18 मार्च 1971 के दिन इंदिरा गांधी को तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
क्यों खास था यह चुनाव?
यह पहला चुनाव था जब आजादी के बाद पहली बार कांग्रेस पार्टी दो भागों में बंटी थी। सिंडिकेट से इंदिरा की खटपट पहले से ही चली आ रही थी। सिंडिकेट ने इंदिरा को पार्टी से ही बाहर कर दिया। पुराने बुजुर्ग नेताओं की कांग्रेस और इंदिरा की कांग्रेस चुनाव में आमने सामने थी। कांग्रेस (ओ) में ज्यादातर वही लोग थे जो प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के किसी जमाने में करीबी हुआ करते थे और इंदिरा जिनके लिए बेटी समान थी। लेकिन यह इंदिरा गांधी ही थी जिन्होंने इससे पहले के चुनाव में सिंडिकेट को मुंह की खाने पर मजबूर कर दिया था। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली पार्टी का चुनाव चिन्ह गाय का दूध पीता बछड़ा था। यह पहली बार था जब कांग्रेस गाय-बछड़े के चुनाव चिन्ह पर लोकसभा चुनाव लड़ रही थी।
इसे भी पढ़ें- 1957 लोकसभा चुनाव: कांग्रेस को मिला था प्रचंड बहुमत, वाजपेयी पहली बार पहुंचे थे संसद
मध्यावधि चुनाव करवाकर तीसरी बार प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा
सागरिका घोष अपनी किताब 'इंदिरा- भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री' में लिखती हैं कि अपने प्रमुख सचिव पीएन हक्सर की सलाह पर इंदिरा गांधी ने 1971 में मध्यावधि चुनाव करवा डाले। वह बैंकों के राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स की जड़ों पर आघात और कांग्रेस बंटवारे की पृष्ठभूमि में लोकप्रिय नारे 'गरीबी हटाओ' के साथ चुनाव मैदान में उतरी थीं। जबकि विरोधियों का नारा था 'इंदिरा हटाओ'। इस तरह 18 मार्च 1971 के दिन इंदिरा गांधी को तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। दिसंबर 1971 में निर्णायक युद्घ के बाद भारतीय सेना ने पूर्वी पाकिस्तान को 'मुक्ति' दिला दी। बांग्लादेश का जन्म हुआ। सागरिका घोष लिखती हैं, बांग्लादेश युद्ध के बाद तो इंदिरा गांधी की लोकप्रियता कुलांचें भरने लगीं।
इसे भी पढ़ें- नेहरू-शास्त्री के देहांत से लेकर इंदिरा के पीएम बनने सहित कई वाकयों का गवाह रहा 1962 लोकसभा चुनाव
अटल के एक भाषण की बदौलत 22 सीटों पर सिमटी जनसंघ ने जीता नगर पालिका चुनाव
1971 के लोकसभा चुनाव में जनसंघ के सांसदों की तादाद 35 से घटकर 22 रह गई थी। जबकि भारत के चौथे लोकसभा चुनाव में जनसंघ तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। जनसंघ ने चुनाव में 35 सीटें जीती थीं। लेकिन इस चुनाव में जनसंघ को करारा झटका लगा था।
वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर लिखी अपनी किताब ' हार नहीं मानूंगा' में लिखते हैं कि जब अप्पा घटाटे ने वाजपेयी से पूछा, ' संसद में इंदिरा जी क्या प्रतिक्रिया है?' वाजपेयी हंस कर बोलो, 'अभी तो हमारी तरफ बहुत प्यार से देखती हैं'। 1971 के आम चुनाव ने जनसंघ को लगभग साफ कर दिया था। लोकसभा चुनाव के बाद ही दिल्ली में नगर पालिका चुनाव होने थे और वाजपेयी ने अपनी शैली में भाषण दिया और जनसंघ ने म्युनिसिपल चुनाव जीत लिया। दरअसल, जनसंघ की हार के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी शैली में भाषण देते हुए दिल्ली की जनता से कहा- ' आपने इंदिरा गांधी को मौका दिया वह तो ठीक है लेकिन अब हमें सफाई के लिए झाड़ू लगाने का मौका तो दो।' जनसंघ दिल्ली में चुनाव जीती और जनता ने झाड़ू लगाने का मौका दे दिया।
इसे भी पढ़ें-1967 में पहली बार कांग्रेस के आधिपत्य को मिली थी चुनौती, नेहरू विरोध में बनी पार्टी रही नंबर दो पर
वहीं, पराजित पाकिस्तानी सेना ने 16 दिसंबर 1971 को भारत के सामने बिना शर्त हथियार डाल दिए।
(संदर्भ- सागरिका घोष की किताब 'इंदिरा- भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री' और विजय त्रिवेदी की किताब 'हार नहीं मानूंगा' से साभार)