आधुनिक युग में भागदौड़ भरी जिंदगी में आदमी आज अपना सुकून खोता जा रहा है। तनाव के इस दौर में आदमी को इसका पता भी नहीं चल पा रहा है। पीछे दरवाजे से इस वजह से उसको कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। अति तनाव, सिर दर्द, शुगर कुछ ऐसी ही बीमारियां हैं जो हर दूसरे-तीसरे आदमी में देखने को मिल रही हैं। तनाव की वजह से ही इन बीमारियों के अलावा लकवा भी आम इंसान को अपनी गिरफ्त में ले लेता है। ब्लड प्रेशर और तनाव की वजह से कइयों को इसका अटैक पड़ा है। ऐसी भयंकर बीमारी को दूर करने के लिए दिल्ली रोहिणी स्थित जयपुर गोल्डन हॉस्पीटल की फिजीओथेरेपी विभाग की हेड डॉ मीनाक्षी राजपूत काफी सक्रिय हैं। लगभग 10 साल का अनुभव रखने वाली मीनाक्षी फिजीओथेरेपी से लकवे का सफल इलाज कर रही हैं। बातचीत में उन्होंने इस बीमारी पर विस्तार से प्रकाश डाला।
डॉ. मीनाक्षी के अनुसार स्ट्रोक अपने आप मे बीमारी नही है. प्रायः, ये कई अन्य बीमारियों का दुष्परिणाम है, जैसे- हाइपरटेंशन, मधुमेह, खून की नलिकाओं मे रक्त का थक्का बनना आदि। जब हमारे मस्तिष्क के किसी हिस्से में खून ठीक से नहीं पहुंचता,चाहे उसका कारण कुछ भी हो, तो उस हिस्से के सूक्ष्म कोशिकाएं मृत हो जाती हैं। इन कोशिकाओं के काम बंद करने से शरीर का एक हिस्सा लकवे का शिकार हो जाता है। स्ट्रोक से दिमाग़ को होने वाले नुकसान की भरपाई यानी मृत ब्रेन सेल्स को दोबारा जीवित करना तो असंभव है। हालांकि, यदि इसका समय रहते इलाज़ किया जाए तो नर्व सेल्स के मृत होने की प्रक्रिया पर काफ़ी हद तक काबू ज़रूर पाया जा सकता है।
वर्जिश बहुत जरुरी...
स्ट्रोक से होने वाला दुष्प्रभाव इस बात पे निर्भर करता है की ब्रेन के कितने बड़ा हिस्से को नुक़सान पहुंचा है. ऐसे लगभग 10 प्रतिशत मरीज़ जिनके नर्व सेल्स पूरी तरह नष्ट होने से बच गए थे, उनके सेल्स दोबारा काम करना शुरु कर देते हैं और इसलिए वे समय से साथ स्वतः ठीक हो जाते हैं। स्ट्रोक से लगभग 40 प्रतिशत मरीज़ मामूली रूप से तथा 30 प्रतिशत गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं, इन्ही 70 प्रतिशत मरीज़ों को न्यूरो फिज़ियो थेरपी और न्यूरो रीहॅबिलिटेशन की सबसे ज़्यादा आवश्यकता होती है तथा इन्हें ही सबसे ज़्यादा इसका फायदा भी होता है. बाकी 10-12 प्रतिशत लोग गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं जबकि 8-10 प्रतिशत लोगों की गंभीर स्ट्रोक से मृत्यु हो जाती है। डॉ ने बताया, लकवे का ईलाज संभव है। धैर्य के साथ ईमानदारी से वर्जिश करते रहे।
अगर हमारे शरीर पर कहीं चोट लग जाती है तो उसके आस पास सूजन और लाली आ जाती है। ऐसे ही, स्ट्रोक में भी प्रभावित जगह पर कुछ इसी प्रकार की प्रतिक्रिया होती है जिसकी वजह से जो नर्व सेल्स मृत नहीं भी होते हैं उनका कार्य भी प्रभावित होता है। शारीरिक व्यायाम तथा संतुलित आहार ब्रेन स्ट्रोक से बचाव में बहुत कारगर हैं। योग एक कारगर साधन है खुद को फिट रखने के लिए। आप कोई भी प्राणायाम करेंगे तो आपको उससे ऊर्जा तो मिलती ही है,स्ट्रेस भी कम होता है।
स्ट्रोक के मामले में समय बेशकीमती होता है
ध्यान रहे,स्ट्रोक का एक बहुत बड़ा कारण तनाव यानी स्ट्रेस ही है। आवाज मे लड़खड़ाहट, एक तरफ़ मुंह टेढ़ा हो जाना, हाथ या पैरों में आकस्मिक कमज़ोरी आदि स्ट्रोक पड़ने के लक्षण हैं। लकवे के इलाज के बारे में कम जानकारी के कारण लोग बहुत तरह के असामान्य या अवैज्ञानिक तरीक़ो से इलाज करने लगते हैं। यह ठीक नहीं है क्योंकि स्ट्रोक के मामले में समय बेशकीमती होता है। स्ट्रोक के कारण अगर लकवा हो जाए तो फिज़ियोथैरपी बहुत कारगर होती है। अगर लकवा ग्रस्त रोगी को समय से अस्पताल पहुंचा दिया जाए तो फिज़ियोथैरपी उसके लिए वरदान हो सकती है। सही फिज़ियोथैरपी एक न्यूरो-फिज़ियोथेरपिस्ट की देख-रेख में ही हो सकती है।
हमारे मस्तिक्ष्क के दो भाग होते है! दायां, एवं बायां हमारे मस्तिक्ष्क का दायां भाग हमारे शरीर के बाएं हिस्से को नियंत्रित करता है अथवा बायां भाग हमारे दाएं हिस्से को, यदि किसी मरीज के दाएं मस्तिक्ष्क में ब्रेन स्ट्रोक हो जाये तो उसका बायां शरीर लकवा ग्रस्त हो जाता है और बाएं मस्तिष्क में ब्रेन स्ट्रोक हो तो मरीज के शरीर का दायां भाग लकवा ग्रस्त हो जाता है! न्यूरो फिजियोथेरेपी चिकित्सक, मरीज के लकवा ग्रस्त हिस्से को विभिन्न प्रकार की एक्सरसाइज और मशीनी उपकरणों द्वारा पूरे दिन में कम से कम 4 से 6 घंटो तक उपचार करते है जिससे मरीज पुनः अपने लकवा और पैरालिसिस वाले भाग को ठीक कर पाता है! ब्रेन स्ट्रोक के बाद पहले 4 से 6 महीने मरीज के लिए बहुत उपयोगी होते है और मरीज अगर सही से फिजियोथेरेपी चिकित्सा का लाभ ले तो 99 प्रतिशत तक पहले की भांति नार्मल हो सकता है!