बालू अड्डे पर बहराइच के शिवचरण लोधी मिले। वह दिल्ली में होटल में काम करते थे। बताते हैं, दूसरी लहर में कोरोना के मामले बढ़े तो दिल्ली छोड़कर गांव आ गया। प्रधान ने हौसला दिया कि यहीं काम मिल जाएगा। पर, मिला कुछ नहीं। आखिर पेट तो पालना ही है, इसलिए लखनऊ का रुख कर लिया। यहां करीब 400 रुपये तक रोजाना कमा लेता हूं। बालू अड्डे पर तो सोने वालों के साथ हादसा भी हो चुका है, फिर भी...? शिवचरण बोले, वो तो है, पर जब अंटी में पैसा नहीं हो तो खतरा तो उठाना ही पड़ेगा। कुछ ऐसी ही कहानियां हैं यहां सीतापुर, लखीमपुर, बाराबंकी जैसे जिलों से आए प्रकाश, राजू, पहलवान, दीपू व उनके जैसे अन्य श्रमिकों की।