पदक के साथ आदित्या यादव (बायें) व पिता-भाई के साथ आदित्या।
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‘खुद शटलर हूं, इसलिए आदित्या को सिखाने में अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा। शुरुआत में बिटिया हमारे साथ ही रेलवे के बैडमिंटन कोर्ट में जाती थी। चूंकि बेटा भी शटलर है तो हम आपस में मैच खेलकर आदित्या को ट्रेनिंग देते थे। हमें खलते देखकर उसने बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया। बस, यहीं से आदित्या के शटलर बनने का सपना शुरू हुआ और आज परिणाम सबके सामने हैं।’
यह कहना है डेफ ओलंपिक की बैडमिंटन स्पर्धा में भारत को स्वर्ण दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाली 12 वर्षीय शटलर आदित्या यादव के पिता दिग्विजय यादव का, जिन्हें आज अपनी बिटिया के प्रदर्शन पर गर्व है।
अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने बताया कि वैसे तो आदित्या ने ओलंपिक में युगल विशेषज्ञ के तौर पर प्रतिभाग किया, लेकिन एकल में भी वह कोर्ट पर उतनी ही बेहतरीन खिलाड़ी है। बतौर एकल शटलर आदित्या ने वर्ष 2019 में अंडर-19 वर्ल्ड डेफ बैडमिंटन चैंपियनशिप में प्री क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय किया। इसके बाद कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन का वक्त बेहद मुश्किल रहा। इस दौरान मैंने आदित्या को घर ट्रेनिंग दी।
लॉकडाउन में छूट मिलने पर घर के पास की एक प्राइवेट बैडमिंटन अकादमी में जाता था, जहां के सिंथेटिक कोर्ट में ट्रेनिंग कराने से आदित्या के प्रदर्शन में निखार आया। दिग्विजय ने बताया कि ब्राजील में डेफ ओलंपिक खेलने गई आदित्या अपने साथियों में सबसे छोटी थी, जहां उसे भरपूर प्यार मिला। वहां मिला स्वर्ण टीम के खिलाड़ियों के बीच बेहतर तालमेल का नतीजा था। उम्मीद है कि आदित्या का यह सफर आगे भी जारी रहेगा।