बसपा सुप्रीमो व उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को नोएडा व लखनऊ में अपनी व पार्टी केचुनाव चिन्ह %हाथी’ में खर्च की गई राशि को सरकार को लौटाना पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मायावती को कड़ा झटका देते हुए कहा है कि हमारा ऐसा मानना है कि मायावती को लखनऊ और नोएडा में बनाई गई इन मूर्तिर्यों पर हुए खर्च को सरकार को लौटाना होगा। आरोप है कि मायावती ने सरकारी खजाने से करीब 1100 करोड़ रुपये खर्च कर इन मूर्तियों को बनवाया था।
चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने इसे सरकारी खजाने का दुरूपयोग मानते हुए मायावती को इसकेलिए तैयार रहने के लिए कहा है। पीठ ने दो अप्रैल को इस मसले पर विस्तृत सुनवाई करने का निर्णय लिया है। पीठ वकील रविकांत द्वारा वर्ष 2019 में दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें मूर्तियां बनाने केखिलाफ याचिका दायर की गई थी।
पीठ ने मायावती की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश खन्ना को अपना नजरिया बताते हुए कहा %आप अपने मुवक्किल को इसके लिए तैयार रहने के लिए कहिए।’ खन्ना और बसपा की ओर से पेश वकील सतीश मिश्रा ने पीठ ने कहा कि सुनवाई मई महीने में की जाए। संभव है कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर सुनवाई की तारीख मई में करने की गुहार की गई हो।
लेकिन पीठ ने उनकेआग्रह को ठुकरा दिया। सुनवाई की तारीख मई में करने के आग्रह पर नाराजगी जताते हुए चीफ जस्टिस ने कहा, हम सुनवाई नहीं टाल सकते। आप हमें और कुछ कहने को मजबूर न करें। हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं लेकिन कहना नहीं चाहते।’ शीर्ष अदालत वकील रविकांत की याचिका पर सुनवाई कर रही है।
याचिका में कहा गया है कि वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री बनने के बाद बसपा के चुनाव चिह्न हाथी सहित अन्य मूर्तियों के निर्माण पर किए गए मूर्तियों पर हजारों रुपये खर्च करना सरकारी खजाने का दुरूपयोग है। मूर्तियों केनिर्माण में 10 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए जो पैसे का आपराधिक दुरूपयोग है। इस बारे में मायावती का कहना था मूर्तियों का निर्माण उस वक्त के प्रावधानों केतहत किया गया था, ऐसे में यह न्यायिक परीक्षण केदायरे में नहीं आता।
वहीं यूपी सरकार की ओर कहा गया था कांशीराम और मायावती की हर मूर्ति पर 6.65 करोड़ रुपये खर्च हुए थे जबकि हर हाथी पर करीब 70 लाख रुपये खर्च हुए थे। वर्ष 2012 में जब अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कहा था कि मूर्तियों को बनाने में मायावती ने करीब 1100 करोड़ सरकारी पैसे खर्च किए। उन्होंने लोकायुक्त को इस मामले की जांच करने के लिए कहा था। लोकायुक्त की रिपोर्ट के आधार पर सतकर्ता विभाग ने वर्ष 2014 में यूपी सतर्कता विभाग ने इस संबंध में शिकायत दर्ज की थी। लोकायुक्त की रिपोर्ट में मायावती, तत्कालीन सहयोगी व कुछ पूर्व मंत्रियों पर सैंडस्टोन की खरीदी में अनियिमतता की बात कही थी।
जिले में स्मारकों पर ढाई हजार करोड़ से ज्यादा हुए थे खर्च
बसपा शासनकाल में नोएडा व ग्रेटर नोएडा में मूर्तियों पर पानी की तरह पैसा बहाया गया। नोएडा स्थित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल, बादलपुर स्थित कांशीराम स्मारक और जीबीयू में मूर्तियां लगवाई गईं। इन तीनों जगहों पर लगी मूर्तियों का खर्च नोएडा व ग्रेटर नोएडा प्राधिकरणों ने उठाया।
इन तीनों पर ढाई हजार करोड़ रुपये से अधिक का खर्च हुआ। इन्हें बनाने के लिए ज्यादातर पत्थर धौलपुर से मंगवाए गए थे। ग्रेटर नोएडा को इसके लिए भारी-भरकम कर्ज भी लेना पड़ा। इसकी वजह से प्राधिकरण कर्ज में डूबता चला गया। मौजूदा समय में भी 7000 करोड़ रुपये का कर्ज ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण पर है। इनके रखरखाव पर भी मोटी रकम खर्च हो रही है।