यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज कुमार जायसवाल और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की खंडपीठ ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की एक रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लेकर दाखिल जनहित याचिका पर दिया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि बंदीगृह में 223 महिला बंदी हैं, जिनमें लखनऊ की सिर्फ 16 हैं।
शेष प्रदेश के अन्य दूरदराज के स्थानों से हैं, जिनके परिजन व रिश्तेदार शायद ही उनसे मिलने आ पाते हैं। इससे महिला बंदियों में अवसाद पनपता है। अदालत ने कहा कि बंदियों में दंड व सुधार की प्रक्रिया साथ-साथ चलनी चाहिए।
इसे पूरी शिद्दत से चलाया जना चाहिए क्योंकि खास जरूरत महिला बंदियों को समाज की मुख्य धारा में लाने की है। कोर्ट ने कहा कि बंदियों को परिजनों से मिलने में अगर बाधा आती है तो इससे उनकी सुधार की प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
इससे राज्य की हिरासत में रहने वाली महिला बंदियों के मानवाधिकारों को भी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में यह जरूरी है कि महिला बंदियों को उनके शहर, कस्बे व ग्राम से नजदीकी जगहों पर रखा जाए। नारी बंदीगृह जिसे वास्तव में सुधारगृह होना चाहिए को हर मंडल मुख्यालय पर होना चाहिए।