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सीमा पर बसे गांव कालूवाला की कहानी: एक तरफ पाकिस्तान, तीन तरफ दरिया, शहर जाने का बस नाव ही जरिया

Fri, 28 Jan 2022 03:32 PM IST
निवेदिता वर्मा अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, सीमांत गांव कालू वाला से/फिरोजपुर।

सार

आज तक गांव कालू वाला से कोई भी व्यक्ति अधिकारी पद तक नहीं पहुंचा है। बंटवारे के समय से शिक्षा से ये लोग वंचित हैं। नाव के जरिए दरिया पार कर स्कूल तक सिर्फ 5 लोग पहुंचे हैं, जो 12वीं पास हैं।
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गांव कालूवाला से शहर जाने का जरिया केवल नाव है। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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फिरोजपुर में पाकिस्तानी सीमा से सटा और तीन तरफ सतलुज दरिया से घिरा एक ऐसा गांव है, जहां 70 परिवार बसे हैं। चौथी तरफ यहां पाक की सीमा लगती है। आबादी महज चार सौ है। सात दशक से शिक्षा से वंचित इस गांव में सिर्फ पांच लोग 12वीं पास हैं। बिजली सप्लाई है, लेकिन सावन में दरिया में बाढ़ आने पर बिजली गुल हो जाती है। एक से दो माह तक आती भी नहीं। ये हाल फिरोजपुर शहरी विधानसभा हलके में पड़ते गांव कालू वाला (टापू) का है। 

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भारत-पाक बंटवारे के बाद से पंजाब में दो ही सियासी पार्टी अकाली-भाजपा गठबंधन और कांग्रेस सत्ता में रही है, इन्होंने इस गांव के विकास के लिए पुल तक नहीं बनाया। डिस्पेंसरी तक नहीं है। रात में किसी व्यक्ति की अचानक तबीयत खराब हो जाए तो पहले बीएसएफ चौकी से इजाजत लेनी पड़ती है, फिर नाव के जरिए दरिया पार कर लगभग 16 किलोमीटर दूर फिरोजपुर शहर स्थित सिविल अस्पताल पहुंचते हैं।

12वीं तक पढ़ पाए वह भी मुश्किलों से लड़कर

मलकीत सिंह बताते हैं कि उन्होंने तमाम मुश्किलों का सामना कर 12वीं पास की है। आज तक यहां से कोई भी व्यक्ति अधिकारी पद तक नहीं पहुंचा है। बंटवारे के समय से शिक्षा से ये लोग वंचित हैं। नाव के जरिए दरिया पार कर स्कूल तक सिर्फ 5 लोग पहुंचे हैं, जो 12वीं पास हैं। इससे ज्यादा यहां के ग्रामीण व नौजवान पढ़े-लिखे नहीं हैं। सुरजीत सिंह व स्वर्ण सिंह कहते हैं कि उनके पास पांच एकड़ जमीन है। इस बार अरबी 200 रुपये गट्टा (42 किलो) बिकी है। मटर दस रुपये किलो बिका है। जबकि शहर में मटर पचास रुपये किलो बिक रहा है। उन्हें मेहनत के पैसे भी नहीं मिलते हैं। उनका गांव तीन तरफ से दरिया से घिरा है। शहर जाने के लिए पुल तक नहीं है। बीएसएफ ने ब्लून पुल स्थापित किया है, जो छह माह ही रहता है। धान के सीजन में मुश्किलें होती हैं। धान से लदी ट्रालियों को बड़ी नाव के जरिए मंडी ले जाने का प्रयास करते हैं तो कई बार दरिया में ही डूब जाती है।

दस साल में सिर्फ एक बार दिखे विधायक

काला सिंह का कहना है कि पिछले साल ही प्राइमरी स्कूल का निर्माण किया है। दस साल में सिर्फ एक बार कांग्रेसी विधायक परमिंदर सिंह पिंकी पहुंचे हैं। यहां स्कूल बनाने का प्रपोजल सीमांत गांव गट्टी राजोके के प्रिंसिपल व अवार्डी सतिंदर सिंह ने पंजाब शिक्षा विभाग को भेजा था, तब जाकर यहां स्कूल बना है। स्कूल में पक्के तौर पर कोई शिक्षक नहीं है। 35 बच्चे पढ़ते हैं। पंद्रह-पंद्रह दिन एक शिक्षक की ड्यूटी लगती है, वह भी पंद्रह दिन में सिर्फ दो बार ही स्कूल आता है। इस हलके से अकाली-भाजपा गठबंधन के विधायक सुखपाल सिंह नन्नू भी रहे, लेकिन वह भी पुल नहीं बनवा सके। 

मजबूरी में छोड़ा गांव, खेती करने आते हैं

ग्रामीण गुरनाम सिंह ने कहा कि गांव में वाटर वर्क्स नहीं है। यहां के लोग ट्यूबवेल का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे दांत व चमड़ी रोग फैल रहे हैं। इलाज के लिए शहर जाना पड़ता है। बारिश में गांव की गलियां कीचड़ का रूप धारण कर लेती हैं, ऐसी स्थिति में बाइक तक नहीं चलती है। यहां किसी व्यक्ति के पास फोर व्हीकल तक नहीं है। बड़ी मुश्किल से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। गुरनाम ने कहा कि मूलभूत सुविधाओं से वंचित कालू वाला से मकान छोड़ मजबूरी में गांव निहाले वाला जाना पड़ गया है। खेती के लिए यहां आना पड़ता है।

बाढ़ के कारण छोड़ना पड़ता है घर

किसान दर्शन सिंह बताते हैं कि पहले बीएसएफ से इजाजत लेनी पड़ती है, तब खेतों से सब्जी तोड़कर शहर मंडी में बेचने पहुंचते हैं। जब भी भारत-पाक सीमा में तनावपूर्ण स्थिति बनती है, सबसे पहले इसी गांव के लोगों को अपना घर छोड़कर कहीं सुरक्षित जगह पर जाना पड़ता है। यहां के लोग अपने खेतों की खातिर कई बार बर्बाद हुए हैं। बाढ़ भी कई बार घर छोड़ने पर मजबूर कर चुकी है। 1988 में आई बाढ़ से बहुत नुकसान हुआ था, गांव में करीब पंद्रह फुट पानी भर गया था।

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दर्शन कहते हैं कि उनकी पंद्रह एकड़ जमीन थी, बाढ़ से दस एकड़ जमीन दरिया में मिल गई, अब पांच एकड़ जमीन है। कोई भी सियासी नेता उनकी मदद करने नहीं आता, दस साल में एक बार विधायक आया है। इस गांव से पाकिस्तानी गांवों के घरों को लाइटें नजर आती हैं। यदि अचानक रात के समय बाढ़ आ जाए तो बचने के लिए पाकिस्तान सीमा की तरफ भागना पड़ सकता है। शाम सात से आठ बजे और सुबह चार से पांच बजे तक कर्फ्यू जैसी स्थिति रहती है, कोई भी व्यक्ति बिना बीएसएफ की आज्ञा के गांव से बाहर और बाहर से गांव में नहीं आ जा सकता है। 

लगभग बीस पुल बनाए जाने की जरूरत है

ग्रामीण सुरजीत सिंह कहते हैं कि जब चुनाव आता है तो कुछ राजनीतिक पार्टियों के लोग वोट मांगने आते हैं और कई वादे करके जाते हैं। सभी कहते हैं कि जीतने पर उनके गांव में दरिया पर पुल बनवा देंगे, लेकिन पुल बनाने का आज तक किसी ने वादा पूरा नहीं किया है। ये अकेला गांव नहीं है, हुसैनीवाला बार्डर व ममदोट से सटे गांवों में लगभग बीस पुलों की जरूरत है। ये लोग नाव के जरिए अपने गांवों में पहुंचते हैं और शहरों में कामकाज के लिए जाते हैं। शाम को देर होने पर अपने रिश्तेदारों के पास रहना पड़ता है। कालू वाला के साथ पाकिस्तान के तीन गांव मस्तेके, कलंजर व आकूवाड़ा लगते हैं।

घर के लिए मिले सिर्फ 30 हजार रुपये

बुजुर्ग महिला खुशिया बाई (90) पत्नी मिल्खा सिंह ने बताया कि सरकार ने गरीब लोगों को कमरा बनाने के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा देने की बात कही थी, उसे सिर्फ तीस हजार रुपये मिले हैं, उससे केवल दीवारें खड़ी हुई हैं। छत बाकी है। अभी तक मुआवजे की पूरी राशि नहीं मिली है। यही हाल पूरे गांव के गरीब लोगों का है। गांव में शौचालय की सुविधा नहीं है, खेतों में जाना पड़ता है। 

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