उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में 17 दिन गुजारकर बाहर आए मंजीत शुक्रवार शाम छह बजे अपने गांव भैरमपुर पहुंचे। पहुंचते ही सीधे मां से मिले, जो टकटकी लगाए दरवाजे पर ही खड़ी थीं। चरण छुए तो मां ने बेटे को गले लगा लिया। दोनों फफक-फफककर रो पड़े। माहौल भावुकता से भर गया। मां ने मंगलगान गाए फिर पूरे गांव में दिवाली मनाई गई।
घर के अकेले कमाने वाले जिगर के टुकड़े की सलामती के लिए दिन-रात दुआ कबूल हुई लेकिन राहत की खबर मिलने के बाद मां को अपने बेटे का दीदार करने के लिए 72 घंटे तक इंतजार करना पड़ा। 10 सितंबर को मंजीत घर से काम करने निकला था। ठीक 81 दिन बाद शुक्रवार शाम छह बजे वह लखनऊ होते हुए घर पहुंचा।
शाम को सरकारी गाड़ी से घर पहुंचते ही मंजीत ने जब मां को देखा तो आंसुओं की धार फूट पड़ी। उसकी मां का भी यही हाल था। बेटे के स्वागत में सजी-संवरी चौधराइन खुद को काबू न रख सकीं और फफक कर रो पड़ीं। मंजीत ने सबसे पहले मां के चरणों में नमन कर आशीर्वाद लिया। मां चौधराइन ने मंगलगान के साथ मंजीत के माथे पर तिलक किया और आरती उतारी।