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World Earth Day 2019: विलुप्त हो चुकी हैं पौधों की ये 6 प्रजातियां

Mon, 22 Apr 2019 05:31 PM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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प्रकृति ने पृथ्वी पर दसियों लाख किस्म के जीव-जंतु रचे, बहुतों के बारे में तो हम जानते भी नहीं हैं, लेकिन मानवीय गतिविधियों ने इन्हें भीषण नुकसान पहुंचाया है। इसकी वजह से ये न केवल लुप्त हो रही हैं, बल्कि लुप्त होने की रफ्तार भी तेजी से बढ़ी है। विश्व वन्यजीव संगठन के अनुसार, अगर मान लें कि पृथ्वी पर 10 करोड़ प्रकार के जीव जंतु हैं और हर वर्ष 0.01 प्रतिशत लुप्त हो रहे हैं, तब भी हम हर साल 1 हजार जीवों को हमेशा के लिए खो बैठते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हर वर्ष हम 200 से दो हजार जीव-जंतुओं का अस्तित्व पृथ्वी से मिटाते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पृथ्वी से पहले भी बड़ी संख्या में जीव खत्म नहीं हुए। अब तक पांच दफा पृथ्वी से जीवन खत्म हुआ है, विशेष परिस्थितियों में 60 से 90 प्रतिशत तक जीवन खत्म हुआ है, लेकिन वह प्राकृतिक वजहों से था।

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इतनी विविधता है देश में
यूनाइटेड नेशन कन्वेशन ऑन बॉयोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) जैविक विविधता का पूरा डाटा जुटाता है। भारत भी देश में मौजूद जैविक विविधता की सूची लगातार अपडेट करता है। पिछली रिपोर्ट के अनुसार यह है देश की स्थिति।
- 45 हजार प्रजातियां हैं पेड़-पौधों की
- 91 हजार जीवों की प्रजातियां
- 8.58 प्रतिशत स्तनधारियों की प्रजातियां
- 13.66 प्रतिशत पक्षियों की प्रजातियां भी
- 7.91 प्रतिशत उभयचर और 4.66 प्रतिशत मछलियां
- 11.80 प्रतिशत का आंकड़ा पेड़-पौधों के मामले में

ऐसे वृक्ष जो खत्म मान लिए गए
होपिया शिंकेंग- पूर्वी हिमालय में पाया जाने वाला यह पेड़ भी काफी बड़ी संख्या में मिला करता था। बीते 100 वर्ष में इसे किसी ने नहीं देखा है।
आज स्थिति- चीन का दावा है कि यह दक्षिण पूर्वी तिब्बत में मौजूद है। हालांकि वैज्ञानिकों को दावे में शंका है क्योंकि इसकी केवल 300 से 600 मीटर की ऊंचाई पर ही पनपने की संभावना कम है।

आइलेक्स गार्डनेरियाना- सदाबहार प्रजाति का यह वृक्ष भी आईयूसीएन लिस्ट के अनुसार भारत में खत्म हो चुका है।
आज स्थिति- इसके लुप्त होने के पीछे जंगलों का खत्म होना वजह मानी जा रही है।

मधुका इंसिग्निस- कर्नाटक में पाया जाने वाला यह पौधा भी कई दशकों से नहीं देखा गया।
आज स्थिति- आईयूसीएन की 1998 में जारी सूची में इसे विलुप्त की श्रेणी में रखा गया है।
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स्टरकुलिया खासियाना- मेघालय के खासी जनजातीय पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाने वाला यह पौधा भारत से खत्म हो चुका है।
आज स्थिति- आईयूसीएन ने इसे भी लुप्त हो चुके पादपों की श्रेणी में रखा है। इसकी सह प्रजातियों के जरिए इसे फिर से जंगल में लौटाने का प्रयास किया जा रहा है।

लेकिन फिर से मिल ये दो पेड़
वेंडलैंडिया एंगस्टिफोलिया- तमिलनाडु की क्षेत्रीय प्रजाति का यह वृक्ष विलुप्त करार दे दिया गया था।
आज स्थिति- 1998 में इसके कल्लकड़ टाइगर रिजर्व में फिर से मिलने की पुष्टि हुई है। हालांकि आईयूसीएन सूची में अब भी इसे विलुप्त दर्शाया जा रहा है।

साइनोमेट्रा बेड्डोमेई - देश के पश्चिमी घाट पर मिलने वाला यह वृक्ष 1870 से लुप्त माना जा रहा है। केरल में कभी यह काफी संख्या में होता था।
आज स्थिति- करीब 20 वर्ष पहले इसे केरल में फिर से देखा गया। वायनाड और तिरुवनंतपुरम में दर्ज इसकी मौजूदगी को फिलहाल आईयूसीएन लिस्ट में अपडेट नहीं किया गया है।
 
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