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बाराबंकी सीट: समाजवादियों के गढ़ में निर्णायक रहे हैं मुस्लिम मतदाता

Wed, 01 May 2019 08:42 PM IST
Abhishek Singh चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बाराबंकी लोकसभा सीट - फोटो : Amar Ujala
हमेशा से समाजवादियों का गढ़ रहा बाराबंकी लोकसभा क्षेत्र इस दफा लोकसभा चुनाव में दिलचस्प जंग का गवाह बन गया है। यहां अपने—अपने समीकरण साधने में जुटे उम्मीदवारों की नजर खामोश खड़े मुस्लिम मतदाताओं पर टिक गई है। समाजवाद के प्रणेताओं में शुमार किए जाने वाले रामसेवक यादव की कर्मभूमि बाराबंकी में वर्ष 1957 से लेकर ज्यादातर वक्त तक समाजवादियों का ही दबदबा रहा। आइए जानते हैं क्या है यहां का सियासी समीकरण और किसका पलड़ा दिख रहा भारी। 
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तनुज पुनिया - फोटो : Twitter
बाराबंकी, जैदपुर, रामनगर, हैदरगढ़ और कुर्सी विधानसभा सीटों को खुद में समेटे इस सुरक्षित श्रेणी की सीट पर सपा-बसपा गठबंधन ने चार बार सांसद रह चुके राम सागर रावत को मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने अपने पूर्व सांसद पी.एल. पुनिया के बेटे तनुज पुनिया पर दांव लगाया है। भाजपा ने जैदपुर सीट से मौजूदा विधायक उपेन्द्र रावत को उम्मीदवार बनाया है।
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भाजपा-बसपा-कांग्रेस - फोटो : social Media
इस सीट पर आम चुनाव और उपचुनावों के कुल 17 मौकों में से सिर्फ पांच बार कांग्रेस, दो बार भाजपा और एक बार बसपा के उम्मीदवार जीते हैं। बाकी मौकों पर समाजवादी विचारधारा के जनप्रतिनिधियों ने ही यहां कब्जा किया है।

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मतदाता - फोटो : Social Media
करीब 18 लाख मतदाताओं वाले इस लोकसभा क्षेत्र में जातीय समीकरण खासा अहम है। लेकिन जीत—हार का दारोमदार करीब 25 फीसदी आबादी वाले मुस्लिम मतदाताओं पर रहता है। अब तक मुसलमानों का समर्थन किसी भी उम्मीदवार का भाग्य तय करता रहा है। वहीं बाराबंकी सीट पर कुर्मी, पासी और यादव बिरादरी के मतदाताओं की भी खासी तादाद है।
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राम सागर रावत - फोटो : social Media
वर्ष 1971 में यह सीट फिर कांग्रेस के पास आ गई। वहीं, 1977 और 1980 के लोकसभा चुनाव में यह भारतीय लोकदल और जनता पार्टी सेक्युलर के पास चली गई। वर्ष 1984 में इंदिरा के निधन के दौरान हुए चुनाव में कमला रावत कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। उसके बाद वर्ष 1989, 1991 और 1996 में राम सागर रावत ने यहां जीत की हैट्रिक लगाई थी।
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प्रियंका सिंह रावत - फोटो : social Media
वर्ष 1998 में पहली बार बाराबंकी सीट भाजपा के खाते में गई थी। साल 2004 में कमला रावत बसपा के टिकट पर सांसद बने। वर्ष 2009 में कांग्रेस के पी.एल. पुनिया ने यहां से जीत हासिल की। वहीं, 2014 में 'मोदी लहर' ने प्रियंका रावत की नैया पार लगाई थी।
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