कोरोना महामारी में ब्लैक फंगस आंखों के नए दुश्मन के रूप में सामने आया है। ऑनलाइन पढ़ाई, ऑनलाइन काम, ऑनलाइन मीटिंग, ऑनलाइन खरीदारी और ऑनलाइन एंटरटेनमेंट समेत अन्य तौर तरीकों के कारण स्क्रीन को ज्यादा समय देने से आंखों के लिए जोखिम बढ़ा है। आज विश्व दृष्टि दिवस है। डब्ल्यूएचओ ने आंखों के प्रति बढ़ते जोखिम को देख इस बार की थीम ‘लव योर आईज’ (अपनी आंखों से प्यार करें) रखी है। इसका मकसद लोगों को यह बताना है कि वे सतरंगी दुनिया की छवियां दिखाने वाली अपनी आंखों को कैसे सहेजकर अपनी रोशनी सुरक्षित रख सकते हैं...
यूं दिखते हैं बीमारी के इशारे
आंखों में दबाव, थकान महसूस होना, दूर या पास की चीज साफ न दिखाई देना, आंखों में सूखापन, कम रोशनी में दिखाई न देना, आंख में दर्द महसूस होना, धुंधला दिखाई देना, आंख में लालिमा और पानी आना, आंख में खुजली और जलन होना और एक ही चीज दो-दो दिखना खतरे के संकेत हैं।
तकलीफ न करें नजरअंदाज
एम्स नई दिल्ली के कम्युनिटी ऑप्थैल्मोलॉजी के ऑफिसर इंचार्ज डॉ. प्रवीण वशिष्ठ बताते हैं कि देश में लोग आंखों की तकलीफ को गंभीरता से नहीं लेते हैं। देश में 65 से 66 फीसदी लोगों की आंख की रोशनी जाने का कारण सफेद मोतियाबिंद होता है, जिसे टाला जा सकता है। 40 वर्षों के अध्ययन में हमने पाया है कि शहरों में 100 में से 12 से 13 बच्चों को चश्मे की जरूरत पड़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में ये दर आठ फीसदी है। समय पर बच्चों की आंख की न तो जांच होती है और न ही चश्मा लगता है।