विज्ञापन

गीतों के सरताज नीरज की तबियत में हुआ सुधार, ये हैं उनकी 5 श्रेष्ठ रचनाएं...

काव्य डेस्क

Halchal
विज्ञापन
                                    
                     
                                                  कवि गोपाल दास नीरज को चेस्ट इंफेक्शन होने के कारण लखनऊ के लोहिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भर्ती किया गया है। वो इस समय ऑक्सीजन पर हैं। रविवार सुबह उन्हें संजय गांधी पीजीआई ले जाया गया था। जहां से उन्हें जांच के बाद घर भेज दिया गया था। सोमवार सुबह जब उन्हें फिर दिक्कत हुई तो इंस्टीट्यूट में भर्ती किया गया। डॉ. राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के निदेशक प्रो. दीपक मालवीय ने बताया कि उन्हें चेस्‍ट इंफेक्‍शन है और उन्हें एंटीबायटिक दी जा रही है। उनके सभी जरूरी अंग ठीक काम कर रहे हैं, वहीं फेफड़ों की जकड़न कम करने के ‌लिए नेबुलाइज किया गया है। 
  नीरज की तबियत में मंगलवार को अच्छा सुधार हुआ। परिजनों का कहना है कि आइसक्रीम खा लेने के कारण उनकी तबियत नासाज हुई थी। नीरज ने कहा कि जब तक मेरी यश भारती की पेंशन जारी नहीं कर दी जाएगी, मैं मरने वाला नहीं हूं।

उन्होंने कहा कि मेरी इच्छा मंच पर ही कविता पाठ करते हुए प्राण त्यागने की है। अस्पतालों के कमरे में मेरे प्राण नहीं जाने वाले हैं। मंगलवार को ही एसएसपी राजेश कुमार पांडेय भी गोपाल दास नीरज को देखने अस्पताल पहुंचे और उनकी कुशल क्षेम ली। नीरज का उपचार कर रहे डॉ. संजय भार्गव ने बताया अब उनकी तबियत में सुधार है, जल्द ही उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी। गोपाल दास नीरज की उम्र 92 वर्ष है। उनका जन्म 4 जनवरी 1925 को हुआ था।
विज्ञापन

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे, कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे...

नीरज प्रेम रस के बड़े कवि हैं। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों के कई बेहतरीन गीत लिखे। वे पहले व्यक्ति हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो-दो बार सम्मानित किया, पहले पद्मश्री से, उसके बाद पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। यही नहीं, फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिला। हम अपने पाठकों के लिए उनकी पांच बेहतरीन रचनाएं पेश कर रहे हैं। 

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई
पात-पात झर गए कि शाख़-शाख़ जल गई
चाह तो निकल सकी न पर उमर निकल गई

गीत अश्क बन गए छंद हो दफन गए
साथ के सभी दिऐ धुआँ पहन पहन गए
और हम झुके-झुके मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा
क्या जमाल था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ़ जमीन और आसमाँ उधर उठा
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा

एक दिन मगर यहाँ ऐसी कुछ हवा चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम लुटे-लुटे वक्त से पिटे-पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ

हो सका न कुछ मगर शाम बन गई सहर
वह उठी लहर कि ढह गये किले बिखर-बिखर
और हम डरे-डरे नीर नैन में भरे
ओढ़कर कफ़न पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।

माँग भर चली कि एक जब नई-नई किरन
ढोलकें धुमुक उठीं ठुमक उठे चरन-चरन
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन चली दुल्हन
गाँव सब उमड़ पड़ा बहक उठे नयन-नयन

पर तभी ज़हर भरी गाज़ एक वह गिरी
पुँछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी
और हम अजान से दूर के मकान से
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
 

जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

दर्द दिया है, अश्रु स्नेह है, बाती बैरिन श्वास है,
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !

मैं ज्वाला का ज्योति-काव्य
चिनगारी जिसकी भाषा,
किसी निठुर की एक फूँक का
हूँ बस खेल-तमाशा

पग-तल लेटी निशा, भाल पर
बैठी ऊषा गोरी,
एक जलन से बाँध रखी है
साँझ-सुबह की डोरी

सोये चाँद-सितारे, भू-नभ, दिशि-दिशि स्वप्न-मगन है
पी-पीकर निज आग जग रही केवल मेरी प्यास है !
जल-जलकर बुझ जाऊँ, मेरा बस इतना इतिहास है !!


 

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा...

तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा । 
सफ़र न करते हुए भी किसी सफ़र में रहा ।

वो जिस्म ही था जो भटका किया ज़माने में, 
हृदय तो मेरा हमेशा तेरी डगर में रहा । 

तू ढूँढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में, 
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा । 

वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की, 
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा । 

हज़ारों रत्न थे उस जौहरी की झोली में, 
उसे कुछ भी न मिला जो अगर-मगर में रहा ।
 

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई... 

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई 
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई |

आप मत पूछिये क्या हम पे 'सफ़र में गुज़री ?
आज तक हमसे हमारी न मुलाकात हुई |

हर गलत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझको 
एक आवाज़ तेरी जब से मेरे साथ हुई |

मैंने सोचा कि मेरे देश की हालत क्या है 
एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई |

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था...

दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था|
तुम्हारे घर का सफ़र इस क़दर सख्त न था।

इतने मसरूफ़ थे हम जाने की तैयारी में,
खड़े थे तुम और तुम्हें देखने का वक्त न था।

मैं जिस की खोज में ख़ुद खो गया था मेले में,
कहीं वो मेरा ही एहसास तो कमबख्त न था।

जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया न ख़ौल उठा,
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था।

उन्हीं फ़क़ीरों ने इतिहास बनाया है यहाँ,
जिन पे इतिहास को लिखने के लिए वक्त न था।

शराब कर के पिया उस ने ज़हर जीवन भर,
हमारे शहर में 'नीरज' सा कोई मस्त न था।

साभार-कविता कोश 
8 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

1 कविता

View Profile

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile