देश भर में प्रसिद्ध मंडी की गन फैक्ट्रियां कोटा न बढ़ने और जटिल लाइसेंस प्रक्रिया होने के कारण तरक्की नहीं कर पाई हैं। 64 साल में इन गन फैक्ट्रियों का कोटा दो बार ही बढ़ा है। बंदूकें बनाने का काम सीमित होने के कारण उद्योग बंद होने की कगार पर हैं। देशभर में विस्को गन के नाम से प्रसिद्ध एक नाली और दोनाली बंदूकें मंडी शहर के सौली खड्ड औद्योगिक केंद्र में मैसर्ज वीर सिंह एंड कंपनी 1950 से बना रही है।
दोनों बंदूकों को विस्को स्पेशल का नाम दिया गया है। कंपनी का बंदूक कोटा 576 है। कंपनी एक नाली बंदूक करीब 14 से 18 और दोनाली बंदूक 25 से 30 हजार रुपये में सेल करती है। कंपनी का दावा है उनकी बंदूक में लकड़ी के हिस्से को छोड़कर अन्य की 100 साल तक लाइफ है।
वहीं, प्रेम सागर एंड सन्स कंपनी 1971 से एक नाली और दोनाली बंदूकें बना रही है। दो बार कोटा भी बढ़ा है लेकिन कंपनी अगस्त तक अपना कोटा पूरा कर चुकी है और वर्तमान में केवल सेल का कार्य कर रही है। प्रबंधकों का मानना है कि मंडी में रेल सुविधा न होने के कारण कच्चा माल लाने व बंदूकें सप्लाई करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
वहीं, कोटा कम होने के कारण आधुनिक मशीनों सहित कारीगरों की संख्या भी नहीं बढ़ा पा रहे हैं। कंपनी प्रबंधकों का दावा है कि यदि उन्हें आधुनिक बंदूकों को बनाने का कार्य सौंपा जाए तो वे इंपोर्टिड बंदूकों को मात दे सकते हैं।
ऐसे होती है सेल- बंदूक बेचने की प्रक्रिया जटिल है। तैयार माल को चेकिंग के लिए जबलपुर भेजा जाता है। यहां बंदूक मानकों पर खरी उतरने के बाद ही सप्लाई की जाती हैं। लाइसेंस होल्डर अपने प्रशासन से एनओसी लिखकर फैक्टरी को भेजेगा, जिसे मालिक संबंधित प्रशासन के समक्ष रखेगा और बंदूक सप्लाई करने की अनुमति लेगा। अनुमति न मिलने तक गन सप्लाई नहीं की जा सकती है।
वीर सिंह एंड कंपनी के मालिक जसविंद्र सिंह ने बताया कि कोटा बढ़ाने के लिए हर वर्ष केंद्र सरकार से पत्राचार किया गया है। लेकिन 64 वर्षों के दौरान केवल एक बार ही कोटा बढ़ा है। लाइसेंस प्रक्रिया आसान होनी चाहिए। अन्य आधुनिक बंदूकें बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
प्रेम सागर एंड सन्स कंपनी के मालिक अशोक ने बताया कि अगर कोटा तीन से चार हजार किया जाए तो वर्तमान मशीनरी व कारीगर आसानी से बना सकते हैं। लेकिन सालों से मात्र दो बार ही कोटा बढ़ा है। कोटा बढ़ाने के अलावा लाइसेंस प्रक्रिया आसान होनी चाहिए।