तीज त्योहारों का रंग भारत को दुनिया में सबसे अनूठी तस्वीर प्रदान करता है। अलग अलग त्योहार और उनसे जुड़ी अलग अलग परंपराएं। दाम्पत्य जीवन से जुड़ा हिंदू त्योहार 'हरतालिका तीज' ऐसा त्योहार है, जो बाकी सारी परंपराओं के साथ ही महिलाओं की रचनात्मकता को भी मंच देता है। इस त्योहार के जरिये शिव और पार्वती के अटूट और दृढ़ प्रेम को जीवन मे उतारने की प्रेरणा मिलती है। साथ ही प्रकृति से जुड़ने और कम संसाधनों में भी उत्सव मनाने की प्रेरणा भी। जानिए कैसे?
शिव और गौरी प्रतीक हैं सहज, सरल, सुखमय और दीर्घ वैवाहिक जीवन का। यही कारण है कि श्रावण सोमवार से लेकर सोलह सोमवार तक के कठिन व्रत शिव शंकर जैसे पति को पाने की आकांक्षा से किए जाते हैं। कितनी कहानियां, कितनी कथाएं, शिव-पार्वती से प्रेरित हैं।
सादा जीवन उच्च विचार
हरतालिका की पूजा में आस पास मौजूद पत्तियों और फूलों से सजावट करनी होती है। साथ ही बालू (रेत) और काली मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनानी होती है। मौसमी फल और फूल पूजा में चढ़ाए जाते हैं। कहा जाता है कि भोले भंडारी बिना आडम्बर के प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। इसलिए उनकी पूजा अर्चना के लिए लगने वाली सामग्री भी उतनी ही सादी है। यह प्रेरणा देता है कि यदि जीवन में रिश्तों में मजबूती और मन में प्रेम हो तो कम साधनों में भी उत्सव और उल्लास संभव है।
आपसी विश्वास और सम्मान
भोलेनाथ और गौरी मैया की जोड़ी कड़ी तपस्या और विघ्नों के बाद बनी। जिस तरह गौरी माता ने कठिन व्रत और दृढ़ संकल्प के साथ भगवान शिव को ही वर के रूप में पाने की इच्छा की थी और शिव शंभू ने उनका मान रखते हुए उनका वरण किया, वह इस बात की प्रेरणा देता है कि यदि आप अपने प्रेम के प्रति सच्ची भावना से समर्पित हैं, तो मन से वह रिश्ता जुड़ेगा और जुड़ा रहेगा। ठीक इसी तरह पार्वती के अपमान से क्रोधित हो शिव ने रौद्र रूप दिखाया था। वह प्रेरणा देता है कि जीवनसाथी का सम्मान रिश्तों का सम्मान है। दाम्पत्य जीवन में एक का सम्मान, दूसरे का मान होना चाहिए।
रचनात्मकता और कला का संगम
आपने कथाओं में शिव-गौरा को कभी चौपड़ खेलते, कभी कहानियां कहते तो कभी भ्रमण पर साथ जाते सुना या पढ़ा होगा। इसी तरह हरतालिका तीज पर रात्रि जागरण, गीत, संगीत, नृत्य, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों से सजावट, आदि रचनात्मक गतिविधियां महिलाओं के लिए एकरसता से बाहर आने का बहाना बन जाती हैं।
ध्यान रखें
एक बात हमेशा ध्यान रखें। व्रत, उपवास और त्योहार हमारी आस्था, उल्लास और खुशियों का प्रतीक हैं। इनके लिए मन में भावना और सम्मान रखें, न कि सिर्फ कर्मकांड करने पर जोर दें। यदि आपकी सेहत व्रत नहीं सहन कर सकती, आप किसी बीमारी से ग्रस्त हैं या गर्भवती हैं, हाल ही में आपने बच्चे को जन्म दिया है तो ऐसी स्थिति में निर्जला व्रत करने से बचें। आप ईश्वर की कृति हैं और ईश्वर कभी भी आपको तकलीफ पाकर त्योहार मनाते नहीं देखना चाहेगा। तो उत्सव मनाइए मन से।