डॉ. स्वराज ग्रोवर।
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गरीब मासूमों को कचरा बीनते देखा तो अमृतसर की डॉ. स्वराज ग्रोवर का दिल भर आया और उन्होंने एक फैसला किया। डॉ. ग्रोवर का कहना है कि उन बच्चों को देखकर मेरे मन में सवाल उठा कि जिन हाथों में कलम होनी चाहिए, उनमें कचरा क्यों है। क्या इन्हें अच्छा जीवन जीने का अधिकार नहीं। स्वराज बेचैन हो उठीं। आखिरकार उन्होंने खुद इन बच्चों की जिंदगी में शिक्षा का उजियारा फैलाने का निर्णय लिया।
अमृतसर में जन्मीं डॉ. स्वराज ग्रोवर 1968 में शादी के बाद पति प्रमोद कुमार ग्रोवर के साथ होशंगाबाद (मध्यप्रदेश) चली गईं। उनके पति वहीं सरकारी विभाग में सीनियर अधिकारी थे। वहां गरीब बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा स्वराज ने अपने कंधों पर उठा लिया। उनकी वहां सरकारी नौकरी लग गई, लेकिन बच्चों के मुकद्दर को बदलने की मुहिम को कमजोर नहीं पड़ने दिया।
प्रिंसिपल डायरेक्टर बनने के बाद होशंगाबाद जिले के 159 स्कूल उनके अधीन थे। उन्होंने तमाम झुग्गियों का दौरा किया और विशेषकर लड़कियों का अलग-अलग स्कूलों में दाखिला करवाया। स्वराज बताती हैं कि उनका प्रयास रंग भी लाया। कई बच्चे राज्य और केंद्र सरकार के विभागों में अच्छे पदों पर तैनात हैं। साल 2007 में सेवामुक्त होने तक उन्होंने 5 हजार से ज्यादा गरीब परिवारों के बच्चों को पढ़ाया। साल 2011 में अमृतसर लौट आईं। यहां फिर से अपनी मुहिम में जुट गईं। उनका मनना है कि सेवा का यह काम उनकी जिंदगी की अंतिम सांसों तक चलेगा।
स्वराज बताती हैं कि 7वीं कक्षा में थी, जब पहली बार गरीब बच्चों को कचरा बीनते देखा था। तभी से मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने का जज्बा जाग गया था। समय के साथ यह और मजबूत हुआ और आज सुकून इस बात का है कि सैकड़ों बच्चों की जिंदगी संवर चुकी है। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। आज भी गरीब बच्चों को पढ़ाने में जुटी हैं।