हरिवंश राय बच्चन और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला दोनों ही किसी परिचय के मोहताज ना ही अपने समय में थे और ना आज ही हैं। ये हिन्दी कविता के छायावादी युग के वो सूरज हैं जिनसे साहित्य आज भी रौशन हो रहा है।
दोनों ही समकालीन थे और एक-दूसरे के व्यक्तित्व से भली-भांति परिचित भी थे। इसी का प्रमाण यह है कि निराला जी की बीमारी को लेकर दिखावा करने वालों की झूठी संवेदना की प्रतिक्रिया में बच्चन साहब ने एक पत्र लिखा।
निराला जी बेहद ही सादा व्यक्तित्व के धनी थे और किसी भी प्रकार के लोभ से सर्वथा मुक्त थे। इसी संदर्भ में बच्चन साहब अपने पत्र में लिखते हैं कि,
निराला जी ने अपनी कई किताबों को कॉपीराइट कर दिया था, पर अब वे इस बंधन से सर्वथा मुक्त हो गए हैं। अब उनके अधिकतर प्रकाशक ऐसे हैं जो निराला जी के प्रशंसक और मित्र हैं और वे उन्हें ठीक रायल्टी देते हैं। रायल्टी की रकम क्या होती है, मैं नहीं जानता। निराला जी लोकप्रिय नहीं रहे, जो उनके नाम की दुहाई देते फिरते हैं उनके घर भी निराला जी का पूरा सेट शायद ही मिले। लेखक का स्वाभिमान तो इसी में है कि उसकी कलम उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करे।
निराला जी की लेखन क्षमता की प्रशंसा करते हुए वह कहते हैं कि
निराला की कलम में वह शक्ति है, पर निराला को अपनी आवश्यकता पूर्ति करने को पैसे नहीं चाहिए। उनकी नजर दूसरे की आवश्यकताओं पर जाती है। उन्हें तो कुबेर का धन भी दे दिया जाए तो वे औरों को दे डालेंगे। ऐसे दानी को मान (दान) करने को धन कौन देगा। कितना देगा? और अब तो वे अपने पैसे का हिसाब- किताब भी नहीं रख सकते। उनके नाम से खाने वालों की संख्या उनके चारों ओर बढ़ रही है। मेरा विश्वास है कि धन से निराला की सेवा नहीं की जा सकती।
साभार- चिट्ठियों की दुनिया
5 वर्ष पहले