उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर 37 श्रद्धालुओं की जिंदगियों को पैरों तले रौंदे जाने के मामले की जांच एक महीने में कैसे पूरी होगी। यह सवाल अब सभी जेहन में उठने लगे हैं।
हादसे को तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन जांच टीम अभी तक भी हरकत में नहीं आई है। न कोई पूछताछ न ही बयान। साक्ष्यों को जुटाने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए गए। ऐसे में हादसे का सच कैसे सामने आएगा, इसका जवाब देने को कोई राजी नहीं है।
मौनी अमावस्या पर रेलवे स्टेशन पर भगदड़ को लेकर अधिकारी एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। राज्य सरकार ने तेजी से जांच कराकर कार्रवाई का ऐलान किया था। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के निर्देश पर जांच की जिम्मेदारी राजस्व परिषद के अध्यक्ष जगन मैथ्यूज को दी गई।
मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने जांच के बिंदु भी तय कर दिए थे और कहा था कि एक महीने में जांच पूरी कर रिपोर्ट दी जाएगी। 10 फरवरी को हादसा हुआ जबकि 13 फरवरी तक जांच टीम ने कुछ नहीं किया। हादसे के न जाने कितने चश्मदीद चले गए। साक्ष्य मिट गए या मिटा दिए गए।
मृतकों के घरवाले भी अपने शहर, गांव जा रहे हैं। चश्मदीदों से भी किसी ने संपर्क नहीं किया गया। प्लेटफार्म नंबर छह के फुटओवर ब्रिज पर मृतकों और घायलों के जो सामान पड़े थे, वह कई दिनों तक लावारिस वैसे ही पड़े रहे।
स्टेशन पर लगा कौन सा सीसीटीवी कैमरा चल रहा था, कौन सा बंद था, इसका रिकॉर्ड तीन दिन में बदला जा सकता है, इसकी फिक्र भी किसी को नहीं है।