लेख- राजन प्रकाश
कैलाश सत्यार्थी यानि नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता। बहुत लोग उन्हें समाज सुधारक और विचारक भी मानते हैं। इससे ज़्यादा हम उनके बारे में नहीं जानते। दरअसल, कैलाश सत्यार्थी इन सब पहचानों से इतर साहित्यकार भी हैं। एक ऐसा साहित्यकार, जो कलम के माध्यम से बच्चों के अधिकारों की बात करता है, उनके शोषण को रोकने के लिए कविताएं लिखता है। उनके मन के कोने में एक भावुक रचनाकार छिपा बैठा है, जो बच्चों की तकलीफों को इबारत की शक्ल में कागज के पन्नों में समय-समय पर हमारे सामने उकेरता रहा है।
‘मैं साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं न ही कविता का शास्त्र और व्याकरण जानता हूं। कविता लिखना न तो मेरा व्यवसाय है और न ही शौक, जुनून अथवा प्यार। फिर भी मुझसे कविता क्यों लिखी जाती है, इसका ठीक-ठीक जवाब मेरे पास नहीं है। सामाजिक बदलाव की ललक ने मुझे लेखक बना दिया।’ एक कविता संग्रह समेत सात प्रकाशित किताबों और तीन प्रकाशनाधीन किताबों का लेखक अपनी कविता संग्रह की प्रस्तावना में ऐसी ईमानदार टिप्पणी की हिम्मत विरले ही करते हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी ने अपने कविता संग्रह ‘चलो हवाओं का रुख मोड़ें’ में लेखन कार्य के साथ अपने जुड़ाव का परिचय इन्हीं पंक्तियों में दिया है।
जीवन के 69वें वसंत में प्रवेश करने वाली शख्सियत जिसके खाते में नोबेल शांति पुरस्कार समेत दुनियाभर के डेढ़ दर्जन से अधिक अंतरराष्ट्रीय सम्मान और पुरस्कार हों, जिनका पांच दशक से अधिक का सक्रिय सामाजिक जीवन रहा हो, उनके नाम इतनी कम किताबें कैसे जबकि आज तो सामाजिक कार्यों में दो-चार साल की सक्रियता वाले लोग भी अपने थैले या गाड़ियों में दर्जनों किताबों के साथ इतराते हैं? इसका जवाब उनकी हाल ही प्रकाशित पुस्तक ‘तुम पहले क्यों नहीं आए’ से मिल सकता है। पुस्तक की भूमिका में सत्यार्थी लिखते हैं, ‘इस किताब को लिखे जाने में भले ही बारह-तेरह साल लगे हों लेकिन इसमें लिखी गई कहानियों को मेरे हृदय पटल पर अंकित होने में चालीस साल से भी ज्यादा का वक्त लगा है। ये सिर्फ लिखे गए शब्द नहीं हैं, बल्कि मौन में से निकली आवाजें, अदृश्यता से प्रकट हुए चेहरे और काले घने बादलों को चीरकर उगे सतरंगी इंद्रधनुष हैं।’
विज्ञापन
कैलाश सत्यार्थी की रचनाधर्मिता का सबसे आकर्षक पक्ष है उसका अनुभवजन्य होना। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय बच्चों के बीच और उनके लिए संघर्ष करते बिताया है। इसलिए लेखन की उनकी एक अलग शैली विकसित हुई, जिसमें उनका लिखा पढ़ते समय, पढ़ने से अधिक सुनने का आनंद मिलता है। "तुम पहले क्यों नहीं आए" के शिल्प के बारे में अगर थोड़े शब्दों में कहें तो यह एक ऐसा कथेतर साहित्य है, जिसे गढ़ा कथा की शैली में गया है। प्रख्यात सिनेस्टार अनुपम खेर इसे ‘सिनेमेटिक स्टाइल ऑफ लिटरेचर राइटिंग’ नाम देते हैं। किताब के विमोचन के अवसर पर अनुपम खेर ने कहा था, ‘मैंने हवाई जहाज में किताब की 12 कहानियों में से दो कहानियां पढ़ीं और हर जगह ऐसा लगा जैसे मैं कुछ पढ़ नहीं रहा बल्कि कागज पर लिखे शब्दों ने मेरी आंखों के सामने वे सारे दृश्य खड़े कर दिए। वे मेरी आंखों में किसी सिनेमा के दृश्यों की तरह चल रहे थे।’
जैसा कि पेशे से इंजीनियर रहे सत्यार्थी खुद ही कहते हैं कि साहित्य सृजन उनका पेशा नहीं है इसलिए वे बस उन भावों को कागज पर लिखते रहे हैं जो उन्होंने एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अनुभव किया। यह बात उनकी रचनाधर्मिता को जीवंत करती है। यहां पर कथेतर साहित्य में उनकी एक अन्य किताब ‘कोविड-19 सभ्यता का संकट और समाधान’ का उल्लेख भी जरूरी है। कोविड-19 को दुनिया ने स्वास्थ्य के संकट, अर्थव्यवस्था के संकट और कई अन्य संकटों की तरह देखा है, सत्यार्थी इस महामारी को सभ्यता के संकट के रूप में देखते हैं और उसका समाधान भी सुझाते हैं। इस किताब का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि लेखक ने सभ्यता पर आए संकट से निपटने के तात्कालिक और स्थाई दोनों उपाय सुझाए हैं। उन्होंने करुणा को इस संकट के स्थाई समाधान के रूप में बहुत सुंदर और तार्किक ढंग से स्थापित किया है।
करुणा और कृतज्ञता जैसे मानवीय मूल्य सत्यार्थी की रचनाधर्मिता की आत्मा माने जा सकते हैं। उनकी हर किताब में इसे प्रमुखता से स्थान मिलता है। करुणा तो उनका विशेष प्रिय विषय है। नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित एक अन्य शख्सियत बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा के साथ करुणा पर उनकी एक किताब भी जल्द ही प्रकाशित हो रही है। दो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले व्यक्तित्व की करुणा को लेकर दृष्टि, इस किताब का थीम है। करुणामय नेतृत्व या कम्पैशनेट लीडरशिप विषय भी सत्यार्थी के हृदय के करीब है। दलाई लामा के साथ सह-लेखक के रूप में करुणा पर एक किताब के अलावा सत्यार्थी लंबे समय से कम्पैशनेट कोशंट (सीक्यू) जैसे गूढ़ विषय पर बातें कर रहे हैं और इस पर भी वे कुछ लिख रहे हैं। सत्यार्थी कहते हैं, ‘नेतृत्व के लिए जितनी जरूरत अच्छे आईक्यू या बौद्धिक स्तर की है उतनी ही जरूरत कम्पैशनेट कोशंट (सीक्यू) या करुणा स्तर की भी है।’
बेशक, कैलाश सत्यार्थी की अब तक की रचनायात्रा का विषय गंभीर रहा है और उन्होंने कथेतर साहित्य ही ज्यादा लिखा है लेकिन साथ ही वे यह भी कहते हैं कि मेरी हमेशा यही कोशिश रही है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरे भीतर का बच्चा कहीं बड़ा न हो जाए। यह सोच उनकी कल्पनाओं और उनकी रचनाओं के भाषा छंद और बिंब में परिलक्षित होती है।
किशोरावस्था में अपने छात्र जीवन में लिखी कविता कुछ पंक्तियां देखें-
सुनहरी धूप के उस टुकड़े के
लहूलुहान जिस्म का बैसाखियों के सहारे
लड़खड़ाते चलना, गिरना, फिसलना
बिल्कुल सहज हो गया है
अंधेरे में बैठे-बैठे कागजों पर
कई-कई सूरज उगाने सा...
या छात्र आंदोलन के दौरान 1975 में लिखी कविता शब्दकोश के घाव को ही लें-
ये तमाम लोग लगातार मुझको
पागल कहे जा रहे हैं क्योंकि
इस उम्र में भी मैं कभी
लिख नहीं पाता हूं गीत
प्यार, वफा, हुस्न, गुलशन, बहारों के
संतोष, धैर्य, सहनशीलता या खुशी के...
या फिर कोरोनाकाल में जब इंसान एक वायरस के आगे बेबस हो गया था और हर तरफ से मौतों की खबरें आती थीं जिनको कंधे देने वाले भी नहीं मिलते थे, तब सत्यार्थी ने इंसान के अस्तित्व और उसके सर्वश्रेष्ठ और सर्वसमर्थ होने के दावों के बीच जिंदगी का फलसफा सूफियाना अंदाज में व्यक्त करते हुए लिखा,
मैं क्या हूं,
मैं बुदबुदा हूं,
भंवर हूं, लहर हूं
मैं सैलाब और सुनामी हूं
मैं पोखर हूं, तालाब हूँ, नदी हूं
मैं ही बूंद और समुन्दर हूं
लेकिन सच यह है कि मैं सिर्फ पानी हूं।
मशीनीकरण के इस युग में जब इंसान मशीनों का निर्माण करता-करता खुद मशीनों में बदलता जा रहा है, तब कैलाश सत्यार्थी जैसे संवेदनशील रचनाधर्मियों की जरूरत हमें ज्यादा महसूस होती है जो अपनी कविताओं और कहानियों के जरिए हमारे भीतर के इंसान को झकझोरने के प्रयास करते रहें। आज उनका जन्मदिन है। वे दीर्घायु हों, शतायु हों।