उन्हें न तो खाने की सुध है और न पीने की। बच्चों को खो चुकीं माताएं अपनी सुधबुध तक खो बैठी हैं। रात भर बदहवासी में घूमती रहती हैं। बच्चों के वियोग ने उनकी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया है। बच्चों के गम में रो-रो कर बूढ़े दादा-दादी की तो आंखों की रोशनी ही खत्म हो गई है।
अब तो उन्हें दिखाई भी कम देने लगा है। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन के पास न्याय की गुहार लगाते हुए उन्हें छह महीने बीत गए हैं, लेकिन सरकार और जिला प्रशासन की संवेदनाएं नहीं जाग रहीं।