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B'day Spcl: करियर की बुलंदियों पर 'नीरज' के एक काम से हिल गया था पूरा बॉलीवुड, फिल्मी गीतों की कहानी

Fri, 04 Jan 2019 03:52 PM IST
gaurav gaurav यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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गोपालदास नीरज
हिंदी सिनेमा के सदाबहार अभिनेता देवआनंद के लोकप्रिय गानों के लेखक, गीतकार पदमभूषण गोपालदास 'नीरज' सक्सेना का आज जन्मदिन है। गोपाल दास के जन्मदिन के मौके पर आज हम आपको उनदिनों की बातें बताने जा रहे हैं जब नीरज के पॉलिटिक्स में उतरते ही पूरा बॉलीवुड हिल गया। अपने फिल्मी करियर की बुलंदियों पर जानेमाने गीतकार ने राजनीति की तरफ अपना पहला कदम कानपुर में रखा।
 
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गोपालदास नीरज
मशहूर गीतकार, कवि, फिल्म फेयर पुरस्कार विजेता, पद्म भूषण और पद्मश्री गोपाल दास ‘नीरज’ के बारे में बहुत ही कम लोगों को यह मालूम है कि उन्होंने एक बार चुनाव भी लड़ा था। 
साल 1967 के आम चुनाव में ‘नीरज’ कानपुर लोकसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतरे थे।
 
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गोपालदास नीरज
अपनी चुनावी सभा में उन्होंने लोगों से अपील की थी कि जो भी भ्रष्ट हों या चोर हों वे उन्हें वोट न दें। बस यही एक बात जनमानस को घर कर गई। और वह 60 हजार वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे। उस चुनाव में निर्दलीय चुनाव लड़े एसएम बनर्जी जीते थे। कांग्रेस का प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहा था। 

 

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गोपालदास नीरज
गोपाल दास नीरज का जन्म 4 जनवरी 1925 को यूपी के इटावा जिले के ग्राम पुरावली में हुआ था। मात्र 6 वर्ष की आयु में पिता गुजर गये। 1942 में एटा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की।

 
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गोपालदास नीरज
कई दिनों तक बेकारी करने के बाद दिल्ली जाकर नीरज ने सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में 5 वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बी०ए० और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी से एम०ए० किया। 
 
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गोपालदास नीरज
कहता है जोकर सारा जमाना (फिल्म-मेरा नाम जोकर )
दिल आज शायर है गम आज नगमा है (फिल्म- गैम्बलर)
खिलते हैं गुल यहां मिल के बिछड़ने को (फिल्म- शर्मीली )
शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब (फिल्म- प्रेम पुजारी )
कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे (फिल्म- नई उम्र की नई फसल )..........
 
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गोपालदास नीरज
नीरज ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि मतदान से ऐन पहले वह चुनाव से हट गए थे। बोले कि कांग्रेस ने सपोर्ट करने की बात कही थी। लेकिन न तो सपोर्ट लिया और न दिया। चुनावी मंच पर श्रोता उन्हें सुनने के लिए लालायित रहते थे। उस चुनाव परिणाम में मिले मतों ने तब सभी नेताओं और पार्टियों को चौंका दिया था। नीरज जी ने बताया कि ‘जो चोर हैं वह मुझे वोट न दें’ सार्वजनिक अपील का लोगों पर गहरा असर पड़ा था।
 

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गोपालदास नीरज
जनता ने ईमानदारी दिखाते हुए ‘नीरज’ को जमकर वोट दिए थे। उन्होंने कहा कि सभी साहित्यकारों और रचनाकारों को अपने बीच से एक प्रत्याशी खड़ा करना चाहिए और उसे मिलकर चुनाव लड़ाना चाहिए। इससे जनता को भी किसी साफ-स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति का विकल्प मिलेगा।
 

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गोपालदास नीरज
फिल्म जगत में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए नीरज जी को 1970 के दशक में लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया।  
- 1970 में काल का पहिया घूमे रे भइया, फिल्म- चंदा और बिजली 
- 1971 में बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं, फिल्म- पहचान 
- 1972 में ये भाई जरा देख के चलो, फिल्म- मेरा नाम जोकर 
- 1991 में भारत सरकार से पद्म श्री 
- 1994 में यश भारती 
- 2007 में भारत सरकार से पद्म भूषण सम्मान 
 
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गोपालदास नीरज
लिखे जो खत तुझे..., ये भाई जरा देख के चलो..., मेघा छाए आधी रात.. जैसे सदाबहार नगमों के रचयिता यूपी के लाल गोपाल दास नीरज का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया।  वो 93 वर्ष के थे और काफी समय से बीमार थे। साहित्यकार, शिक्षक व दिल को छू लेने वाली कविताओं के लेखक, यूपी के इटावा निवासी गोपालदास नीरज ने हिंदी साहित्य को एक नई जान दी। नीरज जी जब मंच से अपनी कविताएं सुनाते थे तो उनकी नशीली कविताएं और लरजती आवाज श्रोताओं को अपना दीवाना बना देती थी। अब के सावन में शरारत ये मेेरे साथ हुई, मेरा घर छोड़ कर सारे शहर में बरसात हुई... सुनकर तो श्रोता सावन की तरह झूम उठते थे। 
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