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श्रीराम मंदिर आंदोलन: घर-घर लहराया केसरिया, आगे ही नहीं पर्दे के पीछे भी विहिप की रही बड़ी भूमिका

Wed, 05 Aug 2020 12:48 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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vhp - फोटो : amar ujala
श्रीराम मंदिर आंदोलन के दौरान घर-घर छतों पर केसरिया फहराया गया। गांव व मोहल्लों में श्रीराम कार सेवा समितियां बनीं। ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़कर संगठन को खड़ा किया जाने लगा। जब अयोध्या कूच करने की बात आई तो कारसेवकों को एकत्र करना और उनके जलपान, भोजन और विश्राम की व्यवस्था हुई। यह सारी जिम्मेदारी विश्व हिंदू परिषद ने उठाई थी। संगठन के पदाधिकारियों ने जहां फ्रंट पर आकर मोर्चा लिया तो वहीं पर्दे के पीछे से संगठन का एक धड़ा आर्थिक इंतजामों और व्यवस्था में लगा रहा।
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विहिप - फोटो : अमर उजाला
खास बात यह रही कि सभी पदाधिकारी पुलिस और खुफिया तंत्र से छिपकर अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे। संगठन के बड़े पदाधिकारी किसी कार्यकर्ता के घर बैठकें कर योजनाएं भी बनाते थे। गोपनीयता ऐसी होती थी कि मोहल्ले के लोगों को भनक तक नहीं होने पाती थी।
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विहिप - फोटो : अमर उजाला
उस दौरान संगठन में महानगर उपाध्यक्ष पद का दायित्व निभाने वाले ओम प्रकाश श्रीवास्तव बताते हैं, लोगों में जोश ऐसा था कि हर कोई अयोध्या जाने को तैयार था। तब साधन सीमित थे और मना करने पर लोग नाराज हो जाते थे। बहुत सारे लोगों को स्थानीय स्तर पर व्यवस्था संभालने में लगाना पड़ा। आंदोलन से जुड़ने को लोग खुद आतुर थे। जब हम पहुंचते थे तो पता चलता था कि सूची तैयार है बस हमें लोगों से मिलना मात्र है।

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संजय श्रीवास्तव, 1992 में विहिप विभाग संगठन मंत्री। - फोटो : अमर उजाला।
1992 में विहिप विभाग संगठन मंत्री संजय श्रीवास्तव ने बताया कि वर्ष 1988 से लेकर 90 तक गांव-गांव में हिंदू समाज के घर जाकर जागरण किया। नए लोगों  को परिचित बनाकर संगठन के कार्य में जोड़ा। पुलिस-प्रशासन से बचने के लिए मुझे नाम भी बदलना पड़ा। मुझे लोग तिलक के नाम से पुकारने लगे। यह उपनाम ही मशहूर हो गया। उस वक्त पुलिस का इतना आतंक था कि व्यापारी राम के नाम पर रामदाना बेचना भी मुनासिब नहीं समझते थे। 500 वर्षों के इतिहास में राम मंदिर के लिए हिंदू समाज ने लाखों बलिदान दिए हैं। उसकी प्रतीक्षा समाप्त हो रही है।
 
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ओमप्रकाश श्रीवास्तव, 1992 में विहिप महानगर उपाध्यक्ष। - फोटो : अमर उजाला।
1992 में विहिप महानगर उपाध्यक्ष ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने कहा कि छह दिसंबर 1992 को बस से 50 लोगों को लेकर दोपहर 12 बजे मैं अयोध्या पहुंचा। वीरांगना टोली में पुष्पा मिश्रा, अमिता शर्मा के नेतृत्व में काफी संख्या में महिलाएं भी थीं। हम लोग भी कार सेवा में जुटे गए। शाम ढलते ही तीनों गुंबद गिरने के बाद लोग अपने प्रतीक चिन्ह लेकर घर को रवाना हो गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के इस्तीफे के बाद कर्फ्यू लग गया। पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर लिया और आजमगढ़ जेल में एक महीने तक रखा। आज बहुत खुशी है कि हमारा आंदोलन कामयाब हो रहा है और मंदिर का सपना पूरा होगा। 
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