता प्राप्त करने के करीब होते हैं। इसलिए, उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया।