डेंगू का दूसरा वैरिएंट ज्यादा खतरनाक है। इसलिए गांवों में काम कर रही टीम को इसके बारे में जानकारी दी जा रही है। वहीं, स्वास्थ्य विभाग के कार्यकर्ताओं और आशा को यह निर्देश दिया गया है कि सर्वे के दौरान गांवों में जिन लोगों को डेंगू हो चुका है, उन्हें ज्यादा अलर्ट रहने की सलाह दी जाए।
चिकित्सा विशेषज्ञों ने बताया कि जिन लोगों को एक बार डेंगू हो चुका है, उन पर दूसरे वैरिएंट की मार ज्यादा पड़ती है। ऐसे लोगों के डेंगू होने पर उनकी जान बचाना मुश्किल होता है। लिहाजा डेंगू होने पर तत्काल उपचार शुरू हो जाना चाहिए। दोबारा डेंगू होने पर मरीज के प्लेटलेट्स सहित अन्य पैरामीटर की निगरानी करते हुए दवाएं दी जाती हैं।
चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. डी हिमांशु का कहना है कि देश में डेंगू के चार वैरिएंट पाए जाते हैं। डेंगू एक, डेंगू दो, डेंगू तीन और डेंगू चार। डेंगू एक में जहां बुखार के साथ प्लेटलेट्स गिरते हैं। वहीं, डेंगू दो में रक्तस्राव, बुखार और शॉक लग सकता है। डेंगू तीन में शॉक बिना बुखार जबकि डेंगू चार में शॉक और बिना शॉक के बुखार हो सकता है। विभिन्न शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि मच्छरों को कार्बन डाई आक्साइड और लैक्टिक एसिड की अधिकता वाले लोग अधिक पसंद हैं। जो लोग ज्यादा कसरत करते हैं अथवा ज्यादा मेहनत करते हैं, उनके पसीने में कार्बन डाई आक्साइड और लैक्टिव एसिड की अधिकता होती है। उनके पास ज्यादा मच्छर आते हैं।
एक बार डेंगू होने पर दो से तीन साल तक उनमें एंटीबॉडी रहती है, लेकिन इस बीच डेंगू के दूसरे वैरिएंट ने हमला किया तो मरीज की जान का जोखिम बढ़ जाता है। पिछले दिनों कई ऐसे मरीज मिले हैं, जिन्हें गंभीर अवस्था में भर्ती कराया गया। ऐसे मरीजों के हर पैरामीटर को ध्यान में रखकर इलाज करना पड़ता है।
-डॉ. डी हिमांशु, संक्रामक रोग यूनिट प्रभारी, केजीएमयू