जुलाई,1999 की पंद्रह तारीख। भारत-पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध। दुश्मन के हर हमले को नेस्तनाबूत करते हुए हमारी सेना आगे बढ़ रही थी। इस लड़ाई में मेरे कई साथी पाकिस्तानी हमले में जान गंवा चुके थे, तो कई गंभीर रूप से जख्मी हो गए थे। मैंने पूरे जोश के साथ मोर्चा संभाल रखा था। अचानक एक तोप का गोला मेरे करीब आकर फटा। मेरे साथी आनन-फानन में मुझे नजदीकी सैनिक अस्पताल ले गए, जहां मेरे जैसे कई सैनिक हर मिनट भर्ती हो रहे थे। अस्पताल में घायलों की कोई गिनती नहीं थी। अस्पताल में फैले अफरातफरी के माहौल में मुझे मृत घोषित कर दिया गया।
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major devender pal singh
दरअसल, जो गोला मेरे पास फटा था, उससे किसी का जिंदा बचना असंभव सरीखा होता है। हड़बड़ाहट में डॉक्टरों ने इसी आधार पर मुझे मृत घोषित कर दिया था। मुझे तुरंत मुर्दाघर ले जाया गया, जहां सौभाग्य से एक दूसरे चिकित्सक की नजर मुझ पर गई और उन्हें मेरे शरीर में हलचल महसूस हुई। उसने पाया कि मेरी सांसें चल रही हैं। मेरे लहूलुहान शरीर की अंतड़ियां खुली पड़ी थीं। डॉक्टरों के पास कुछ अंतड़ियों को काटने के सिवा दूसरा चारा न था। मेरा एक पैर भी बम के हमले से निष्क्रिय हो गया था, उसे भी तत्काल काटना पड़ा। एक सैनिक की मौत के साथ जारी इस जंग में आखिरकार मौत हार गई और अपंग ही सही, पर मैंने यह जंग जीत ली।
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मैं तमाम समस्याओं के साथ अपना एक पैर गंवा चुका था। मेरी सुनने की क्षमता भी कम हो गई और पेट का कई बार ऑपरेशन किया गया। इसके अलावा शरीर में बम के कई ऐसे महीन टुकड़े फंसे रह गए, जिन्हें तमाम कोशिशों के बावजूद बाहर निकाला नहीं जा सका। मजबूत इरादों के कारण मेरी जान तो बच गई थी, पर मुझे आगे एक नई जिंदगी जीनी थी। इसके लिए मैंने संकल्प लिया कि मैं अपनी अपंगता के बारे में न सोचकर केवल आगे बढ़ने के बारे में सोचूंगा। इलाज के दौरान मैं करीब एक साल तक अस्पताल में भर्ती रहा।
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मुझे देखकर किसी को भरोसा नहीं था कि मैं दोबारा कभी चल भी सकूंगा, पर मेरे मन में सिर्फ चलने का ही नहीं, बल्कि दौड़ने का भी विश्वास था। अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद मैंने बैसाखी के सहारे चलना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद मुझे कृत्रिम पैर लगा दिया गया। नकली पैर से चलना मेरे लिए आसान न था। हर रोज मुझे भयानक दर्द सहना पड़ता था। इसके बावजूद मैंने हर रोज विभिन्न खेलों के माध्यम से अपना अभ्यास जारी रखा।
मेरी मेहनत रंग लाई और कुछ समय बाद मैं 2009 में दिल्ली में आयोजित हाफ मैराथन दौड़ और मुंबई में हाफ मैराथन में दौड़ने का निश्चय किया और अगले दो सालों तक आयोजित होने सभी वाली मैराथन दौड़ में भाग लेता रहा। बयालीस की उम्र में ब्लेड की मदद से मैं अब तक कुल बीस मैराथन दौड़ चुका हूं। कारगिल की लड़ाई के बाद जब मैं महीनों अस्पताल में पड़ा रहा, तो न जाने कितने हिंदु्स्तानियों ने अपना खून देकर मेरी जान बचाई थी।
मैं चाहता हूं कि जिस किसी ने भी मेरी तरह अपना कोई अंग गंवा दिया है, मैं उनके लिए कुछ करूं। इसलिए मैंने फेसबुक पर एक कम्युनिटी बनाई है, ताकि ऐसे सभी लोगों को एक मंच पर इकट्ठा कर उन्हें प्रोत्साहित कर सकूं। इसके अलावा पिछले दस सालों से मैं बिना किसी बाधा के अपने 10 साल के बेटे का पालन-पोषण किसी सामान्य पिता की तरह कर रहा हूं।