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28 हजार कछुओं की जान बचा अरुणिमा बनीं ‘अर्थ हीरो’

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सचिन त्रिपाठी
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राजधानी की शोधार्थी अरुणिमा सिंह ने आठ साल में 28 हजार से ज्यादा कछुओं की जान बचाकर मिसाल कायम की है।
उनके इस काम को रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड ने विलुप्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए हो रहे कार्यों में सर्वश्रेष्ठ मानते हुए उन्हें ‘नेटवेस्ट अर्थ हीरोज’ अवार्ड से सम्मानित किया है। अरुणिमा वर्ष 2013 से कछुओं के संरक्षण के कार्य में लगी हैं।
जंतु विज्ञान विषय में कछुओं की एक विशिष्ट प्रजाति पर इंटीग्रल यूनिवर्सिटी से शोध कर रहीं अरुणिमा सिंह बताती हैं कि वर्ष 2011 में लखनऊ विवि से एमएससी की पढ़ाई के दौरान उन्होंने वाइल्ड लाइफ पर अपना प्रोजेक्ट तैयार किया था।
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लविवि की शिक्षक डॉ. गीतांजलि मिश्रा से प्रेरणा मिलने के बाद उन्होंने इस दिशा में आगे काम करने का फैसला किया।
इसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में वह कुकरैल स्थित घड़ियाल सेंटर पहुंचीं तो पता चला कि कछुओं तथा अन्य वन्यजीवों के रेस्क्यू के दौरान उनको काफी चोट पहुंचती है।
यही नहीं उनका इलाज बहुत सावधानी के साथ करने की जरूरत होती है। इसलिए घर के आसपास या रास्ते में जब कछुआ या फिर कोई अन्य जीव मिलता तो इलाज के बाद उसे सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का सिलसिला किया।
वर्ष 2013 में टर्टल सर्वाइवल एलाइंस के साथ जुड़कर इसे व्यवस्थित अंदाज में शुरू किया। इसलिए हर कछुए के रेस्क्यू के बाद उसका पूरा रिकॉर्ड रखना शुरू किया।
वर्ष 2021 तक यह आंकड़ा 28 हजार तक पहुंच गया। इस उपलब्धि पर उन्हें अर्थ हीरोज अवॉर्ड मिला। इस सम्मान से उत्साहित अरुणिमा ने बताया कि उनका जीवन पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षण को ही समर्पित रहेगा।
पारिस्थितिकी तंत्र के लिए मददगार है कछुआ
अरुणिमा के अनुसार देश में इस समय कछुओं की कुल 29 प्रजातियां मिलती हैं। उत्तर प्रदेश में 15 और गोमती नदी में इस समय सिर्फ छह प्रजातियां ही पाई जाती हैं। कछुओं की हर प्रजाति अलग-अलग स्वभाव की होती हैं। कुछ प्रजातियां मुर्दे तो कुछ मछली व कीड़े खाने वाली होती हैं। इसकी वजह से पारिस्थितिकी तंत्र बना रहता है। पानी को साफ रखने में कछुओं की बड़ी भूमिका होती है।
लखनऊ में विलुप्त होने की कगार पर तीन प्रजातियां
लखनऊ और आसपास के क्षेत्र में मुख्य रूप से गोमती में पायी जाने वाली इंडियन सॉफ्टसेल, इंडियन पीकॉक सॉफ्टसेल और क्राउंड रिवर टर्टल ऐसी प्रजातियां हैं, जो विलुप्त होने की कगार पर हैं। इनके संरक्षण की जरूरत है।
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अंधविश्वास और मांस के लिए होती है तस्करी
भारत से कछुओं की तस्करी पश्चिम बंगाल के रास्ते होती है। बंगाल से बांग्लादेश और वहां से चीन, हांगकांग, थाईलैंड व मलयेशिया पहुंचाए जाते हैं। चीन समेत कई देशों में कछुए से बने सूप व डिश की काफी मांग है। उधर, अंधविश्वास के चलते भी तस्करी होती है।
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