सड़क के किनारे खड़ी भीड़ देख रही थी बड़े-बड़े बैनरों को जो लोग हाथों में लोग लिए हुए थे जिसमें सिख धर्म की शिक्षा दी गयी थी और जो धार्मिक सीख के साथ-साथ नारों सा आकर्षक लग रहे थे। ये सन्देश नार्वेजीय भाषा में लिखे थे ताकि नार्वे के सभी लोग पढ़ सकें। गुरुद्वारों के सामूहिक प्रयास से आयोजित यह विशाल नगर कीर्तन का आयोजन बहुत ही संतुलित और अनुशसित लग रहा था।
दसवां पग (पगड़ी) दिवस मनाया गया
नगरकीर्तन स्पीकर सुप्पा से होता हुआ एक बड़ी सभा में यूनिवर्स्टी अउला के सामने बदल गया जहां तरह-तरह के निशुल्क स्टाल लगे थे। यहां एक ऊंचा मंच बना था जहां केसरिया परिधान में हाथों में कृपाण लिये पांच प्यारों के साथ नीली परिधान और पगड़ी पहने हाथों में धवज लिए महिलायें भी दाहिनी और खड़ी थीं। जिसमें गुरुद्वारा समिति के अध्यक्ष सुरजीत सिंह और भारतीय राजदूत कृष्ण कुमार जी ने सम्बोधित किया और सभी को बधाई दी। स्पीकर सुप्पा में बहुत लम्बी कतार कार्यक्रम शुरू होने से आधे घंटे पहले लग गयी थी। इन्हें यहां प्रवेश करते ही प्रसाद के रूप में जलपान और प्रदर्शनी के साथ साथ निशुल्क पग (पगड़ी) बांधी जा रही थी जो ओस्लो में सर्वाधिक आयोजनों में से एक है। यह कतार शाम पांच बजे तक लगी रही। हजारों लोगों को लंगर यानी निशुल्क भोजन कराया जा रहा था। स्पीकर सुप्पा में एक ओर खुले मंच पर प्रधानमंत्री श्रीमती अर्ना सूलबर्ग ने कहा कि हम अनेकता लिए हुए हैं यह हमारी विशेषता हैं। उन्होंने वैसाखी और दसवें पग दिवस पर बढ़ाई देते हुए कहा कि भारतीयों ने नार्वे में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा तरक्की की है।
भारतीय और नार्वेजीय दोनों रंग-बिरंगे भारतीय परिधान में बहुत आकर्षक लग रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे भारत के पंजाब प्रान्त में आ गये हैं। बहुत से पुरुषों ने केसरिया पग और पोशाक और महिलाओं ने नीली पग और पोशाक पहने अपने हाथ में सिख धर्म के ध्वज लिए हुए थे। इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी लोग आसानी से देखे जा सकते थे। बहुत से कार्यकर्ता सिख धर्म और बैसाखी और पगड़ी दिवस पर पर्चे बांट रहे थे जो नार्वेजीय भाषा में थे। इस सड़क के रास्ते में एक ओर पार्लियामेन्ट और दूसरी ओर ग्राण्ड होटल जहां नोबेल पुरस्कार विजेता ठहरते हैं। इतना ही नहीं विश्व प्रसिद्द नाटककार हेनरिक इबसेन अपने अंतिम वर्षों में रोज ग्रांड होटल में खाना खाने आया करते थे जो समय के बहुत पाबंद थे।
भारतीय राजदूत कृष्ण कुमार जी ने अपने सन्देश में वैसाखी के साथ-साथ अष्टमी पर बधाई दी और जलियांवाले बाग़ की सौवीं शहीदी दिवस को याद करते हुए शहीदों को श्रद्धांजलि दी। भारतीय और सिख समुदाय को नार्वे में भारत की छवि उज्जवल किये जाने के लिए हार्दिक बधाई दी। कार्यक्रम का सफल संचालन कर रहे थे सुमीत सिंह पटपटिया। ओस्लो की मेयर श्रीमती मारियाने बोर्गेन, ऊला एल्वेस्तूएन, सांसद हिमांशु गुलाटी, दूतावास से श्रीमती अरूनधती दास, प्रमोद कुमार, कविता लिखने वाले अमर जीत जी उपस्थित थे और सभी को बधाई दे रहे थे। बैसाखी कार्यक्रम कमेटी के परमजीत सिंह, पंजाबी स्कूल नार्वे की बलविंदर कौर, एकमात्र हिंदी और नार्वेजीय पत्रिका के सम्पादक, नाटककार -स्वयं लेखक, प्रेबलीन लीन कौर, कलाकार लवलीन कौर, संगीता शुक्ल और अनेक प्रतिष्ठित भारतीय और नार्वेजीय लोग मौजूद थे।
पर्यावरण केंद्र
यहां एक और पांडाल में पर्यावरण केंद्र था जहां लोग अपनी खाई हुयी थाली, चम्मच, कप और गिलास तथा अन्य चीज फेंकने के लिए जमा कर रहे थे। अभूत से युवा और बुजुर्ग तथा बच्चे स्वयं सेवी इस पर्यावरण को सुरक्षित करने में लगे थे.।जमीन पर कहीं भी कूड़ा नजर नहीं आ रहा था स्वयंसेवी के साथ-साथ भाग लेने वाले लोग भी सफाई का ध्यान दे रहे थे और पर्यावरण केंद्र में अपनी खाई प्लेट और गिलास जमा कर रहे थे।