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नारी बंदी गृहों के मामले में हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से 10 दिनों में मांगी रिपोर्ट

Tue, 03 Dec 2019 02:27 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रत्येक मंडल में नारी बंदीगृह बनाने के मामले में प्रदेश सरकार की ओर से रिपोर्ट पेश न करने पर सख्त रुख अपनाया है। हालांकि, सरकारी वकील की गुजारिश पर कोर्ट ने रिपोर्ट पेश करने के लिए 10 दिन का समय और दिया है। 

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वहीं, नारी बंदीगृह बनाने के मुद्दे पर सरकार के निर्णय को पेश करने के लिए प्रमुख सचिव गृह को निजी हलफनामा दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 10 दिन बाद नियत की गई है।

दरअसल, कोर्ट ने स्थानीय नारी बंदी गृह की महिला बंदियों संबंधी एक रिपोर्ट पर संज्ञान लेकर कहा था कि प्रदेश के हर मंडल मुख्यालय पर ये बंदीगृह बनाने चाहिए, जिससे महिला बंदी अपने परिवारीजनों और संबंधियों से आसानी से मिल सकें। 
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कोर्ट ने सरकार को लखनऊ नारी बंदी गृह के हालात की विस्तार से रिपोर्ट दाखिल करने और मंडलीय नारी बंदीगृहों की स्वीकार्यता पर गौर कर निर्णय की जानकारी मांगी थी।

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बंदियों में दंड व सुधार की प्रक्रिया साथ-साथ चले

यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज कुमार जायसवाल और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की खंडपीठ ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की एक रिपोर्ट पर स्वत: संज्ञान लेकर दाखिल जनहित याचिका पर दिया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि बंदीगृह में 223 महिला बंदी हैं, जिनमें लखनऊ की सिर्फ 16 हैं। 

शेष प्रदेश के अन्य दूरदराज के स्थानों से हैं, जिनके परिजन व रिश्तेदार शायद ही उनसे मिलने आ पाते हैं। इससे महिला बंदियों में अवसाद पनपता है। अदालत ने कहा कि बंदियों में दंड व सुधार की प्रक्रिया साथ-साथ चलनी चाहिए। 

इसे पूरी शिद्दत से चलाया जना चाहिए क्योंकि खास जरूरत महिला बंदियों को समाज की मुख्य धारा में लाने की है। कोर्ट ने कहा कि बंदियों को परिजनों से मिलने में अगर बाधा आती है तो इससे उनकी सुधार की प्रक्रिया गंभीर रूप से प्रभावित होती है। 

इससे राज्य की हिरासत में रहने वाली महिला बंदियों के मानवाधिकारों को भी नुकसान पहुंचता है। ऐसे में यह जरूरी है कि महिला बंदियों को उनके शहर, कस्बे व ग्राम से नजदीकी जगहों पर रखा जाए। नारी बंदीगृह जिसे वास्तव में सुधारगृह होना चाहिए को हर मंडल मुख्यालय पर होना चाहिए। 
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