शब्दों की महान परंपरा के सतत सम्मान और श्रेष्ठतम सृजन को रेखांकित करते हुए इस बार शब्द सम्मान का सर्वोच्च अलंकरण 'आकाशदीप' हिंदी में ममता कालिया और मणिपुरी में अरमबम ओंगबी मेमचौबी को दिया जा रहा है। इसके साथ ही श्रेष्ठ कृति सम्मान सविता सिंह (कविता), नाइश हसन (कथेतर), शहादत (कथा), सुजाता शिवेन (भाषाबंधु) और श्रेष्ठ पहली कृति के लिए मनीष यादव को दिया जा रहा है। यह अलंकरण समारोह आज यानी 11 फरवरी, 2026 को दिल्ली में प्रख्यात सितार वादक उस्ताद शुजात हुसैन खान के मुख्य आतिथ्य में हो रहा है।
अमर उजाला शब्द सम्मान में सम्मानित किए जाएंगे विजेता
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जब तार की गूंज शब्द की गहराई से मिले
एक लेखक जिस तरह एक छोटे से दृश्य को शब्दों के माध्यम से अमर बना देता है, वैसे ही एक संगीतकार सुरों के एक छोटे-से टुकड़े से सदियों का दर्द बयां कर सकता है।
मैं एक ऐसा कहानीकार हूं, जिसका माध्यम तार हैं। संगीत अपने शिखर पर तब पहुंचता है, जब वह मानवीय आवाज की नकल करता है। वही आवाज, जो साहित्य के भार को वहन करती है। मैं जब बजाता हूं तो मैं केवल ‘सरगम’ के बारे में नहीं सोच रहा होता, मैं ‘शब्द’ के बारे में भी सोच रहा होता हूं। साहित्य संगीत को एक भावनात्मक ब्लूप्रिंट प्रदान करता है, चाहे वह गालिब की रूहानी शायरी हो या अमीर खुसरो का सूफी कलाम। भारतीय उपमहाद्वीप का साहित्य सितार की आत्मा के रूप में कार्य करता है। मेरा मानना है कि जो संगीतकार किसी छंद की गहराई को नहीं समझता, वह कभी भी राग के ‘भाव’ में महारत हासिल नहीं कर सकता।
अक्सर मुझसे पूछा जाता है कि क्या केवल सुरों का ज्ञान पर्याप्त है? मेरा जवाब हमेशा ‘नहीं’ होता है। संगीत की साधना केवल उंगलियों की कसरत नहीं है, बल्कि यह आपके भीतर के मनुष्य का परिष्कार है। साहित्य वह रास्ता है, जो हमें हमारे इतिहास और संस्कृति से मिलाता है। यदि एक कलाकार के पास शब्दों का खजाना नहीं है तो उसके सुर केवल शोर बनकर रह जाएंगे। मैं अक्सर कहता हूं कि जो मिठास एक शायर के ‘लफ्ज’ में होती है, वही मिठास मुझे सितार की ‘मींड़’ में लानी होती है। यदि मैं दाग या फैज को नहीं पढ़ूंगा तो मैं विरह या मिलन के रागों में वह तड़प कैसे पैदा करूंगा?
मैं भारतीय शास्त्रीय संगीत को ‘अलिखित साहित्य’ के रूप में देखता हूं। ऐतिहासिक रूप से हमारी परंपराएं महान महाकाव्यों की तरह मौखिक रूप से आगे बढ़ीं, इसलिए जिस तरह एक पाठक को उपन्यास के युग को समझना चाहिए, उसी तरह एक श्रोता को राग के पीछे की ‘कहानी’ को समझना चाहिए। यही नहीं, साहित्य संगीतकार की कल्पना का विस्तार करता है, जिससे वह प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ‘नायक’ या ‘नायिका’ की कल्पना कर पाता है, जो बाद में उसकी धुन में झलकता है। एक कलाकार को संगीत से ज्यादा दुनिया को पढ़ना चाहिए। जब आप दुनिया को पढ़ते हैं तो आपका संगीत खुद-ब-खुद ‘साहित्यिक’ हो जाता है। एक महान लेखक और एक महान संगीतकार, दोनों को ‘ठहराव’ की शक्ति को समझना चाहिए। साहित्य में यह पंक्तियों के बीच का खाली स्थान है, संगीत में यह ‘खाली’ या स्वरों के बीच का मौन है।
यदि एक सितार वादक किसी सुगठित वाक्य की सुंदरता को नहीं पढ़ता या उसकी सराहना नहीं करता तो उसका संगीत तकनीकी रूप से तो सटीक हो सकता है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से खोखला रहेगा। हम सितार वादकों के पास जब तार की गूंज शब्द की गहराई से मिलती है तो श्रोताओं को एक अलौकिक अनुभव प्राप्त होता है। संगीत और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक अवर्णनीय का वर्णन करने के लिए शब्दों का उपयोग करता है और दूसरा वहां पहुंचने के लिए ध्वनि का उपयोग करता है, जहां शब्द विफल हो जाते हैं।
- उस्ताद शुजात हुसैन खान, मशहूर सितार वादक
ममता कालिया, विख्यात कथाकार
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सर्वोच्च सम्मान- आकाशदीप - हिंदी (जीवन की बेचैनी)
भाषा और साहित्य के रूप में अंग्रेजी ने मेरे लिए साहित्य के प्रति जुनून के जादुई द्वार खोल दिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में एमए की छात्रा थी, वहां पुस्तकालय और गुणवत्तापूर्ण पुस्तकों की उपलब्धता ने जीवन और साहित्य के प्रति मेरी सोच को बदल दिया। मुझे ऊंची उड़ान भरने के लिए नए पंख मिले। मैं पहले से ही हिंदी और अंग्रेजी में कविताएं लिखती थी, लेकिन बाद में कथा में दिलचस्पी बढ़ गई। मैंने 38 वर्ष अध्यापन और प्रशासन में बिताए। अध्यापन भी एक सीखने की प्रक्रिया है। छात्रों ने नए विचार दिए और ग्रहण किए। मुझे इतनी अविवाहित महिला कामगारों से मिलने का अवसर मिला कि वे मेरी चिंताओं की महत्वपूर्ण प्रवक्ता बन गईं। दिल्ली के अलावा इलाहाबाद से भी मेरा गहरा नाता रहा। इलाहाबाद इसलिए अनोखा है, क्योंकि यह मुख्य रूप से लेखकों, शिक्षाविदों, वकीलों और डॉक्टरों का शहर है। मेरा जुड़ाव लेखकों से अधिक था और मुझे लगा कि उनकी चिंताओं को कलमबद्ध किया जाना चाहिए। इलाहाबाद में हर कोई बौद्धिक सोच रखता है। मैं कई शहरों में रह चुकी हूं, लेकिन इलाहाबाद अद्वितीय है और इसकी झलक आप मेरी किताब ‘जीते जी इलाहाबाद’ में देख सकते हैं।
‘कितने शहरों में कितनी बार’ किताब मैंने तब लिखी थी, जब एक दिन उंगलियों पर गिनने की कोशिश की कि मैं अब तक कहां-कहां रह चुकी हूं। मेरे पिता के तबादलों ने मुझे घुमक्कड़ बना दिया था। बाद में मेरे पति रवि के प्यार ने मुझे बंजारा बना दिया। इसने मेरे जीवन की उस बेचैनी को भी उजागर किया, जो उसका एक हिस्सा थी। मैंने मथुरा, दिल्ली, नागपुर, मुंबई, पुणे, इंदौर, इलाहाबाद और कोलकाता के अपने अनुभवों को संक्षेप में याद किया है। मुझसे ज्यादा अव्यवस्थित लेखक शायद ही मिले। कोई योजना नहीं, कोई नोट्स नहीं, कोई पहला ड्राफ्ट नहीं। मैं बस लिखती हूं और पहला आवेग ही मेरा अंतिम प्रहार होता है। मुझे विषय अचानक और तेजी से सूझते हैं। लेकिन आज का परिदृश्य बहुत गतिशील है, इसलिए हमें खूब पढ़ना चाहिए। मेरा मानना है कि जब तक आप पढ़ते नहीं, तब तक लेखक नहीं बन सकते। वास्तव में, हमें लिखने से ज्यादा पढ़ना चाहिए। मुझे पढ़ने की लत है। लिखने से ज्यादा। खूब पढ़ती हूं। नए पुराने सबको। हां, लिखते समय उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इससे क्या घबराना।
मेरी किताबों के भावी पाठकों को शिक्षित पुरुषों और महिलाओं के उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे, जो मुश्किल समय में अपना रास्ता बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पुरुषों और महिलाओं के लिए जीवन कभी भी आसान नहीं रहा है। जितनी कम उम्र होती है, उतनी ही ज्यादा परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। महिलाओं का जीवन और भी कठिन होता है, क्योंकि उन्हें अपने कॅरिअर और परिवार दोनों को संभालना पड़ता है। मेरा मानना है कि जीवन का मजा तो हमेशा काम करते रहने में है। जो काम करेगा, वह नई दौड़ जीतेगा।
- ममता कालिया, विख्यात कथाकार
अरमबम ओंगची मेमचौबी, प्रख्यात साहित्यकार
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सर्वोच्च सम्मान- आकाशदीप - मणिपुरी (धारा के विरुद्ध)
आकाशदीप से सम्मानित विराट साहित्यकारों की परंपरा में स्वयं को खड़ा देखना मेरे लिए किसी स्वप्न से कम नहीं है। हिंदी के विशाल लोक में मणिपुरी की एक महिला आवाज को सम्मिलित करके अमर उजाला ने सम्मान को मेरे लिए एक ऐतिहासिक स्मृति में बदल दिया है। यह महिला आवाज का सम्मान है।
मेरे लेखन की जड़ें महिलाओं के जीवन और संघर्ष से गहराई से जुड़ी रही हैं। मैं वही लिखती हूं, जो भीतर से मुझे पुकारता है, जो मन के किसी कोने में आकार ले लेता है। मेरे लेखन में यात्राओं के वृत्तांत भी हैं, पौराणिक कथाओं और शमनवाद से जुड़ी रचनाएं भी, जीवनियां हैं, कथा-साहित्य है और नाटक भी। इसलिए किसी एक विषय को चुनकर उसे अपना प्रिय कहना या भविष्य के लिए किसी ठोस लक्ष्य की घोषणा करना मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं है।
मैंने कभी यह सोचकर लिखना शुरू नहीं किया था कि मुझे एक दिन लेखिका बनना है। सच तो यह है कि लिखना मेरे लिए हमेशा एक सहज, आत्मिक शौक रहा-एक ऐसी आदत, जो बचपन से ही मेरे भीतर चुपचाप पनपती रही। पढ़ना मुझे बेहद प्रिय था, जो भी पुस्तक हाथ लगती, मैं उसे पूरा पढ़ जाती, चाहे वे धार्मिक किताबें हों या भाई-बहनों की पाठ्य-पुस्तकें।
मुझे याद आता है कि शायद दस वर्ष की आयु में मैंने पहली बार कुछ पंक्तियां लिखी थीं। स्कूल के दिनों में मैं अपनी कॉपियों और डायरियों में छोटी-छोटी कविताएं और विचार दर्ज करती रहती थी। वे मेरी सृजन-यात्रा के शुरुआती बीज थे। धीरे-धीरे यह शौक एक उद्देश्य में बदलने लगा। अपने आस-पास मैंने महिलाओं से जुड़ी अनेक समस्याएं देखीं- राजनीतिक अस्थिरता, घरेलू हिंसा, कम उम्र में शादियां और स्त्रियों की नजरअंदाज आवाजें। इन अनुभवों ने मुझे भीतर से झकझोर दिया।
मेरी इच्छा थी कि उन महिलाओं की कहानियां दर्ज करूं, जो अपने समय में सक्रिय और प्रभावशाली रहीं, पर इतिहास की धूल में गुम हो गईं। यह काम आसान नहीं था। मैं दूर-दूर तक यात्रा करती। कभी चौदह किलोमीटर बस से, फिर साइकिल से और कई बार पैदल चलकर उन महिलाओं तक पहुंचती। महिलाओं के लिए, उनके इतिहास और अधिकारों के लिए काम करना मुझे गहरा संतोष देता है, मानो शब्द ही मेरे लिए सेवा का माध्यम बन गए हों। मैंने विपरीत धारा में जाकर लिखना शुरू किया था। जब मैंने लिखना शुरू किया था, उस समय हमारे साहित्य पर तथाकथित आधुनिकतावाद का वर्चस्व था। इस विचारधारा में एक अजनबीपन था- कुछ ऐसा, जो मेरी मिट्टी, अनुभवों और स्मृतियों से अलग था। मैंने अपने विश्वासों और रुचियों के अनुसार लिखना शुरू किया। यही मेरी राह बनी, धीमी, लेकिन अपनी। मैंने अपना रास्ता खुद बनाया और अपनी भाषा, अपने प्रतीक और संवेदना खुद गढ़ी।
- अरमबम ओंगची मेमचौबी, प्रख्यात साहित्यकार
अमर उजाला शब्द सम्मान
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छाप (कविता) - सविता सिंह - वासना एक नदी का नाम है
यह सृष्टि की वासना है...स्त्रीवादी नजरिये से वासना, प्रेम जैसे शब्दों का मैं अपने ढंग से अर्थ खोज रही हूं। पितृसत्ता में जहां स्त्रियों का दर्जा कभी भी समान नहीं होता, उसकी मनुष्यता को नष्ट करने के हर प्रयास होते हैं। इन सबसे बचकर स्त्री अपने जीवन को गहराई में ले जाती है। वहां उसे पता चलता है कि यह सृष्टि की वासना है। उसमें कहीं कोई खोट नहीं है।
निर्णायक वक्तव्य- अब तक न बोली गई भाषा में प्रेम संभव है
कवयित्री सविता सिंह की कविताओं में अब तक न बोली गई भाषा में, न समझी गई शब्दावली में प्रेम संभव है। प्रेम नदी है, नदी प्रेम है। नदी पत्थरों पर गीत लिखती है। - वर्षा दास, प्रख्यात कवयित्री
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छाप (कथेतर) - नाइश हसन - मुताह
स्त्री की मर्यादा का प्रश्न - उन लड़कियों की जिंदगी को देखकर हैरान हुई, जिन्होंने जीवन में कई बार मुताह की तकलीफ को बर्दाश्त किया। दो बालिग लोग अगर सहमति से साथ रह रहे हैं तो कोई सवाल नहीं, लेकिन अगर इसमें मर्जी नहीं है और बहुत कुछ छिपा है तो यह सवाल स्त्री गरिमा और मर्यादा के बिल्कुल खिलाफ है। मैंने इसी नजरिये से इस किताब को लिखा है।
निर्णायक वक्तव्य- शोधार्थियों के लिए अनिवार्य किताब
मुताह जितने जख्म एक औरत के शरीर पर छोड़ती है, उससे ज्यादा उसकी आत्मा को घायल करती है। गंभीर शोधार्थियों व महिला मुद्दों पर काम करने वालाें के लिए यह एक अनिवार्य किताब है। - विभूति नारायण राय, जाने-माने लेखक
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छाप (कथा) - शहादत - कर्फ्यू की रात
समाज की रूढ़ियों पर बात - ये कहानियां मुस्लिम समाज की बुनियादी समस्याओं पर बात करती हैं। यह ऐसा है कि आप एक ऐसे नरम-नाजुक फल को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, जो अंदर से सड़ रहा है। हम उम्मीद करते हैं कि जब समाज की रक्षा के लिए हम सब दांव पर लगा रहे हैं तो उन परंपराओं और रूढ़ियों पर भी बात की जाए, जिसने उसमें ठहराव ला दिया।
निर्णायक वक्तव्य- स्त्री अस्मिता का खामोश आख्यान
स्त्री की अस्मिता और स्वतंत्रता का खामोश आख्यान रचने वाला स्वर इतना युवा हो सकता है, यह चकित करने वाला अनुभव शहादत की कहानियां पढ़ते हुए होता है। - धीरेन्द्र अस्थाना, ख्यात कथाकार
अमर उजाला शब्द सम्मान
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थाप (पहली किताब) - मनीष यादव - सुधारगृह की मालकिनें
खुद के प्रति मौन - मैंने उन स्त्रियों के लिए कविताएं लिखीं, जो अक्सर संघर्ष करती हैं, लेकिन खुद के प्रति मौन रहती हैं। परंपराओं का विरोध नहीं कर पाती हैं, उनके लिए एक आवाज बनने का प्रयास किया है। ‘सुधारगृह की मालकिनें’ में आपको बहुत सारी कविताएं दिखेंंगी, उन सभी मांओं के लिए, जो मां होने के अलावा बहुत कुछ होना चाहती रहीं।
निर्णायक वक्तव्य - कच्चेपन का सच्चापन
मनीष यादव की कविताओं में किंचित कच्चापन तो है, पर वे सच्चेपन की गहरी प्रतीति देती हैं, जिनमें मानवीय भावों से भरा असंख्य तारों से जगमग आसमान है। - बलराम, चर्चित कहानीकार
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श्रेष्ठ अनुवाद - भाषाबंधु - सुजाता शिवेन- चरु चीवर और चर्या (मूल ओड़िया)
जीवंतता की बड़ी चुनौती- अनुवाद एक ऐसा काम है, जो कृति के भीतर उतरकर उसे दूसरी भाषा में जीवंत कर देने की चुनौती देता है। प्रदीप दाश का यह ओड़िया उपन्यास एक बहुसम्मानित कृति है, जिसे हिंदी में प्रस्तुत करना एक चुनौती थी। मैंने इसे स्वीकार करके ओड़िया और हिंदी के बीच एक सशक्त सेतु बनाने की हरसंभव कोशिश की है।
निर्णायक वक्तव्य- तनी हुई रस्सी पर चलना
किसी भाषा में व्यक्त कथ्य या विचारों की गहनता को अनुवाद के माध्यम से दूसरी भाषा में पिरोना तनी हुई रस्सी पर चलने जैसा है। सुजाता शिवेन ने अनुवाद में मूल-कृति को जीवंत किया है। - दामोदर खड़से, प्रख्यात रचनाकार
अमर उजाला शब्द सम्मान
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अलंकरण प्रतीक चिह्न - अनुकृति : गंगा
एक संस्कृति है गंगा, जो सदियों से हमारे मन में और हमारी धरती पर बह रही है। गंगा इतिहास की नदी है। गंगा हमारे वर्तमान की धारा है और गंगा में हमारे लिए भविष्य की लहरें हैं। यह जीवनदायिनी है, जहां-जहां गुजरती है, जीवन हरा होता चला जाता है। इसी गंगा को हमने शब्द सम्मान अलंकरण के प्रतीक चिह्न के रूप में चुना। राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित सेनवंशकालीन गंगा की यह प्रतिमा बारहवीं सदी की है, जो महानद क्षेत्र में खुदाई के दौरान मिली थी। विश्व प्रसिद्ध शिल्पी रामसुतार ने शब्द सम्मान के लिए इसकी अनुकृति तैयार की थी, जिन्होंने हमारे देश की संसद सहित दर्जनों देशों में महात्मा गांधी की मूर्तियां बनाईं, साथ ही विश्व की सबसे ऊंची ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ तैयार की थी।
7 महीने पहले