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up assembly election 2022 : एक ऐसा गांव जहां, 'रामराज' नहीं सिर्फ 'नागराज' का ही सहारा

Sat, 22 Jan 2022 05:51 PM IST
विनोद सिंह आशुतोष त्रिपाठी/अनूप ओझा, प्रयागराज

सार

शंकरगढ़ के कपारी गांव में हर परिवार के मुखिया समेत सभी पुरुष सदस्यों के पीछे एक सांप जरूर पाला गया है। जिस घर में एक पिता के चार पुत्र हैं, उस परिवार में पांच सांप पल रहे हैं। लेकिन, वहां आजादी के 72 साल बाद भी इस विधान सभा चुनाव में विकास कोई मुद्दा नहीं है।
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Prayagraj News : शंकरगढ़ में सांपों का खेल दिखाते सपेरे। - फोटो : प्रयागराज
चार सौ झोपड़ियों की बस्ती में छह सौ से अधिक सांप। यानी, हर झोपड़ी में चारपाई के सिरहाने से लेकर दीया रखने के लिए बने ताखों और खूंटियों पर लटकाए पिटारों में किंग कोबरा से लेकर करैत तक की प्रजातियों के खतरनाक विषधर परिवार की जीविका के आधार बने हैं।


शंकरगढ़ के कपारी गांव में हर परिवार के मुखिया समेत सभी पुरुष सदस्यों के पीछे एक सांप जरूर पाला गया है। जिस घर में एक पिता के चार पुत्र हैं, उस परिवार में पांच सांप पल रहे हैं। लेकिन, वहां आजादी के 72 साल बाद भी इस विधान सभा चुनाव में विकास कोई मुद्दा नहीं है।


सांपों के खेल-तमाशे से होने वाली कमाई से ही वो खुशहाल हैं। बीन बजाने में महिर ये संपेरे अब तक गांव के बाबूजी लोगों का रुख देखकर वोट करते आए हैं। चुनाव आते-जाते रहे, मगर आजादी के 70 साल बाद भी लोकतंत्र सही मायनों में उनके दरवाजे पर दस्तक नहीं दे पाया है।
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Prayagraj News : सपेरों का परिवार। - फोटो : प्रयागराज
बच्चे खिलौने से नहीं संपोलों से खेल रहे
प्रयागराज के शंकरगढ़ इलाके के कपारी गांव में अब भी आंगन में खुशियों की किलकारी मारने वाले बच्चे काठ के खिलौनों की जगह संपोलों से ही खेलते हुए बड़े हो रहे हैं। शुक्रवार की दोपहर सपेरों की इस बस्ती में घुसते ही भीड़ लग जाती है। कड़ाके की ठंड में हुकुमनाथ इशारा पाते ही बगल में रखे पिटारे की डोरी खोलने लगते हैं।


पलक झपकते ही फुंकार मारते गेंहुअन नाग को काबू में करने के लिए वह अपनी मूठी बांधकर कोई जड़ी सुंघाने लगते हैं और सांप फन सिकोड़ने लगता है। चुनावी माहौल की बात आते ही हुकुमनाथ कहतेे हैं कि जंगल में सांपों को पकड़ने, नचाने या किसी के घर से  निकालने का ही काम इतना है कि कुछ और सोचने की फुर्सत नही होती, लेकिन हां, सुना है चुनाव आ गया है।


वह कहते हैं कि यह नई बात नहीं है, जब-जब चुनाव आता है, तब सपा, भाजपा, बसपा और कांग्रेस को सपेरों की याद आती है। हमारी यह आठवीं पीढ़ी है, हम न नौकरी करते हैं ना कोई धंधा, सिर्फ सांपों की ही कमाई खाते हैं। वहीं नरेशनाथ बीच में टोकते हुए अपनी बात शुरू कर देते हैं। वह कहते हैं कि भइया कोई विकास नहीं है। एक विस्वा जमीन नहीं है इस गांव में किसी भी सपेरे परिवार के पास।
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Prayagraj News : सपेरों का परिवार। - फोटो : प्रयागराज
सांप दिखाकर कर रहे जीविकोपार्जन

कोई कह नहीं सकता, किसी सरकार में एक धूर पट्टा तक नहीं मिला है। जिन झोपड़ियों, मड़हों में रहते हैं, उस पर भी नाम नहीं चढ़ा है। गांव के बाबू जी (धनाढ्य लोग) लोगों की कृपा है कि हम लोग सांप दिखाकर गुजर कर पा रहे हैं। बाकी क्या बोलें, आप तो सब जानते ही हैं। इस चुनाव में किसे वोट देने का न बनाए हैं, यह सवाल आते ही वह कहते हैं कि अभी कुछ नहीं कह सकते, लेकिन मोदी-योगी तो औरों से अच्छे हैं ही।


तभी शहजादे नाथ भी हाथ में बीन और कंधे पर पिटारा लिए आ जाते हैं, वह चुनावी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहता हैं कि साहब, हम लोग मड़ई में रहते हैैं। योगी आदित्यनाथ की इस सरकार में सबकुछ मिल रहा है। आवास मिला। बहन-बेटियों के लिए शौचालय और रात को दीया की जगह बल्ब की रोशनी भी मिल गई है। वादा तो हर पार्टी ने किया,काम मोदी-योगी का ही बोल रहा है। वहां आगे वाली गली में दरवाजे पर बिन सांप के बैठे नजरनाथ मिल जाते हैं।


खाली हाथ होने के सवाल पर वह कहते हैं कि अब दम नहीं भर पाते। जब बीन ही नहीं बज पाएगा, तब सांप नचाने का शौक पालना तो बेकार ही है न। फिर, नजरनाथ बताते हैं कि घर में दो बेटों के लिए दो सांप जंगल से पकड़कर ला दिए हैं। नाती-नतकोर सब सांपों के खेल-तमाशे में लगे हैं। वोट की बात आते ही वह कहते हैं कि जहां गुरुजी लोग देंगे, वहीं हम लोग भी देंगे।

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Prayagraj News : संपेरों का परिवार। - फोटो : प्रयागराज
कोई सपा तो कोई भाजपा के साथ

कुछ दूर बढ़ने पर इस सपेरों की बस्ती में राजा कमलाकर इंटर कॉलेज से 10वीं पास ओमप्रकाश से मुलाकात हो जाती है। ओम प्रकाश सांपों का तमाशा दिखाने की बजाए एनटीपीसी में काम थाम लिए हैं। वह डंके की चोट पर कहते हैं कि सपा भी लड़ रही है, लेकिन सपेरा समाज इस बार मोदी-योगी के साथ है। योगी जीतें या हारें, वो अपनी जगह है, लेकिन हम वोट योगी को ही देंगे। अब स्कूल खुलता है। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई है।


गल्ला महीने में दो बार मिल रहा है। तेल, चना, नमक सबकुछ साथ में। भरपूर मिल रहा है, कोई नुकसान भी नहीं है। फिर, लल्लन नाथ से मुलाकात होती है। उनके चार पुत्रों में रोहित नाथ, ताबीज नाथ, वीर नाथ, तस्वीर नाथ समेत पांच सांप हैं। यानी घर के हर सदस्य के पीछे एक सांप। लल्लन ने बताया कि उन्होंने सुबह खुद सांपों को चावल का मांड़ पिलाया है। इसे बाद चारों बेटे सांप नचाने निकल गए हैं।


दोनों बेटे खेल दिखाने सांपों के पिटारे लेकर निकल गए हैं। शाम तक कोई दो सौ तो कोई पांच सौ लेकर घर आ जाता है। इससे परिवार का गुजारा मजे से हो रहा है। वह कहते हैं कि इस बार कांटे की टक्कर सुनाई दे रही है। सपा का बोलबाला सुनाई दे रहा है। इस बार क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।


मामला पलट भी सकता है। इस भीड़ में किशन नाथ अपनी बात कहने लगते हैं। वह कहते हैं कि चाहे किसी की सरकार रही हो, विकास कभी नहीं हुआ। हम लोग सांप पकड़ते, छोड़ते ही रह गए। सरकारी आवास तो मिला, लेकिन किसी की छत पड़ी है तो किसी की नींव नहीं पड़ी। फिर भी कोई बात नहीं। जो मिला , उसी से संतोष है। भइया जी, हम सपेरे हैं, सपेरे ही रहेंगे।
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Prayagraj News : कपारी गांव में सांपों का खेल दिखाता सपेरा। - फोटो : प्रयागराज
विषधरों की ये प्रजतियां हैं घरों की शोभा
कोबरा, करिया, वाइपर, रेटल स्नैक, करैत प्रजातियों के सांपों के साथ ही विषखोपड़ा, गोहटा जैसे बेहद खतरनाक जीव घरों की शोभा


सपेरों का कुनबा बढ़ा, अब आधा दर्जन बस्तियां
शंकरगढ़ के राजा महेंद्र प्रताप सिंह के पूर्वजों का बसाया कपारी गांव वर्षों बाद भी वहीं खड़ा है। अब आधा दर्जन बस्तियां सपेरों की बस चुकी हैं। किसी जमाने में पश्चिम बंगाल से आए सपेरों का अब कुनबा बढ़ता जा है। कपारी गांव के ओमप्रकाश बताते हैं कि ये सपेरे करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व पश्चिम बंगाल से संगम स्नान के लिए आए थे।


शंकरगढ़ की पहाड़ियां और यहां की हरियाली देखकर उनका मन कुछ ऐसा रमा कि यहीं के होकर रह गए। मौजूदा समय में कपारी के अलावा गुड़िया तालाब, लोहगरा के जज्जी का पुरवा, बेमरा, कंचनपुर गांवों में सपेरों के कुनबे विस्तार लेे चुके हैं। प्रतापगढ़ और कौशांबी के मंदिर भी इनका ठिकाना बनते हैं। 


कपारी में विकास भी कम नहीं, प्रधान का दावा
कपारी के ग्राम प्रधान सुभाष सपेरों की बस्ती में बदलाव का दावा करते नहीं थकते। वह बताते हैं कि सपेरों की बस्ती में प्रधानमंत्री आवास योजना से 70 आवास आवंटित हुए हैं। इंटरलाकिंग भी गलियों में कराई गई है। सपेरा परिवार के विवेक नाथ को इसी सरकार में पंचायत भवन में कंप्यूटर सहायक के पद पर नौकरी भी मिल गई है। वह कहते हैं देखा जाए तो विकास तो हुआ ही है। 
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