मानसून पर लिखी अब तक की सबसे बेहतरीन कही जाने वाली किताब चेजिंग द मानसून कहती है कि जब मानसून उफान पर हो, तब बीजगणित भी उत्सव बन जाता है। ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों का संकट अपनी जगह है, लेकिन यह किताब पढ़कर महसूस होता है कि अस्थायी परेशानियों के फेर में हम कहीं अधिक गहरे अनुभवों को तो नहीं खो रहे हैं।
चेजिंग द मानसून
ए मॉडर्न पिलग्रिमेज थ्रू इंडिया
प्रकाशक : पिकाडोर
मूल्य : 533 रुपये (पेपरबैक)
लेखिक : एलेक्जेंडर फ्रेटर
मानसून के मौसम में अगर बिना भीगे हुए मानसून के रोमांच का आनंद मिल जाए, तो फिर क्या कहने! चेजिंग द मानसून के लेखक एलेक्जेंडर फ्रेटर दरअसल एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार और यात्रा लेखक हैं, जो 1987 में भारत आए थे, मानसून का पीछा करने। उन्होंने केप कोमोरिन से शुरुआत की और केरल, गोवा, बॉम्बे, दिल्ली और असम में रुकते हुए, वह धरती की सबसे नम जगह चेरापूंजी पहुंचे।
अपनी किताब चेजिंग द मानसून में फ्रेटर बीच-बीच में न्यू हेब्राइडस की कहानियां सुनाते हैं, जो दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित एक द्वीप समूह है और जहां वह पले-बढ़े थे। फ्रेटर के पिता के एक मित्र थे, जो चेरापूंजी में रहते थे और एक मिशनरी थे। उनके पत्रों ने फ्रेटर के पिता के मन में चेरापूंजी जाने का सपना गढ़ा। फ्रेटर के पिता इसे तीर्थयात्रा के समान मानते थे और यहीं से मानसून के प्रति फ्रेटर का आकर्षण बढ़ा। इस यात्रा के दौरान उन्हें पता चला कि मानसून भारतीयों की जिंदगी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण घटना है।
मानसून में जरा-सा भी विलंब सरकारों को गिरा सकता है, क्रांतियों को प्रेरित कर सकता है, तथा हिंसक अपराध के स्तर को काफी हद तक बढ़ा सकता है, क्योंकि यहां नागरिक वैसे ही गर्मी में तप रहे होते हैं। जब फ्रेटर भारत आए, तब उस साल खुशकिस्मती से, बारिश तय समय पर हुई। फ्रेटर समुद्र तट पर मानसून तीर्थयात्रियों की भीड़ में शामिल हो गए और लगभग धार्मिक उत्साह के साथ बारिश का स्वागत किया। फिर वह कोचीन, गोवा, बॉम्बे और कलकत्ता होते हुए उत्तर की ओर बढ़े और चेरापूंजी पहुंचे। चेजिंग द मानसून में फ्रेटर लिखते हैं, ‘जब मानसून बाहर गरज रहा हो, तब बीजगणित भी उत्सव जैसा लगने लगता है।’ नदी बनी सड़कों और ट्रैफिक जाम में फंसे लोगों की परेशानियां अपनी जगह हैं, लेकिन यह किताब बताती है कि मानसून एक खूबसूरत मौसम है, जब बादल आपको ढक लेते हैं, और हवाएं आपको तरो-ताजा करती-सी बहती हैं।
चेजिंग द मानसून आंशिक रूप से आत्मकथा, आंशिक रूप से यात्रा वृतांत और आंशिक रूप से मानसून मैनुअल है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह एक अनिश्चित और अप्रत्याशित मौसम पैटर्न से जूझ रहे देश की भावनाओं और मनोदशाओं को समझने की अथक कोशिश है।
फ्रेटर के पास दृश्यों को बेहतरीन गद्य में पिरोने की अद्भुत क्षमता है, जो पाठक को उस क्षण का साक्षात्कार करने पर मजबूर कर देती है। यह पुस्तक मानसून के दौरान उत्पन्न होने वाली भावनाओं का अच्छा चित्रण प्रस्तुत करती है, जिसका सबसे अच्छा चित्रण मानसून पर ही आधारित एक अन्य ऐतिहासिक किताब मानसून फीलिंग्स में किया गया है-‘मानसून मूसलाधार बारिश और तीव्र भावनाओं-प्रेम और लालसा, आशा और भय, सुख और दुख, भक्ति और आनंद की अधिकता का मौसम है।’