वरिष्ठ पत्रकार सबा नकवी की यह किताब वैसे तो अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी तक पर है, लेकिन इसमें वाजपेयी और उनके दौर को ज्यादा विस्तार दिया गया है। यह ज्ञात सत्य है कि वाजपेयी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दबाव में नहीं आते थे। उन्होंने राम मंदिर आंदोलन को भी बहुत महत्व नहीं दिया था। इसी कारण साध्वी ऋतंभरा उन्हें 'आधा कांग्रेसी' कहती थीं, तो विहिप के तत्कालीन मुखिया अशोक सिंघल से उनका संवाद न के बराबर था। चूंकि उस दौर में सबा नकवी आउटलुक में भाजपा कवर करती थीं, सो वाजपेयी और उनकी सरकार के कामकाज को उन्होंने नजदीक से देखा था। वाजपेयी की उदारता की उन्होंने तारीफ की है, लेकिन इसका भी जिक्र किया है कि स्वर्गीय विनोद मेहता के दौर में सरकार की आलोचना करती 'आउटलुक' की रिपोर्टें उन्हें पसंद नहीं थीं और वह प्रतिकूल रिपोर्टों को सबा नकवी की 'कारगुजारी' मानते थे।
पीएमओ से जुड़ी गड़बड़ियों पर 'आउटलुक' की कवर स्टोरी से नाराज वाजपेयी ने विनोद मेहता को बुलाया था और परोक्ष रूप से सबा नकवी को भाजपा कवर करने के बजाय कोई और बीट देने को कहा था। लेकिन विनोद मेहता ने सबा की बीट नहीं बदली। यही नहीं, उन्होंने पीएमओ की नाराजगी दरकिनार कर वाजपेयी के चीन दौरे पर सबा को भेजा था। सरकार के खिलाफ लिखने की कीमत 'आउटलुक' को चुकानी पड़ी, उसके मालिक के घर और पत्रिका के दफ्तरों में आयकर के छापे पड़े।
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सबा नकवी ने वाजपेयी और आडवाणी के जटिल रिश्ते पर लिखा है कि कैसे वेंकैया नायडू द्वारा अटल-आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा पर विदेश से लौटे आगबबूला वाजपेयी ने खुद को चुनाव अभियान से अलग कर लेने की प्रच्छ्न्न धमकी दी थी। यह वाजपेयी की शैली थी। यह भी कि गोविंदाचार्य और कल्याण सिंह जैसे आलोचकों को वाजपेयी ने कभी माफ नहीं किया। इसके बावजूद अटल सरकार पारदर्शी और संवाद में यकीन करने वाली थी। लेखिका ने प्रमोद महाजन, उमा भारती आदि पर लिखा है, लेकिन जसवंत सिंह और अरुण जेटली के व्यक्तित्व पर उन्होंने विस्तार से कलम चलाई है। उन्होंने लिखा है कि जसवंत सिंह की अंग्रेजी पर वाजपेयी मुग्ध थे, तथा सेना की पृष्ठभूमि से होने के बावजूद जसवंत सिंह की अध्ययनशीलता ने उन्हें प्रभावित किया था। इसीलिए संघ की आपत्ति के बावजूद वाजपेयी ने जसवंत सिंह को महत्व दिया। ऐसे ही अरुण जेटली को उन्होंने भाजपा का बेहद महत्वपूर्ण नेता बताया है, जिनकी मीडिया, न्यायपालिका, नौकरशाही और कॉरपोरेट दुनिया में समान पैठ है और इसीलिए सत्ता या राजनीति में न होने के बावजूद उनकी पहचान का दायरा कभी सीमित नहीं होने वाला। नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने से लेकर राष्ट्रीय राजनीति में मोदी को स्थापित करने में अरुण जेटली की बड़ी भूमिका रही है। हालांकि किताब में लालकृष्ण आडवाणी पर अलग से न लिखा जाना थोड़ा खटकता है।
यह किताब अटल युग के आखिरी दौर में मोदी के मजबूत होने को रेखांकित करती है, जो इसकी सफलता है। गुजरात दंगे के बाद भाजपा में राष्ट्रवादियों के मजबूत होने और तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्दोह के खिलाफ भाजपा के युवा नेताओं के अभियान ने वाजपेयी को दुखी किया था। इसके अलावा 2004 के चुनाव में मुस्लिमों को रिझाने की वाजपेयी की राजनीति पर पार्टी की एक बैठक में मोदी ने सवाल उठाया था। सबा ने मोदी को एक ऐसी शख्सियत के तौर पर रेखांकित किया है, जो व्यक्तिगत जीवन में अलग रहना पसंद करते हैं, दरबार नहीं लगाते और नजदीकी नौकरशाहों के जरिये सरकार चलाते हैं। वाजपेयी पहले आदमी थे, जिनके व्यक्तित्व से भाजपा की पहचान बनी थी, लेकिन मोदी का व्यक्तित्व उससे आगे निकल चुका है। बेशक यह पठनीय किताब है, लेकिन मोदी के दौर को अगर वह थोड़ा विस्तार देतीं, तो इसकी प्रासंगिकता और बढ़ती।
-कल्लोल चक्रवर्ती
किताब- शेड्स ऑफ सेफरन
लेखिका - सबा नकवी
प्रकाशक - वेस्टलैंड पब्लिकेशंस
मूल्य - 599 रुपये