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जलवायु परिवर्तन: चार घंटे में हो रही 24 घंटों की बारिश से दरक रहे हिमाचल के पहाड़

Fri, 13 Aug 2021 12:43 PM IST
अरविन्द ठाकुर रोशन ठाकुर, अमर उजाला नेटवर्क, कुल्लू

सार

जलवायु परिवर्तन के चलते बारिश का पानी जमीन में रसने के बजाय पहाड़ों व कंदराओं में घुस रहा है। जिस कारण मौसम साफ होने से पहाड़ में दरारें होने से ये गिर पड़ते हैं।
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किन्नौर निगुलसरी में भूस्खलन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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विकास के नाम पर हिमाचल प्रदेश के पहाड़ तेजी से दरकने लगे हैं। इससे जानमाल का नुकसान हो रहा है। इसके पीछे विद्युत प्रोजेक्टों के अलावा जलवायु परिवर्तन भी कारण माना जा रहा है। बरसात के मौसम में आए दिन प्रदेश सहित कई पहाड़ी राज्यों में पहाड़ों के दरकने की घटनाएं अधिक हुई हैं। बरसात और सर्दी के मौसम में बड़ा बदलाव आने से असमय बर्फबारी और बरसात हो रही है। पहाड़ों के दरकने की वजह तेज बारिश भी है।

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यह बात गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र कुनियाल ने कही। उन्होंने ढाई दशक से भी अधिक वर्षों तक जिला कुल्लू के मौहल स्थित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान में सेवाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि अब बारिश का स्तर बढ़ने लगा है। जो बारिश 24 घंटे तक होनी चाहिए, वह मात्र तीन से चार घंटे में हो जा रही है।

जलवायु परिवर्तन के चलते बारिश का पानी जमीन में रसने के बजाय पहाड़ों व कंदराओं में घुस रहा है। जिस कारण मौसम साफ होने से पहाड़ में दरारें होने से ये गिर पड़ते हैं। विकास को रोका नहीं जा सकता है। सड़कें निकालना जरूरी है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में ये सब वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए। सड़कें और टनल निकालने के बाद पहाड़ों के दरकने व भूस्खलन को रोकने के लिए इसका संरक्षण भी जरूरी है।
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इसके लिए घास लगाने के साथ झाड़ियां और पौधरोपण किया जाना चाहिए। साथ ही संवेदनशील जगहों का वैज्ञानिक आधार पर चार से पांच साल बाद समय-समय पर निरीक्षण होता रहना चाहिए। पहाड़ की गतिविधियों को भांपकर लोगों की जिंदगी के साथ अन्य नुकसान को बचाया जा सकता है। डॉ. कुनियाल ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से गर्मी भी तेज पड़ती है और बरसात भी सामान्य ढंग से नहीं हो रही है।
 
जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरूप बदला
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के जानकार वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जीसी कुनियाल ने कहा कि पिछले कुछ सालों से जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात का स्वरूप बदल गया है। धीमी और मध्यम बारिश का पानी आसानी से जमीन में रस जाता है, लेकिन अब 24 घंटे की बारिश चार घंटे में हो रही है और पानी जमीन के ऊपर से ही बह रहा है। इसे बादल फटने, बाढ़, भूस्खलन व पहाड़ों के दरकने की घटनाएं काफी बढ़ने लगी हैं। इसे रोकने के लिए वैज्ञानिक ढंग से कदम उठाने की जरूरत है।

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