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बाइस्कोप: जब राज कपूर को बेटे पर आया था जबर्दस्त गुस्सा, ये दो असिस्टेंट बने नामी फिल्म डायरेक्टर

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प्रेम रोग - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
आज के बाइस्कोप के लिए मुकाबला तीन फिल्मों के बीच माना गया था और ये फिल्में थी राज कपूर की 1982 में रिलीज हुई फिल्म प्रेम रोग, 1992 में रिलीज हुई काजोल की पहली फिल्म बेखुदी जिससे सैफ अली खान को फिल्म शुरू होने के बाद निकाल दिया गया था और 2009 में रिलीज निर्देशक इम्तियाज अली की फिल्म लव आज कल, जिसमें संयोग से हीरो सैफ अली खान ही थे। बाइस्कोप के नियमित पाठक टोंक, राजस्थान के राम भगीरथ लिखते हैं, “मैं तो अस्सी के दशक के आखिरी सालों में पैदा हुआ बच्चा हूं इसलिए बचपन में सारी नब्बे के दशक की ही मूवीज देखी है इसलिए उनके बारे में जानना चाहता हूं।” सबसे ज्यादा पाठकों ने चूंकि फिल्म ‘प्रेम रोग’ के बारे में ही पढ़ने की मंशा जाहिर की और आज मैं लिखने वाला भी फिल्मफेयर पुरस्कार में 12 श्रेणियों में नामांकन हासिल करने ‘प्रेम रोग’ के बारे में ही जा रहा हूं, लेकिन राम भगीरथ का कहना मुझे याद रहेगा। कोशिश रहेगी कि आने वाले दिनों में बाइस्कोप का दायरा बढ़ाया जाए और इसमें पिछली सदी के अलावा इस सदी की फिल्में भी शामिल की जाएं।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
तो शुरू करते हैं आज का बाइस्कोप, जिसमें फोकस में है 31 जुलाई 1982 को रिलीज हुई फिल्म ‘प्रेम रोग’। इस फिल्म की कहानी लिखी कामना चंद्रा ने, जिनकी दो बेटियां हैं, निर्देशक तनूजा चंद्रा और फिल्म समीक्षक अनुपमा चंद्रा। बेटा विक्रम भी उनका उपन्यासकार है, विक्रम चंद्रा के उपन्यास पर ही नेटफ्लिक्स की सीरीज सेक्रैड गेम्स बनी है। कामना चंद्रा की लिखी इस कहानी के संवाद लिखे हैं मशहूर लेखक जैनेंद्र जैन ने। जैनेंद्र जैन बंबई में टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी करते करते राज कपूर की संगत में आए और उन दिनों आए जब राज कपूर फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने के बाद कंगाल से हो गए थे। जैनेंद्र जैन के लिखे ‘बॉबी’ के संवादों को राज कपूर ने पसंद किया। इसी फिल्म से आर के स्टूडियो की किस्मत बदली। इस फिल्म के बाद जैनेंद्र जैन ने राज कपूर के साथ ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ में भी काम किया।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
राज कपूर जैनेंद्र जैन के काम से काफी खुश थे और फिल्म ‘प्रेम रोग’ का निर्देशन वह जैनेंद्र जैन से ही करवाने वाले थे, लेकिन फिल्म की कथा, पटकथा और संवाद जब तीनों राजकपूर के सामने आए तो उन्हें लगा कि शायद जैनेंद्र जैन इस फिल्म के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे और राज कपूर ने खुद ये फिल्म बनाने का फैसला कर लिया। हालांकि जैनेंद्र जैन ने इसके लिए कभी सार्वजनिक रूप से कुछ नहीं कहा और बाद में आर के स्टूडियो की फिल्मों ‘हिना’ और ‘प्रेम ग्रंथ’ के लिए भी काम किया लेकिन ‘प्रेम रोग’ का निर्देशन न मिलने से वह इतना व्यथित हुए कि उन्होंने इस फिल्म के रिलीज होते ही अपनी खुद की फिल्म शुरू कर दी। जैकी श्रॉफ, रति अग्निहोत्री और खुशबू स्टारर ये फिल्म थी ‘जानू’। ये फिल्म 1985 में रिलीज हुई। इस फिल्म के निर्देशक थे जैनेंद्र जैन और इसका निर्माण भी उन्होंने खुद ही किया।

फिल्म ‘प्रेम रोग’ की कहानी दरअसल देवदास की कहानी को ट्वीक कर तैयार की गई  कहानी है। यहां भी कहानी का नायक देव ही है, देवधर है उसका पूरा नाम। ठाकुर की बेटी मनोरमा और देव दोनों साथ खेल कूद कर बड़े हुए। ठाकुर की मदद से ही वह शहर पढ़ने जाता है। लौटकर आता है तो रमा बड़ी हो चुकी है। घर की गरीबी आड़े आती है और वह अपने मन की बात कह नहीं पाता है। इसी बीच मनोरमा की शादी हो जाती है और अगले ही दिन वह विधवा भी हो जाती है। ‘अनुज वधू भगिनी सुत नारी, सुन सठ कन्या सम ए चारी’ पढ़ने व मानने वाले देश में जेठ रमा का बलात्कार करता है। वह वापस अपने मायके लौट आती है। देव एक बार फिर से मनोरमा के चेहरे पर वही मुस्कान देखना चाहता है। और, उसे बताता है कि वह उसे अब भी प्यार करता है।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
अभी जो गाना यहां पर आपने सुना या देखा होगा, वह इस फिल्म के नाम को सार्थक करता है, ‘प्रेम रोग’। गाने का ये अंतरा ही देव की मनोस्थिति का खुलासा करता है,

सोचता हूं कि मेरी आंखों ने
क्यों सजाए थे प्यार के सपने
तुझसे मांगी थी इक खुशी मैंने
तूने गम भी नहीं दिए अपने

***
जिन्दगी बोझ बन गई अब तो
अब तो जीता हूं और न मरता हूं
मैं तुझे कल भी प्यार करता था
मैं तुझे अब भी प्यार करता हूं


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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
इस गीत को लिखा है दिल्ली के मशहूर शायर रहे अमीर कजलबाश ने। इस गाने के लिए उन्हें फिल्मफेयर के बेस्ट लिरिसिस्ट कैटेगरी में नॉमीनेशन भी हासिल हुआ। फिल्म ‘प्रेम रोग’ के गाने लिखने के लिए राज कपूर अपने फेवरिट संगीतकारों शंकर जयकिशन में से तब तक सक्रिय शंकर की बजाय लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को लिया और लक्ष्मी-प्यारे अपने साथ इस फिल्म में मनोज कुमार के फेवरिट गीतकार संतोष आनंद को ले आए। संतोष आनंद ने इस फिल्म के तीन सबसे सुपरहिट गाने लिखे। पहला तो लता मंगेशकर का कमाल का गाया गाना है, ‘ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा’, दूसरा गाना है लता मंगेशकर और सुरेश वाडेकर का गाया गाना ‘मोहब्बत है क्या चीज हमको बताओ’ और तीसरा गाना रहा सुधा मल्होत्रा और अनवर का गाया गीत ‘ये प्यार था या कुछ और था..’।

फिल्म के गाने ‘मोहब्बत है क्या चीज हमको बताओ’ के लिए संतोष आनंद का नाम भी उस साल फिल्मफेयर पुरस्कारों में बेस्ट लिरिसिस्ट के तौर पर नॉमीनेट हुआ और ये पुरस्कार जीता भी संतोष आनंद ने ही।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
यहां गायक अनवर को लेकर भी एक किस्सा है फिल्म ‘प्रेम रोग’ का। अनवर को इस फिल्म के सारे गानों के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल लेकर आए थे। उनको लगा कि राज कपूर की फिल्म के लिए गाने का मौका मिल रहा है तो अनवर तो अपना ध्यान सिर्फ गाने पर लगाएंगे, पैसे की बात करने की भला राज कपूर के सामने अनवर की क्या औकात। लेकिन, अनवर ठहरे अपने पिता की तरह अक्खड़। अनवर के पिता आशिक हुसैन कभी मशहूर संगीतकार गुलाम हैदर के सहायक हुआ करते थे। सितार और हारमोनियम वह बहुत खूब बजाते थे। अभिनेता अरशद वारसी के पिता भी यही आशिक हुसैन हैं। हालांकि, दोनों की मांएं अलग हैं। अनवर को शोहरत फिल्म ‘जनता हवलदार’ के गानों ‘हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमको मिली’ और ‘तेरी आंखों की चाहत में मैं सब कुछ भुला दूंगा’ से मिली।

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अनवर का नाम हुआ तो उनका गुमान भी बढ़ा और एक दिन उन्होंने राज कपूर के सामने फिल्म ‘प्रेम रोग’ के हर गाने के लिए छह हजार रुपये लेने की मांग कर दी। पैसा राज कपूर के लिए बड़ी बात नहीं थी लेकिन बताते हैं कि अनवर ने जिस रुआब से पैसे मांगे, उसने राज कपूर को नाखुश कर दिया। बात ऋषि कपूर तक पहुंची और उन्होंने तुरत फुरत फैसला लिया। अनवर को फिल्म से बाहर किया और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से कहा कि फिल्म के बाकी गाने सुरेश वाडेकर गाएंगे।

संतोष आनंद के अलावा राज कपूर ने इस फिल्म के लिए बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट एडीटर और बेस्ट फिल्म के फिल्मफेयर अवार्ड जीते। पद्मिनी कोल्हापुरे को मिला इस साल का बेस्ट एक्ट्रेस अवार्ड। फिल्म ‘प्रेम रोग’ करते समय पद्मिनी सिर्फ 16 साल की थी और जब उन्हें ये पुरस्कार मिला तब वह 17 साल की थीं। यह भी एक रिकॉर्ड है। डिंपल ने भी फिल्म ‘बॉबी’ के लिए 17 साल की उम्र में ही ये पुरस्कार जीता था लेकिन उन्हें ये पुरस्कार ‘अभिमान’ के लिए जया भादुड़ी के साथ साझा करना पड़ा था।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

बहुत कम लोगों को भरोसा होता था कि पद्मिनी इतनी कम उम्र में इतना कठिन किरदार कर ले जाएंगी। लेकिन राज कपूर को पद्मिनी की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। चार साल पहले ही उन्होंने इस किशोरी को जीनत अमान के बचपन के रोल में फिल्म ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ में निर्देशित किया था। फिल्म ‘प्रेम रोग’ के अलावा इस साल पद्मिनी कोल्हापुरे की संजय दत्त के साथ फिल्म ‘विधाता’ भी ब्लॉकबस्टर फिल्म रही और इन दोनों की कामयाबी ने पद्मिनी को एकदम से हिंदी सिनेमा की चोटी की कलाकारों में पहुंचा दिया। पद्मिनी को अपने पर इतना भरोसा था कि वह मुश्किल से मुश्किल सीन करने में भी नहीं हिचकिचाती थीं।

ऋषि कपूर उनसे काफी सीनियर कलाकार थे लेकिन एक सीन में पद्मिनी को ऋषि कपूर के चांटे मारने थे। ये सीन आठ टेक में ओके हुआ और जब ओके हुआ तो ऋषि कपूर का गाल कश्मीरी सेब की तरह लाल हो चुका था। शॉट खत्म होने के बाद तो पद्मिनी ने बहुत माफी मांगी ऋषि कपूर से लेकिन जब तक शूट चलता रहा पद्मिनी की हाथों में एक बार ज़रा सी भी मुरव्वत नहीं हुई। ऋषि कपूर ने भी इस सीन के लिए पद्मिनी की खूब तारीफ की। ऋषि कपूर और पद्मिनी की प्रोफेशनल ट्यूनिंग का किस्सा सामने आ ही गया है तो लगे हाथ आपको फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे राजीव कपूर का भी किस्सा सुना देते हैं।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया

जिन दिनों ‘प्रेम रोग’ बन रही थी, राजीव कपूर की ड्यूटी लगती थी शूटिंग से पहले सब कुछ ठीक ठाक और चाक चौबंद रखने की ताकि जब राज कपूर सेट पर पहुंचें तो सब कुछ अपनी अपनी जगह पर मिले। लेकिन, पद्मिनी कोल्हापुरे की शूटिंग जब से शुरू हुई, राजीव कपूर अपना काम ही भूल गए। वह दिन भर बस पद्मिनी के आगे पीछे डोला करते और उनसे दो बातें करके ही दिल को तसल्ली दे देते। दो चार दिन तो राज कपूर को समझ नहीं आया कि लड़के को हुआ क्या है, क्यूं वह बहकी बहकी बातें करता है और क्यों सारा काम उसका अस्त व्यस्त रहता है।

फिर किसी ने राज कपूर को बताया कि फिल्म के गाने की छोड़िए, यहां जो भंवरा फूल खिलाने की दिन रात मेहनत कर रहा है, वह उनका छोटा बेटा है। राज कपूर को गुस्सा कम ही आते लोगों ने देखा है लेकिन उस दिन राजीव कपूर की किस्मत ही खराब थी। पद्मिनी के साथ राज कपूर ने जैसे ही राजीव को देखा उन्होंने वहीं उनकी सारी लेफ्ट, राइट, सेंटर कर दी। राज कपूर को उस दिन इतना ताप कि पूछो मत, बोले, कल से ये नहीं सुधरा तो पद्मिनी फिल्म से बाहर हो जाएगी। बहरहाल इसकी नौबत आई नहीं और मामला आसानी से सुलट गया।

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प्रेम रोग - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म के जिस गाने का अभी मैंने जिक्र किया यानी कि वो गाना ‘भंवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले गया राज कंवर’, ये गाना किसने लिखा जानते हैं? ये गाना लिखा था पंडित नरेंद्र शर्मा ने। वही नरेंद्र शर्मा जिन्हें बी आर चोपड़ा ने अपनी मेगा सीरीज महाभारत का सर्वे सर्वा बनाया था। ध्यान देकर देखेंगे तो ये गाना वहीं शूट हुआ है जहां यश चोपड़ा ने फिल्म सिलसिला का मशहूर गाना ‘देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए..’ शूट किया था।

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फिल्म ‘प्रेम रोग’ के साथ कुछ और किस्से भी जुड़े हुए हैं। जैसे कि इस फिल्म में राज कपूर के दो खास असिस्टेंट आगे चलकर बड़े डायरेक्टर बने। इसमें से एक कुकू कोहली ने अजय देवगन और मधु को लेकर शानदार फिल्म बनाई ‘फूल और कांटे’ और दूसरे थे अनीस बज्मी। अनीस ने फिल्म ‘प्रेम रोग’ में क्लैप ब्वॉय का भी काम किया है। आर के स्टूडियो बनने के 30 साल बाद फिल्म ‘प्रेम रोग’ पहला मौका रहा जब शम्मी कपूर ने इस स्टूडियो की फिल्म में और राज कपूर के निर्देशन में काम किया।

फिल्म में ऋषि कपूर की मां के रोल में अभिनेत्री सुषमा सेठ निर्देशकों को इतना पसंद आईं कि उन्होंने ऋषि कपूर के लिए ये किरदार आगे चलकर ‘नगीना’,  ‘दीवाना’, ‘बोल राधा बोल’ और ‘चांदनी’ जैसी फिल्मों में भी किए। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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