फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Coronavirus: भारतीय वैज्ञानिकों ने बनाई अनोखी टेस्ट किट, एक घंटे में पता चल जाता है कोरोना है या नहीं

Mon, 05 Oct 2020 10:49 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
भारत में वैज्ञानिकों की एक टीम ने कोरोना वायरस की टेस्टिंग के लिए एक सस्ता पेपर-आधारित टेस्ट विकसित किया है, जो प्रेगनेंसी टेस्ट की तरह तुरंत परिणाम दे सकता है। इस टेस्ट का नाम के मशहूर काल्पनिक डिटेक्टिव के नाम पर 'फेलूदा' रखा गया है। यह टेस्ट 'क्रिस्पर' नाम की जीन एडिटिंग टेक्नोलॉजी पर आधारित है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इस टेस्ट के परिणाम एक घंटे के अंदर आ जाते हैं और इसकी कीमत सिर्फ 500 रुपये है। कोविड-19 की टेस्टिंग के लिए ये दुनिया की पहली पेपर आधारित तकनीक बन सकती है। फेलूदा की किट का उत्पादन टाटा कंपनी करेगी। 
विज्ञापन

2 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
2000 नमूनों पर हुआ परीक्षण

भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार प्रोफेसर के विजय राघवन ने बताया, 'ये आसान, भरोसेमंद और बड़े स्केल पर ले जाने लायक तकनीक है।' दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ जिनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के शोधकर्ताओं ने फेलूदा को विकसित किया है और निजी प्रयोगशालाओं में 2,000 रोगियों के नमूनों पर इसका परीक्षण किया गया है। इनमें वो नमूने शामिल हैं जो पहले ही कोरोना पॉजिटिव पाए जा चुके हैं। 

उन्होंने इस टेस्ट में 96 प्रतिशत सेंसिटिविटी और 98 स्पेसिफिसिटी पाई है - यही वो दो पैमाने हैं जिनसे किसी टेस्ट की सटीकता का पता चलता है। अगर कोई टेस्ट बहुत सेंसिटिव है तो वो लगभग हर पॉजिटिव केस को पकड़ लेगा। स्पेसिफिसिटी बीमारी के नहीं होने की सही जानकारी देने का पैमाना है। 
विज्ञापन

3 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
व्यावसायिक उपयोग के लिए मिली मंजूरी

पहला टेस्ट सुनिश्चित करता है कि गलत नेगेटिव टेस्ट कम आएं और दूसरा सुनिश्चित करता है कि गलत पॉजिटिव टेस्ट कम आएं। भारत के ड्रग रेगुलेटर ने व्यावसायिक उपयोग के लिए इस टेस्ट को मंजूरी दे दी है। भारत में कोरोना संक्रमण के 65 लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं और एक लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। 

4 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
पहले से होने वाले टेस्ट से कैसे अलग

देशभर में 1,200 से ज्यादा लैब में रोजाना कोरोना संक्रमण का पता लगाने के लिए करीब लाखों नमूनों का टेस्ट कर रहे हैं। आमतौर पर पीसीआर टेस्ट भरोसेमंद होता है और इसके लिए करीब 2400 रुपये लगते हैं। इसमें गलत पॉजिटिव या नेगेटिव नतीजे आने की संभावना बहुत कम होती है। 

एंटीजन टेस्ट में खून के सैंपल लिए जाते हैं, ये पहले हो चुके संक्रमण के लक्षण को भी पकड़ सकता है। इसमें पता चलता है कि आपके शरीर में बीमारी से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनी थी या नहीं। हालांकि, पीसीआर टेस्ट के मुकाबले ये टेस्ट अधिक गलत परिणाम देते हैं, क्योंकि अगर शरीर में वायरस है, लेकिन टेस्ट के समय तक एंटीबॉडी नहीं बनी है तो ये नेगेटिव नतीजे देगा। 
विज्ञापन

5 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैश्विक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य नीतियों के शोधकर्ता डॉ अनंत भान के अनुसार, भारत में टेस्ट की संख्या बढ़ाना आसान नहीं रहा है। उन्होंने बताया, 'अभी भी टेस्टिंग किट उपलब्ध नहीं हैं या उनके लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। हम बहुत अधिक एंटीजन टेस्टिंग कर रहे हैं जिसके कारण कई गलत नेगेटिव परिणाम आने की समस्या बनी हुई है।' 

उनका मानना है कि नई फेलूदा तकनीक एंटीजन टेस्ट की जगह ले सकती है, क्योंकि ये सस्ती है और अधिक सटीक नतीजे देगी। वहीं आईजीबीआई के डायरेक्टर अरुण अग्रवाल ने बताया, 'नया टेस्ट पीसीआर टेस्ट की तरह भरोसेभंद टेस्ट है। इनमें नतीजे जल्दी आते हैं और इन्हें छोटे लैब्स में भी आसानी से किया जा सकता है।'  
विज्ञापन

6 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
फेलूदा टेस्ट के लिए सैंपल लेने का तरीका पीसीआर टेस्ट जैसा ही है- नाक में एक स्वैब डाल कर सैंपल लिया जाता है। भारत में अभी तक थूक का सैंपल लेकर टेस्ट नहीं किए जा रहे हैं। पीसीआर टेस्ट में सैंपल को एक लैब में भेजना पड़ता है, जहां इस पर कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं। फेलूदा क्रिस्पर यानी 'क्लस्टर इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिड्रॉमिक रीपीट्स' तकनीक का इस्तेमाल करता है जो कि जीन- एडिटिंग पर आधारित है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, जीन एडिटिंग किसी वर्ड फाइल में होने वाली प्रोसेसिंग की तरह काम करती है। जैसे कि आप कंप्यूटर पर कर्सर का इस्तेमाल कर किसी फाइल में गलत शब्दों को सही करते हैं, गलत अक्षर को हटा कर उसकी जगह सही अक्षर लिखते हैं। इसी तरह जीन एडिटिंग एक जीनोम लेटर को हटा या डाल सकती है। 
विज्ञापन

7 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आमतौर पर इस तकनीक के इस्तेमाल से कोशिकाओं से जुड़ी बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है। क्रिस्पर तकनीक भी कर्सर की तरह काम करती है जो कि कोरोना वायरस के 'सिग्नेचर वाले लेटर' पर जाते हैं और उन्हें हाईलाइट करते हैं। इसके नतीजे एक पेपर पर दिखने लगते हैं। पेपर पर सिर्फ एक नीली लाइन आने का मतलब है कि नतीजा नेगेटिव है, दो नीली लाइन बताती हैं कि नतीजा पॉजिटिव है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के स्टीफन किसलर बताते हैं, 'टेस्टिंग सीमित है, हमें इसे बेहतर बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करने होंगे। इसलिए फेलूदा का इस्तेमाल एक अच्छा कदम है।' 

8 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
दूसरे देशों में भी हो रही है रिसर्च

अमेरिका और ब्रिटेन में भी कुछ कंपनियां ऐसे टेस्ट को लेकर रिसर्च कर रही हैं। अमेरिका की शरलॉक बायोसाइंस ने भी एक पेपर-बेस्ड तकनीक बनाई है जो काफी चर्चा में है। अमेरिका के फूड एंड एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए ने इसे आपात स्थिति में इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी है। ये डीएनए और आरएनए पर आधारित है। हार्वर्ड ग्लोबल हेल्थ इंस्टीट्यूट के डॉक्टर थॉमस साई के मुताबिक, आदर्श स्थिति होगी कि ये पेपर बेस्ड तकनीक घर में इस्तेमाल की जा सके। उनके मुताबिक, 'इस तकनीक के साथ कुछ दिक्कतें हैं। हम घर बैठे लोगों से आरएनए को निकालने और उस पर काम करने की उम्मीद नहीं कर सकते।' 

इस मामले में फेलूदा अलग है। सीएसआईआर-आईजीबीएमआर में मॉलिक्यूल वैज्ञानिक देबोज्योति चक्रवर्ती ने बताया कि वो एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो 'आरएनए को घर में ही निकाल कर पीसीआर तकनीक से इसे घर पर ही एम्पलिफाई करने में भी मदद करेगा।' इस तकनीक को ईजाद करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले देबोज्योति कहते हैं, 'हम एक सरल, सस्ती और सही सटीक टेस्ट की तकनीक के लिए कोशिश कर रहे हैं।' 
विज्ञापन

9 of 9
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
वहीं स्टीफन किसलर कहते हैं, 'भारत के पास मौका है कि वो इस टेस्ट की उपयोगिता को साबित करे, क्योंकि जनसंख्या इतनी बड़ी है और ये बिल्कुल सही समय है। अगर ये उपयोगी साबित होती है तो दुनियाभर के लोगों को इसका फायदा मिलेगा।' 

किसलर के मुताबिक, अभी सबसे ज्यादा जरूरी टेस्ट करना है, हम वैक्सीन के भरोसे नहीं रह सकते हैं। वो कहते हैं, 'वैक्सीन किसी बीमारी को जड़ से खत्म नहीं करती, बस उसकी क्षमता को कम कर देती है। इसलिए टेस्टिंग की भूमिका हमेशा ही अहम रहेगी।' 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें