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पुण्यतिथि विशेष: किस्सा मीना कुमारी की आखिरी फिल्म 'पाकीजा' का

Mon, 01 Apr 2019 01:37 AM IST
Mishra Mishra एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Meena Kumari - फोटो : social media
बात सन 1955 की है.भारतीय सिनेमा के मशहूर फिल्मकार कमाल अमरोही साहब अपनी पत्नी मशहूर फिल्म अभिनेत्री मीना कुमारी के साथ दक्षिण भारत में जीवन बिता रहे थे। वहीं उन्हें एक ख्याल आया कि जैसे शाहजहाँ ने अपनी बेगम मुमताज के लिए ताजमहल बनाया था, वैसे ही उन्हें भी अपनी मुहब्बत मीना कुमारी के लिए कुछ करना चाहिए। इसी सोच में उन्होंने फैसला किया कि वह मीना कुमारी को लेकर भारत की सबसे शानदार फिल्म बनाएंगे। कमाल अमरोही साहब चाहते थे कि इस फिल्म से मीना कुमारी बतौर एक महान अभिनेत्री भारतीय सिनेमा जगत में स्थापित हो जाएं।

बहरहाल कमाल अमरोही साहब ने मीना कुमारी को अपने मन की बात बताई और दोनों ने मिलकर सन 1958 में फिल्म का काम शुरू किया।कमाल अमरोही साहब ने जब फिल्म की स्क्रिप्ट लिखकर पूरी कर ली तो अपने साथ फिल्म के गीत लिखने के लिए मशहूर शायर कैफी आजमी, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफ भोपाली को बुलाया। इसके बाद उन्होंने फिल्म का संगीत देने के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद साहब को साइन किया।
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kamal Amrohi
फिल्म का नाम रखा गया "पाकीजा"
इसके बाद बारी आई फ़िल्म के किरदारों की कास्टिंग की। फिल्म का  मुख्य  किरदार साहिबजान का था जिसे मीना कुमारी निभा रही थी। कमाल अमरोही साहब ने सलीम जो कि एक बिजनेसमैन का रोल था, उसके लिए अभिनेता अशोक कुमार को साइन किया।

जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो यह तय किया गया कि फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट फॉर्मेट में बनेगी। मगर फिल्म की शूटिंग के शुरू होने के कुछ समय बाद भारत में रंगीन फिल्मों का दौर आ गया था। इसको देखते हुए कमाल अमरोही साहब ने फिल्म को रंगीन प्रिंट में फिर से शूट करने का फैसला किया। अभी रंगीन प्रिंट में शूटिंग शुरू हुई थी कि सिनेमास्कोप लेंस की तकनीक भारत में आ गई। कमाल अमरोही साहब ने सिनेमास्कोप लेंस रॉयलिटी बेसिस पर लेकर शूटिंग शुरू की। इसी दौरान सिनेमास्कोप लेंस से शूटिंग करते वक्त कुछ तकनीकी दिक्कतें पेश आने लगीं। जब सिनेमास्कोप लेंस निर्माता कंपनी को यह बात बताई गयी तो तो उन्होंने खेद जताते हुए फौरन लेंस को ठीक करके दिया। साथ ही, लेंस निर्माता कंपनी ने यह तय किया कि वह कमाल अमरोही साहब से लेंस की रॉयलिटी मनी नहीं लेगी और उन्हें यह लेंस एक उपहार के रूप में दे देगी।
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Dil Apna Aur Preet Parai - फोटो : social media
इस तरह शूटिंग का काम एक बार फिर सुचारू रूप से चलता रहा। 1964 आते-आते जब आधे से ज्यादा फिल्म शूट हो गई थी तभी निजी कारणों के चलते कमाल अमरोही और मीना कुमारी अलग हो गये। हालांकि उन्होंने कानूनी तौर पर तलाक नहीं लिया था मगर अब वो साथ नहीं रहते थे। इसका यह असर हुआ कि फिल्म डिब्बाबंद हो गई। लगभग 4 साल यूं ही गुजर गये और इस दौरान कमाल अमरोही साहब की एक अन्य फिल्म "दिल अपना और प्रीत पराई"रिलीज हो गई।

कमाल अमरोही साहब के लिए फ़िल्म "पाकीज़ा" अपनी मुहब्बत मीना कुमारी के लिए उनके इश्क का एक नजराना थी। अब क्यूंकि दोनों साथ नहीं थे, इसलिए फिल्म बनाने की कोई वजह नहीं थी। मगर फिल्म निर्माण में कई कलाकारों और फिल्म टेकनिशियन की रोजी रोटी और उनके परिवार की जिंदगी जुड़ी होती है। इस तरह पाकीजा जैसी बड़े बजट की फिल्म का रुकना कई लोगों के जीवन में आर्थिक संकट का कारण बन गया था।

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मीना कुमारी
इसी सब से रूबरू होते हुए कमाल अमरोही साहब ने 24 अगस्त 1968 मीना कुमारी को एक खत लिखा। खत में कमाल अमरोही साहब ने लिखा कि वो जानते हैं कि मीना कुमारी सिर्फ इस शर्त पर फिल्म पाकीजा को पूरा करेंगी अगर वो उन्हें तलाक दे दें। कमाल साहब ने आगे कहा कि उन्हें मीना कुमारी जी की हर बात मंजूर है और वह उन्हें हर तरह से आजाद करने के लिए राजी हैं। वो यह दरख्वास्त करते हैं कि कई लोगों की जिंदगी इस फिल्म के बनने से जुड़ी है इसलिए मीना कुमारी फिल्म पूरी करने में मदद करें।

इस खत के जवाब में मीना कुमारी ने कमाल अमरोही साहब को सन 1969 की शुरुवात में एक खत लिखा। खत में मीना कुमारी जी ने लिखा कि फिल्म पाकीजा उनके दिल के बेहद करीब है। वो हमेशा से फिल्म को करना चाहती थी और उन्हें फिल्म को पूरा करके बहुत खुशी मिलेगी। साथ ही, मीना कुमारी ने कहा कि वह इस फिल्म के लिए सिर्फ एक सिक्का बतौर मेहनताना लेंगी।
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meena kumari
उसी फिल्म के अभिनेता सुनील दत्त और उनकी पत्नी नर्गिस दत्त ने इस फिल्म के शूट हुए हिस्से को देखा और बहुत प्रभावित हुए। उन्हें महसूस हुआ कि यह शानदार फिल्म तो पूरी बननी चाहिए। दोनों ने कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी की मीटिंग करवाई और इस तरह फिर से एक बार फिल्म पाकीजा की शूटिंग शुरू की गई। कमाल अमरोही साहब ने मीना कुमारी जी को धन्यवाद करते हुए एक सोने का सिक्का दिया।

जब 1968 में फिल्म की शूटिंग दोबारा शुरू की गयी तो कमाल अमरोही साहब के सामने कई चुनौतियाँ थी। सबसे पहली चुनौती फिल्म की कास्टिंग और म्यूजिक को लेकर थी। फिल्म को शुरू हुए लगभग 10 साल हो गये थे और फिल्म के मुख्य अभिनेता अशोक कुमार बूढ़े हो चले थे। इसे देखते हुए कमाल अमरोही साहब ने उनके रोल सलीम के लिए एक्टर राज कुमार को साइन किया। इसके साथ ही राज कुमार की शख्सियत के हिसाब से उस रोल को बिजनेसमैन के किरदार से बदलकर एक फॉरेस्ट अधिकारी का किरदार बना दिया।  हालांकि एक्टर अशोक कुमार फिल्म में बरकरार रहे और उनके लिए एक नए रोल हाकिम साहब की रचना की गई। मगर अंत में ये तय हुआ कि अशोक कुमार साहब शहाबुद्दीन का किरदार निभाएंगे जबकि हाकिम साहब का रोल डी.के सप्रू करेंगे।
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Naushad Ali
इसके अलावा उस वक्त तक फिल्म के संगीतकार गुलाम मोहम्मद साहब की मृत्यु हो चुकी थी। साथ ही समय बीतने के साथ संगीत भी बदल रहा था। कई लोगों ने कमाल अमरोही साहब से कहा कि बदलते वक्त और संगीत के हिसाब से फिल्म में संगीतकार जोड़ी शंकर- जयकिशन को संगीत देने के लिए लिया जाए और उनसे नया संगीत बनवाया जाए। मगर कमाल अमरोही साहब ने इस बात को यह कह के ठुकरा दिया कि ऐसा करना एक मर चुके कलाकर के साथ गद्दारी होगी।

जब गुलाम मोहम्मद साहब बीमार थे तो उन्होंने संगीतकार नौशाद साहब से फिल्म का बचा हुआ संगीत करने के लिए कहा था। ग़ुलाम मोहम्मद साहब के कहने पर एक रोज जब नौशाद साहब संगीत रिकॉर्ड कर रहे थे तो ग़ुलाम मोहम्मद साहब बीमार हालत में ही रिक्शा में स्टूडियो पहुँच गये। ये देख सब हैरान रह गये। ग़ुलाम मोहम्मद साहब ने उस दिन अपनी मौजूदगी में गीत रिकॉर्ड कराया। उनके इंतकाल के बाद कमाल साहब ने बचे हुए संगीत की जिम्मेदारी नौशाद साहब को सौंप दी।
 
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meena kumari
इसके अलावा जो चीज कमाल अमरोही साहब को बहुत परेशान कर रही थी वो थी मीना कुमारी की सेहत। बेइंतहा शराब पीने की वजह से मीना कुमारी लीवर सिरोसिस की बीमारी से पीड़ित थी और उनकी सेहत दिन पर दिन बिगडती जा रही थी। इसी सब में उन्होंने फिल्म की शूटिंग करने के लिए हामी भर दी थी। एक रोज गाने की शूटिंग करते वक्त मीना कुमारी बेहोश होकर गिर पड़ी। इसके बाद कमाल अमरोही साहब ने फैसला किया कि बचे हुए डांस सीक्वेंस मीना कुमारी साहिबा के बॉडी डबल के साथ शूट किए जाएंगे।

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meena kumari
इसी दौरान एक और मजेदार घटना घटी।  जब फिल्म की शूटिंग अपने अंतिम पड़ाव में थी तो कमाल अमरोही साहब मीना कुमारी के साथ मध्यप्रदेश के एक इलाके शिवपुरी में आउटडोर शूटिंग के लिए गये थे। वापस लौटते वक्त अचानक गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया, अब दूर दूर तक कोई आबादी नहीं थी और अगली बस सुबह से पहले जाती नहीं थी। कमाल अमरोही साहब ने रात वही पर गुजारने का तय किया। अभी रात के तक़रीबन दो बजे थे की कुछ लोगों का समूह उस जगह पर आया जहां कमाल अमरोही और मीना कुमारी रुके थे। जब समूह के मुखिया को पता चला की गाड़ी में मीना कुमारी हैं तो उसने गाड़ी का दरवाजा खुलवाया और बड़े अदब के साथ कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी को अपने लोगों से मिलवाया। इसके साथ ही मुखिया ने कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी के लिए खाने पीने संगीत का अच्छा इंतजाम किया। इसी बीच मुखिया एक तेज धार वाला चाकू लेकर आया और उसने मीना कुमारी से कहा की वह उनका बहुत  बड़ा फैन है और वह चाहता है कि मीना कुमार उसके हाथ पर इस चाकू से ऑटोग्राफ दें। मीना कुमारी इस बात से घबरा गयी मगर फिर उन्होंने डरते-डरते चाकू से मुखिया के हाथ पर उसका नाम लिख दिया। किसी तरह रात गुजरी और कमाल अमरोही साहब और मीना कुमारी वापस आ गये। बाद में पता चला कि रात को मीना कुमारी से ऑटोग्राफ लेने वाला मुखिया मध्यप्रदेश का मशहूर डाकू अमृत लाल था।

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Meena kumari
बहरहाल फिल्म में शूटिंग आखिरकार 14 सालों में पूरी हुई और 4 फरवरी 1972 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म दर्शकों को बहुत पसंद आई और मीना कुमारी अपने अभिनय से सभी के दिलों में छा गई। हालांकि फिल्म आलोचकों का फिल्म को लेकर बहुत ठंडा रिस्पांस आया।

उस वक्त मीना कुमारी बहुत बीमार थीं और उन्होंने इसी बीमारी में कमाल अमरोही साहब के साथ फिल्म का प्रीमियर देखा था। फिल्म देखकर मीना कुमारी ने कहा की उन्हें ये एहसास है कि कमाल अमरोही उन्हें कितनी मुहब्बत करते हैं। मगर दुखद बात यह रही कि यह प्रीमियर उनकी जिंदगी का आखिरी प्रीमियर साबित हुआ और फिल्म रिलीज होने के 2 महीने बाद मीना कुमारी जी की मौत हो गई।

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kamal amrohi
इसका फिल्म पर बहुत गहरा असर पड़ा और देखते ही देखते फिल्म एक कल्ट क्लासिक का दर्जा हासिल करने में कामयाब रही। इस फिल्म को के.आसिफ़ की फिल्म मुगल -ए - आजम की टक्कर का करार दिया गया। मीना कुमारी ने अपने शानदार अभिनय से अपना नाम हिन्दुस्तानी फिल्मों के इतिहास में अमर कर लिया। मगर दुःख है की इस शोहरत को देखने के लिए मीना कुमारी दुनिया में नहीं रही।

इस फिल्म से जुड़ी एक बहुत खास बात जिसे बताए बिना ये किस्सा पूरा नहीं हो सकता- जब फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और एडिटिंग के लिए गई तो एडिटर डी.एन.पाई ने एक सीन काट दिया। सीन कुछ यूं था कि मीना कुमारी की शादी हो जाती है और उनकी डोली बारात के साथ जा रही होती है। इसी वक्त एक लड़की छत से खड़े होकर बड़ी हसरत से यह सब देख रही होती है। एडिटर को यह लगा कि यह सीन बेवजह फिल्म को लम्बा कर रहा है और उन्होंने सीन काट दिया।

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kamal amrohi
जब ये बात कमाल अमरोही को पता चली तो भागे भागे एडिटर के पास पहुंचे और उनके फिल्म में सीन दोबारा जोड़ने को कहा। जब एडिटर ने इसकी वजह पूछी तो कमाल अमरोही साहब  ने कहा कि इस सीन में जो लड़की छत से साहिबजान की डोली जाते हुए देख रही है, उसके मन में भी यह सपना है कि एक दिन उसकी भी बारात आएगी और उसे भी कोई इस तरह डोली में बैठाकर ले जाएगा। दरअसल, यही लड़की असली पाकीजा है। इस बात को सुनकर एडिटर ने फ़िल्म में सीन को जोड़ तो दिया मगर कमाल अमरोही साहब से पूछा कि उन्हें लगता है की कोई ये समझ पाएगा कि छत वाली लड़की की असल में पाकीजा है? इसके जवाब में कमाल साहब ने कहा कि अगर एक आदमी भी ये समझने में कामयाब रहा तो उनका फिल्म बनाना सफल हो जाएगा।

इस घटना के तकरीबन एक साल बाद एक आदमी ने कमाल अमरोही साहब को खत लिखकर यह बताया कि उसे छत पर खड़ी लड़की की तस्वीर चाहिए, जिसे देखकर उसे महसूस हुआ की वही असली पाकीजा है। कमाल साहब इस बात से बेहद खुश हुए और उन्होंने एडिटर डी.एन.पाई को बुलाया कहा की ये पढ़ो,ये वो आदमी है जिसने मेरी फिल्म देखी है।
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Meena Kumari - फोटो : social media
इसके बाद कमाल अमरोही साहब ने उस इन्सान को एक खत लिखा। ख़त में कमाल साहब ने यह इजाजत दी कि अगर वह  देश में कहीं भी इस  फिल्म को देखना चाहेगा तो वह मुफ्त में फिल्म देख सकता है।
इस तरह मीना कुमारी की आखिरी फ़िल्म "पाकीज़ा"उनके फिल्मी करियर और बॉलीवुड के इतिहास की क्लासिक फिल्म बनी। 
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