किताब - बारिश के पिंजड़े में
लेखक - चन्दन सिंह
समीक्षक - प्रवीण प्रणव
कुछ कविताएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें केवल पढ़ा नहीं जाता, बल्कि धीरे-धीरे जिया जाता है। वे पहली ही बार में अपना सम्पूर्ण अर्थ नहीं खोलतीं। उनके भीतर छिपे अर्थ-संकेत, बिम्ब और भाव-स्तर पाठक से धैर्य की माँग करते हैं। हर पुनर्पाठ के साथ वे अपने किसी नए द्वार को खोलती हैं, और पाठक को अपने भीतर पहले से कुछ अधिक गहरे उतरने का निमंत्रण देती हैं। ऐसी कविताओं का सौन्दर्य उनके अर्थ की जटिलता में नहीं, बल्कि उनकी बहुस्तरीयता में निहित होता है। इसके विपरीत कुछ कविताएँ ऐसी भी होती हैं जिनकी भाषा अत्यन्त सरल होती है। वे अपने कथ्य को बिना किसी बौद्धिक आडम्बर के पाठक के सामने रख देती हैं, किन्तु उनका भाव-संसार इतना व्यापक और गहरा होता है कि प्रत्येक पुनर्पाठ पर वे भीतर किसी नई स्मृति को स्पर्श कर जाती हैं। हर बार वे मन में कोई नया दृश्य रचती हैं, किसी भूले हुए स्पर्श को पुनर्जीवित करती हैं, किसी पुराने दर्द को फिर से आवाज़ देती हैं या किसी अनाम सुख की हल्की-सी लहर भीतर जगा देती हैं। ऐसी कविताएँ पाठक से इसलिए बार-बार पढ़े जाने का आग्रह नहीं करतीं कि उनके अर्थ कठिन हैं, बल्कि इसलिए कि वे हर बार नए अनुभव में बदल जाती हैं। प्रत्येक पाठ में उनके शब्द वही रहते हैं, पर पाठक बदल जाता है; और इसी परिवर्तन के साथ कविता भी अपना नया रूप ग्रहण कर लेती है।
वरिष्ठ कवि चन्दन सिंह इसी दूसरी परम्परा के कवि हैं। उनकी कविता का संसार, भाषा के चमत्कार पर नहीं, संवेदना की प्रामाणिकता पर टिका है। वे पाठक को चकित नहीं करते, बल्कि धीरे-धीरे उसके भीतर उतरते हैं। उनकी कविताएँ शोर नहीं करतीं, बल्कि स्मृतियों की तरह मन में बस जाती हैं। वे किसी निष्कर्ष तक पहुँचने की उतावली नहीं दिखातीं; वे पाठक के भीतर प्रश्नों, चित्रों और अनुभूतियों का एक ऐसा संसार निर्मित करती हैं, जहाँ कविता समाप्त हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहता है। इसी कारण उनका काव्य-संग्रह ‘बारिश के पिंजरे में’ केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनात्मक यात्रा का दस्तावेज़ प्रतीत होता है। यहाँ गाँव है, शहर है, विस्थापन है, स्मृति है, प्रेम है, मृत्यु है, भूख है, श्रम है, प्रकृति है, संगीत है, और इन सबके बीच सबसे अधिक उपस्थित है मनुष्य। ऐसा मनुष्य, जो अपनी समस्त कमजोरियों, करुणाओं, विडम्बनाओं और छोटे-छोटे सुखों के साथ हमारे सामने उपस्थित होता है।
समकालीन हिन्दी कविता के शीर्षस्थ कवियों में शुमार प्रो. अरुण कमल ने इस संग्रह की भूमिका में जो लिखा है, वह वस्तुतः चन्दन सिंह की काव्य-दृष्टि का अत्यन्त सटीक मूल्यांकन है - “चन्दन सिंह अतिशय भावप्रवण और विरल भाव-लोक के कवि हैं। सूक्ष्म, मसृण तंतुओं से बुनी हुई इनकी कविताएँ सामान्य जीवन प्रसंगों को अलौकिक आभा से आविष्ट करतीं एक समानान्तर संसार की सृष्टि करती हैं। ऐसे युग में जब अधिकांश कविताएँ वक्तव्य-आश्रित हों तब चन्दन सिंह की कविता बिम्बों के माध्यम से समतुल्य भाव की प्रस्तुति की प्रतिज्ञा से परिचालित होती है। इसीलिए वे सान्द्र, ऐन्द्रिक और धारोष्ण होती हैं। पूरा संग्रह घने, आर्द्र रूपकों और उपमानों से भरा है, जैसा कि 'भुट्टा' या 'मर्मज्ञ' सरीखी कविताएँ प्रमाणित करती हैं। चन्दन सिंह विलक्षण कवि हैं, चाक्षुष और श्रवण बिंबों के सहज स्थपति।” अरुण कमल का यह कथन केवल भूमिका में लिखा गया एक प्रशंसात्मक वक्तव्य नहीं है, बल्कि संग्रह के सम्यक् अध्ययन के बाद निकला हुआ निष्कर्ष है। वास्तव में जब पाठक इस संग्रह की कविताओं से होकर गुजरता है, तब उसे अनुभव होता है कि चन्दन सिंह का कवि-मन जीवन के अत्यन्त सामान्य दृश्यों में भी असामान्य अर्थ खोज लेता है। वे किसी बड़े वैचारिक उद्घोष की अपेक्षा एक छोटे-से दृश्य, एक मामूली वस्तु, किसी भूले हुए स्वाद, किसी साधारण मनुष्य या किसी क्षणिक अनुभूति के भीतर छिपे विराट मानवीय अर्थ को पहचानते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता पढ़ते हुए पाठक को ऐसा लगता है जैसे वह किसी परिचित संसार में ही प्रवेश कर रहा हो।
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इस संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इसकी कविताएँ किसी एक भावभूमि में सीमित नहीं रहतीं। वे जीवन के विविध आयामों में विचरण करती हैं। कहीं भूख और अकाल है, कहीं विस्थापन की पीड़ा, कहीं प्रेम का रहस्य, कहीं मृत्यु का निजी सौन्दर्य-बोध, कहीं बाज़ारवाद की विडम्बना, कहीं श्रमिक जीवन की अनकही कथा और कहीं प्रकृति का इतना कोमल स्पर्श कि कविता पढ़ते-पढ़ते पाठक स्वयं उस दृश्य का हिस्सा बन जाता है। यही बहुवर्णी संवेदना इस संग्रह को विशिष्ट बनाती है। संग्रह का सबसे मार्मिक और ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण खंड ‘कालाहाँडी’ है। यह केवल सात कविताओं का क्रम नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उस काले अध्याय की काव्यात्मक स्मृति है जिसे हम विकास की चमक के बीच अक्सर भुला देना चाहते हैं। ओडिशा का कालाहाँडी जिला 1980 के दशक में गरीबी, कुपोषण, बच्चों की बिक्री और भुखमरी से होने वाली मौतों के कारण राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया था। स्थिति इतनी भयावह थी कि बार-बार पड़ने वाले अकाल और भूख की त्रासदी को ही ‘कालाहाँडी सिंड्रोम’ कहा जाने लगा। विडम्बना यह है कि इतिहास के पन्ने बताते हैं कि कभी यही कालाहाँडी इतना सम्पन्न था कि बंगाल के अकाल के समय उसने अकेले लगभग एक लाख टन चावल की आपूर्ति की थी। समय का यह निर्मम व्यंग्य भारतीय सामाजिक संरचना की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है।
चन्दन सिंह इन ऐतिहासिक तथ्यों को कविता में नहीं दोहराते। वे आँकड़ों की भाषा नहीं बोलते। वे उस भूख का चेहरा दिखाते हैं जो आँकड़ों में कभी दिखाई नहीं देती। पहली ही कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ पाठक को सीधे उस त्रासदी के बीच पहुँचा देती हैं - “कैसा अभागा नाम है यह कालाहाँडी/ सुनते ही उदर में फैल जाता है अकाल/ जैसे खाया नहीं कई दिनों से/ कई दिनों से नसीब न हुआ हो पीने का पानी।” इन चार पंक्तियों में कवि ने केवल एक भूगोल का परिचय नहीं दिया, बल्कि एक पूरे इतिहास को मनुष्य के शरीर में रूपान्तरित कर दिया है। कालाहाँडी की सबसे बड़ी त्रासदी केवल भूख नहीं थी; उससे भी बड़ी त्रासदी थी भूख के कारण मनुष्य की अस्मिता का टूट जाना। पेट भरने के लिए लोगों ने अपने पशु बेचे, अपनी जमीन बेची, अपने घर बेचे और अन्ततः अपने बच्चे तक बेचने पड़े। सभ्यता के सारे आदर्श भूख के सामने किस प्रकार असहाय हो जाते हैं, इसका अत्यन्त मार्मिक चित्र ‘कालाहाँडी-6’ में उपस्थित होता है – “मुट्ठी भर भात/ और थोड़ा सा झोर के/ पेट में जाते ही/ वापस लौटने लगती है इंसानियत/ हर कौर के साथ/ थाली में जो जगह खाली होती है/ झलकता है वहाँ/ बेच दी गई बिटिया का चेहरा/ बकरियाँ/ पुरखों की निशानियाँ/ पानी की घूँट से/ कण्ठ नहीं/ भींगती है आँखें।” यह कविता केवल भूख की नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा के क्षरण की कविता है। ‘थाली में खाली जगह’ का बिम्ब असाधारण है। वहाँ भोजन का अभाव नहीं दिखाई देता, वहाँ एक बेची हुई बेटी का चेहरा दिखाई देता है। इन कविताओं को पढ़ते हुए सहज ही बाबा नागार्जुन की स्मृति ताज़ा हो उठती है। उनकी प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ “कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास…” भारतीय कविता में भूख की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में गिनी जाती हैं। चन्दन सिंह उसी परम्परा को आगे बढ़ाते हैं, किन्तु उनकी भाषा में करुणा के साथ एक गहरा दृश्य-बोध भी जुड़ जाता है। वे भूख का वर्णन नहीं करते; वे भूख को आँखों के सामने उपस्थित कर देते हैं। यही उनकी कविता की सबसे बड़ी शक्ति है।
चन्दन सिंह की कविता का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि वह अपने पाठक पर कोई विचार आरोपित नहीं करती। वह न तो घोषणा करती है, न नारा देती है और न ही किसी वैचारिक आग्रह के बोझ तले दबती है। वह धीरे-धीरे अपने दृश्य रचती है, अपने बिम्ब गढ़ती है और पाठक को इस प्रकार उस संसार में ले जाती है कि कविता समाप्त होने के बाद भी उसका प्रभाव देर तक बना रहता है। उनकी अनेक कविताओं में यह अनुभव विशेष रूप से मिलता है कि अंतिम दो-तीन पंक्तियाँ सम्पूर्ण कविता का अर्थ एकाएक किसी नए आलोक में उद्घाटित कर देती हैं। इस दृष्टि से उनकी काव्य-प्रविधि कहीं-कहीं गुलज़ार की प्रसिद्ध ‘त्रिवेणी’ की याद दिलाती है। त्रिवेणी की पहली दो पंक्तियाँ एक अर्थ-संरचना निर्मित करती हैं और तीसरी पंक्ति अचानक उस अर्थ को विस्तृत, परिवर्तित अथवा उलट देती है। चन्दन सिंह की कविताएँ त्रिवेणी नहीं हैं, उनकी संरचना भी उससे भिन्न है, किन्तु उनकी अनेक कविताओं के समापन में वही अप्रत्याशित प्रभाव दिखाई देता है। पाठक को लगता है कि कविता तो अभी समाप्त हुई है, जबकि वास्तव में वह उसके भीतर अभी शुरू हुई है। उदाहरण के लिए ‘तुम्हें सुनते हुए’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं “और सुनो,/ वहाँ एक कविता है/ जिसके मुँह में कोई शब्द नहीं।” इन तीन पंक्तियों में कविता का समूचा सौन्दर्य निहित है। यह निःशब्द कविता दरअसल मनुष्य के उन अनुभवों की कविता है जिन्हें भाषा कभी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती। इसी प्रकार ‘प्रेम कथा’ कविता का समापन है “और उसमें रहने वाला रहस्य शायद/ टीले से उतर शहर में चला आया हो/ घूमता घर-घर में झांकता/ किसी प्रेम कर रही बुरी लड़की की तलाश में।” विशेष रूप से ‘प्रेम कर रही बुरी लड़की’ का प्रयोग। यह प्रयोग पाठक को भीतर तक झकझोर देता है। समाज प्रेम करने वाली स्त्री को कितनी सहजता से ‘बुरी’ घोषित कर देता है, यह पूरा सामाजिक यथार्थ मात्र चार पंक्तियों में उद्घाटित हो जाता है। ‘पकने की गन्ध’ कविता की अंतिम पंक्तियाँ अत्यन्त मार्मिक हैं “फिर भी कितना मुश्किल है/ यक़ीन कर पाना/ बिना माँ के भी/ कुछ पक सकता है।” यह कविता माँ की उपस्थिति को किसी भावुकता के सहारे नहीं, बल्कि जीवन के सबसे सामान्य अनुभव के माध्यम से अमर बना देती है। ऐसी अनेक कविताएँ इस संग्रह में हैं जहाँ समापन कविता का सबसे प्रभावशाली क्षण बन जाता है। पाठक कविता समाप्त करके पुस्तक बन्द नहीं करता; वह अनायास ही एक बार फिर आरम्भ से पढ़ना चाहता है। किसी भी श्रेष्ठ कविता की यही पहचान है कि वह अपने भीतर पुनर्पाठ की सम्भावना बनाए रखे।
इस संग्रह की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कविता है ‘अंत की कल्पना’। अरुंधति रॉय ने चर्चित लेख ‘कल्पना का अंत’ 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद लिखा था। उस लेख में उन्होंने परमाणु हथियारों का तीखा विरोध करते हुए लिखा था कि “हवा में फासीवाद की दुर्गंध साफ़ महसूस हो रही है।” आगे उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि नागरिक ऐसे निर्णयों का प्रतिरोध नहीं करेंगे, तो वे स्वयं अपने असहाय लोगों के ‘स्वेच्छापूर्वक हत्यारे’ बन जाएँगे। इन विचारों से सहमत या असहमत होने की पूरी गुंजाइश है। व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि यदि आपके पड़ोस में विनाशकारी हथियार मौजूद हों और आप स्वयं उनकी मारक क्षमता के भीतर हों, तो केवल अहिंसा की नीति पर्याप्त नहीं रह जाती। राष्ट्रों के बीच शक्ति-सन्तुलन भी शान्ति की एक अनिवार्य शर्त है। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने भी लिखा है “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो।” किन्तु इन समस्त राजनीतिक बहसों से अलग एक निर्विवाद सत्य यह भी है कि परमाणु युद्ध की कल्पना मात्र ही मनुष्य की समूची सभ्यता को भयभीत कर देती है। चन्दन सिंह की कविता ‘अंत की कल्पना’ इसी मानवीय भय को स्वर देती है। उल्लेखनीय यह है कि वे न तो किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करते हैं और न विरोध। वे युद्ध की बहस को मनुष्य की निजी मृत्यु तक ले आते हैं। “मुझे मारना हो/ तो किसी अणु की नाभि में नहीं/ मेरी ही नाभि में घोंप देगा कोई ख़ंजर।/ ख़ंजर अगर किसी म्यूजियम का हो/ तो और भी अच्छा।/ कम से कम/ मरते-मरते उसकी मूठ पर अद्भुत कलात्मक नक्काशी को निहार/ पल भर/ मुग्ध तो हो सकूँगा।/ अकेले बिल्कुल अकेले मारना मुझे।/ सबके साथ/ एक सार्वजनिक मृत्यु में सम्मिलित होते हुए/ मुझे शर्म आएगी।/ मेरी बाँयीं जाँघ पर जो एक काला-सा तिल है/ उस की तरह निजी और गोपनीय/ चाहता हूँ मैं अपनी मृत्यु।/ पर क्या वे सुनेंगे मेरी बात?/ ऐसे समय/ जब एक अकेले आदमी की हत्या में/ बहुत कम रह गई है हत्यारों की दिलचस्पी।” यह कविता अपने समय की सबसे गम्भीर विडम्बनाओं में से एक की ओर संकेत करती है। आधुनिक सभ्यता में हत्या भी अब निजी नहीं रही; वह सामूहिक हो गई है। कवि की यह इच्छा कि उसकी मृत्यु उसकी बाँयीं जाँघ के तिल की तरह निजी और गोपनीय हो, एक अत्यन्त मार्मिक मानवीय आकांक्षा है। और अन्तिम पंक्तियाँ “एक अकेले आदमी की हत्या में / बहुत कम रह गई है हत्यारों की दिलचस्पी” सिर्फ़ युद्ध की आलोचना नहीं हैं; वे आधुनिक हिंसा के पूरे चरित्र पर एक तीखी टिप्पणी हैं। आज विनाश जितना बड़ा होगा, वह उतना ही अधिक प्रभावशाली माना जाएगा। कविता इसी मानसिकता के विरुद्ध मनुष्य की गरिमा की रक्षा करती दिखाई देती है।
संग्रह की एक और अत्यन्त उल्लेखनीय कविता है ‘हमारे समय का नायक’। यह उस भावनात्मक सम्बन्ध की कविता है जो एक समाज अपने नायकों के साथ स्थापित करता है। हर समय अपने नायक गढ़ता है। वे राजनीति से आ सकते हैं, साहित्य से, कला से, खेल से या विज्ञान से। सामान्य मनुष्य उनके भीतर अपने सपनों की छाया खोजता है। वह उनकी सफलता में अपनी सफलता का अंश देखता है। इसलिए जब कोई नायक गिरता है, तब सबसे अधिक आहत वही साधारण व्यक्ति होता है जिसने उस पर विश्वास किया था। मोहम्मद अज़हरुद्दीन की बल्लेबाज़ी भारतीय क्रिकेट के इतिहास में अपनी विशिष्ट कलात्मकता के कारण याद की जाती है। उनकी कलाइयों का जादू आज भी क्रिकेट-प्रेमियों की स्मृतियों में जीवित है। चन्दन सिंह उसी सौन्दर्य को अद्भुत बिम्ब में बदल देते हैं - “अज़हरूद्दीन! तुम हमारे समय के एक नायक थे/ और कवियों के चहेते बल्लेबाज़।/ ऐसी नज़ाकत ऐसी लोच तुम्हारी बल्लेबाज़ी में/ गोया तुम कलाइयों पर/ नदियाँ लपेटकर खेलते हो।/ तुम्हारे हाथ में जाते ही बल्ला/ वापस पेड़ की टहनी बन जाता।/ और तुम ख़ुद खेलते कहाँ थे,/ वह तो हवा के झोंके में ज़रा-सी लचक जाती थी टहनी।” किसी बल्लेबाज़ी का इससे अधिक काव्यमय चित्र शायद ही सम्भव हो। किन्तु कविता यहीं समाप्त नहीं होती। जब नायक का पतन होता है, तब कवि की दृष्टि समाज की प्रतिक्रिया पर जाती है - “नायक!/ यह कैसा तुम्हारा दुर्भाग्य/ कि जब तुम्हारा पतन हुआ/ तुम तरसते रहे/ पर हम तुम पर पत्थर फेंकने नहीं गये।” इन पंक्तियों में गहरी करुणा है। यहाँ व्यंग्य भी है और आत्मालोचना भी। कभी-कभी किसी नायक की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होती कि लोग उसका विरोध करें; बल्कि यह होती है कि लोग उसे पूरी तरह भुला दें। उपेक्षा, सार्वजनिक अपमान से भी अधिक पीड़ादायक होती है। चन्दन सिंह इस सूक्ष्म मानवीय मनोविज्ञान को बड़ी सहजता से पकड़ लेते हैं।
भारतीय समाज में एक वाक्य बार-बार दोहराया जाता है "भारत की आत्मा गाँवों में बसती है।" यह वाक्य सुनने में जितना सुंदर लगता है, व्यवहार में उतना ही विडम्बनापूर्ण प्रतीत होता है। जिन गाँवों को भारत की आत्मा कहा जाता है, वही गाँव सबसे अधिक उपेक्षा, विस्थापन और आर्थिक विषमता का बोझ उठाते हैं। चन्दन सिंह की कविताएँ इस छलनी होती हुई आत्मा का दस्तावेज़ हैं। इसी संदर्भ में ‘वाहिर्गमन’ कविता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह कविता केवल बेघर होते लोगों की कथा नहीं है; यह आधुनिक विकास की उस प्रक्रिया का काव्यात्मक दस्तावेज़ है जिसमें शहरों का विस्तार मनुष्यों के जीवन-संकुचन की कीमत पर होता है। कवि लिखते हैं “कितना सरल है इनका/ बेघर हो जाना।/ आग की कोई चिंगारी,/ कोई खाकी वर्दी,/ या शहर के शृंगार के लिए/ कंघी की तरह फेरा गया कोई बुलडोजर/ पल भर में कर सकता है इन्हें बेघर.../ धीरे-धीरे हो जाते हैं ये/ दृश्य से ओझल।/ बची रह जाती हैं सिर्फ़/ इनकी देह से फूटी लहरें,/ अनगिनत चीज़ों से टकराती हैं/ जो करती हैं चोट/ लगातार... लगातार...” इन पंक्तियों में सबसे उल्लेखनीय बिम्ब है "शहर के शृंगार के लिए कंघी की तरह फेरा गया बुलडोजर।" शहर अपने सौन्दर्य के लिए जिस प्रकार झुग्गियों और गरीबों को हटाता है, वह दरअसल सजने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्यता के विरुद्ध हिंसा है। इसी संवेदनात्मक धरातल पर ‘गगनचुम्बी’ कविता भी पढ़ी जानी चाहिए। आधुनिक महानगरों की ऊँची-ऊँची इमारतें हमें विकास का प्रतीक दिखाई देती हैं। हम उनकी ऊँचाई देखते हैं, उनकी चमक देखते हैं, किन्तु उन्हें बनाने वाले हाथों को भूल जाते हैं। चन्दन सिंह की दृष्टि वहीं जाती है। वे लिखते हैं “तुम उन्हीं लोगों में से रहे होगे, बन्धु!/ जिनकी पसलियों की सीढ़ियाँ चढ़कर/ कोई रोज़ आसमान को/ अपने हिस्से में कर रहा है।” यहाँ "पसलियों की सीढ़ियाँ" का प्रयोग मार्मिक भी है और अनोखा भी।
ऐसी ही एक और अत्यन्त व्यंग्यात्मक और दूरदर्शी कविता है ‘गरीबों के बिना’। यह कविता पहली दृष्टि में व्यंग्य लगती है, लेकिन उसके भीतर गहरी राजनीतिक चेतना छिपी है। कवि प्रश्न उठाता है कि यदि सचमुच इस देश से गरीब समाप्त हो जाएँ, तो सत्ता और व्यवस्था का क्या होगा? “ज़रा सोचिए/ कैसा लगेगा/ ग़रीबों के बिना अपना यह मुल्क?/ कमर में रस्सी बाँधकर/ किसे ले जाएगी पुलिस?/ जज किसे सुनाएगा सज़ा?/ कौन भरेगा जेलों को?/ सरकारी अस्पतालों-स्कूलों को और/ मेरे शहर में जो एक बड़ा-सा गाँधी मैदान है, उसे?/ कितना सूना-सूना लगेगा/ ग़रीबों के बिना अपना यह मुल्क!/ और फिर उसका क्या होगा/ पीक की तरह भर आती है जो करुणा?/ आप उसे कहाँ उगलेंगे?/ इसलिए/ मेरी आपसे गुज़ारिश है/ आप चाहें तो भले ही हटा दें ग़रीबी,/ पर ग़रीबों को रहने दें अभी इस मुल्क में।” यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि चन्दन सिंह किसी राजनीतिक नारे का सहारा नहीं लेते। उनकी कविता किसी दल या विचारधारा की प्रवक्ता नहीं बनती। वह केवल एक ऐसा प्रश्न खड़ा करती है जिसका उत्तर पाठक को स्वयं देना पड़ता है। यही श्रेष्ठ कविता की पहचान है।
संग्रह की दृष्टि केवल गरीबों तक सीमित नहीं है। चन्दन सिंह उतनी ही गहराई से मध्यमवर्ग की विडम्बनाओं को भी समझते हैं। वास्तव में आधुनिक उपभोक्तावादी व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार यदि कोई वर्ग है तो वह यही मध्यमवर्ग है। उसे लगातार यह विश्वास दिलाया जाता है कि अगली खरीदारी उसे सम्पन्न बना देगी, अगली वस्तु उसके जीवन को बेहतर कर देगी, अगला ब्राण्ड उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा देगा। विज्ञापन हमारे समय की सबसे प्रभावशाली कथा बन चुके हैं। वे केवल वस्तुएँ नहीं बेचते; वे सपने बेचते हैं, जीवन-शैली बेचते हैं और इच्छाओं का निर्माण करते हैं। इसी मनोविज्ञान को चन्दन सिंह ने ‘सच हुआ’ कविता में अत्यन्त मार्मिक ढंग से पकड़ा है “गृहपति ने किया कुछ पैसों का जुगाड़।/ गृहस्वामिनी ने फिर उसमें मिलाया कुछ चोरका।/ दोनों ने मिलकर कुछ उधार-पैंचा का भी बन्दोबस्त किया/ अच्छे पड़ोसियों, भले रिश्तेदारों से।/ पैसे पूरे नहीं पड़े तो अन्त में बच्चों ने फोड़ी/ अपनी गुल्लक।/ तो इस तरह घर में आई एक चीज़।/ और आख़िरकार एक दिन सच हुआ/एक हसीन विज्ञापन।” कविता की अन्तिम पंक्ति "सच हुआ एक हसीन विज्ञापन" समूचे उपभोक्तावादी समाज की सबसे सटीक आलोचनाओं में से एक है। वस्तु हमारी आवश्यकता नहीं रही; विज्ञापन आज हमारी वास्तविकता बन गया है।
चन्दन सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जीवन के अत्यन्त साधारण अनुभवों से भी असाधारण कविता रच लेते हैं। उदाहरण के लिए ‘जीभ’ कविता में कवि लिखते हैं “जब आप कड़वी दवा पीते समय/ आँख-नाक भींच कर बन्द करते हैं।
तो दरअसल वह/ जीभ बन्द करने की ही/ असम्भव कोशिश होती है।/ और आप दवा की कड़वाहट से अधिक/ अपनी इस/ कोशिश की असफलता पर/ झल्लाते हैं।” यह केवल स्वाद की कविता नहीं है। यह मनुष्य की सीमाओं की कविता है। हम बहुत-सी चीज़ों पर नियन्त्रण कर सकते हैं, किन्तु कुछ अनुभव ऐसे हैं जिन्हें रोक पाना असम्भव है। जैसे जीभ स्वाद से बच नहीं सकती, वैसे ही मनुष्य जीवन के अनेक कटु अनुभवों से स्वयं को पूरी तरह बचा नहीं सकता। इस सामान्य-सी बात को कवि ने जिस सूक्ष्मता से पकड़ा है, वही उनकी मौलिकता है। इसी प्रकार ‘गाय के सिंग’ कविता भी अत्यन्त उल्लेखनीय है। सामान्यतः सिंग शक्ति और आक्रामकता के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु गाय के सिंग हमें भयभीत नहीं करते। कवि इसी विरोधाभास को आधार बनाकर मनुष्य की सामाजिक संरचना पर विचार करते हैं। वे लिखते हैं “जिन्हें हम पालतू बनाते हैं/ सबसे पहले सिखाते हैं/ उन्हें/ भूलना अपने सिंग।/ गायों को अब शायद याद भी नहीं होगा/ कि उनके सर पर/ सिंग हैं।” यह कविता केवल गाय की नहीं है। यह हर उस मनुष्य की कविता है जिसे व्यवस्था सबसे पहले अपनी शक्ति भूलना सिखाती है। धीरे-धीरे वह इतना अभ्यस्त हो जाता है कि उसे याद भी नहीं रहता कि प्रतिरोध करना भी उसके स्वभाव का हिस्सा था। कविता बिना किसी प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्य के सत्ता और समाज की संरचना पर तीखी टिप्पणी कर जाती है।
इसी संग्रह की ‘भुट्टा’ कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कविता केवल पढ़ी नहीं जा रही, बल्कि देखी, सूँघी और चखी भी जा रही हो। चन्दन सिंह की कविताओं का यह इन्द्रियबोध उन्हें समकालीन कविता में विशिष्ट बनाता है। “सड़क किनारे/ चूल्हे की आँच पर सिकते भुट्टे/ जीभ पकड़कर खींच लेते हैं मुझे अपने पास।/ हाथों में कितनी गर्मजोशी से आते हैं वे/ अपने ही पत्तलों पर।/ नमक,/ हरी मिर्च,/ स्वाद की काली धारियों/ और ख़ुशबुओं के अपने प्रभामण्डल के साथ।” इन पंक्तियों में केवल दृश्य नहीं है। यहाँ चूल्हे की आँच है, धुएँ की गन्ध है, भुट्टे का स्वाद है, हाथों की गर्मी है, नमक और नींबू की कसैलापन है। कविता पाँचों इन्द्रियों को एक साथ सक्रिय कर देती है। यही कारण है कि अरुण कमल ने उन्हें "चाक्षुष और श्रवण बिम्बों का सहज स्थपति" कहा है। उनकी कविता किसी असाधारण घटना की प्रतीक्षा नहीं करती; वह साधारण जीवन के भीतर छिपे असाधारण सौन्दर्य और असाधारण पीड़ा को खोज लेती है।
मृत्यु हिन्दी कविता का कोई नया विषय नहीं है। निराला से लेकर केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण तक अनेक कवियों ने मृत्यु को अपने-अपने ढंग से देखा है। किन्तु चन्दन सिंह मृत्यु को उस क्षण में पकड़ते हैं जिसे सामान्यतः कोई देखता ही नहीं; वह क्षण जब किसी मृत व्यक्ति की खुली आँखों को कोई दूसरा व्यक्ति धीरे-से बन्द करता है। कवि लिखते हैं “पर इसमें हुआ यह/ कि जो दृश्य था एक उसकी आँखों के सामने/ एक खुली खिड़की,/ आम के कुछ पत्ते,/ टेलीफोन का तनिक झुका हुआ एक खम्भा,/ बिजली के तार,/ सामने के सफ़ेद मकान पर पोचारे-सी धूप,/ नीला आकाश,/ अपनी उड़ान पर थिर बैठी एक चील,/ कमरे में लोगों के चेहरे,/ घूमता हुआ एक पंखा। / उसकी पलकें/इस पूरे दृश्य को/ पोंछती हुईं बन्द हुईं।” इस कविता का सबसे बड़ा सौन्दर्य इसकी सिनेमाई दृश्य-रचना में है। कैमरा किसी मृत व्यक्ति की आँख बन जाता है। वह एक-एक दृश्य को दर्ज करता चलता है - खिड़की, पत्ते, बिजली के तार, धूप, आकाश, चील, पंखा, चेहरे। फिर धीरे-धीरे पलकें बन्द होती हैं और ऐसा लगता है मानो किसी चित्रकार ने पूरे दृश्य पर एक ही बार में ब्रश फेर दिया हो। कवि ने 'बन्द हुईं' नहीं लिखा, बल्कि लिखा "इस पूरे दृश्य को पोंछती हुईं बन्द हुईं।" चन्दन सिंह कविता में मृत्यु का दर्शन नहीं लिखते; वे मृत्यु का दृश्य लिखते हैं। यही उनकी विशिष्टता है।
उनकी कविता की एक और बड़ी विशेषता यह है कि वे समय को अत्यन्त लचीले ढंग से बरतते हैं। आधुनिक फोटोग्राफी में माइक्रो और मैक्रो दृष्टि की चर्चा होती है। कभी कैमरा किसी एक बूँद पर केन्द्रित हो जाता है, तो कभी पूरा परिदृश्य उसके भीतर समा जाता है। चन्दन सिंह की कविताओं में भी यही क्षमता दिखाई देती है। वे कभी एक क्षण को इतना विस्तृत कर देते हैं कि उसमें पूरा जीवन दिखाई देने लगता है और कभी कई दशकों के सामाजिक परिवर्तन को कुछ पंक्तियों में समेट देते हैं। इस दृष्टि से ‘बसना’ संग्रह की सबसे विलक्षण कविताओं में से एक है। यह कविता केवल किसी नए मोहल्ले के बसने की कथा नहीं है। यह विकास, विस्थापन, स्मृति, हिंसा और मनुष्य की जड़ों से कटते जाने की महागाथा है। समकालीन हिन्दी कविता में विस्थापन पर बहुत-सी कविताएँ लिखी गई हैं, किन्तु चन्दन सिंह की यह कविता अपने बिम्बों और बहुस्तरीय अर्थों के कारण अलग पहचान बनाती है। कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ ही पूरा दृश्य उपस्थित कर देती हैं “यह शहर का नया बसता हुआ इलाक़ा है।/ यहाँ सब्ज़ियों से अधिक अभी सीमेंट-छड़ की दुकानें हैं।” केवल दो पंक्तियों में एक पूरा बदलता हुआ भूगोल उपस्थित हो जाता है। यह दृश्य केवल शहरी विस्तार का नहीं, बल्कि कृषि-संस्कृति के धीरे-धीरे सिकुड़ते जाने का भी है। इसके बाद कवि लिखते हैं “पर ये सिर्फ़ खेत ही नहीं,/ प्लॉट भी हैं।/ कागज़ पर नहीं तो आँखों में,/ कहीं न कहीं नक़्शा तैयार है।” विकास की शुरुआत बुलडोज़र से नहीं होती; वह मनुष्य की दृष्टि से होती है। जिस दिन खेत को खेत नहीं, प्लॉट समझ लिया जाता है, उसी दिन उसका भविष्य बदल जाता है। फिर कवि नए बने घर को देखता है “कल अगर यहाँ आना हुआ गृह-प्रवेश के भोज में,/ तो वह मकान/ जिसकी दीवारों पर प्लास्टर नहीं होगा,/ जिसकी खिड़कियों-दरवाज़ों की कच्ची लकड़ियों में/ एक ख़ुशबू होगी जिसे पेड़ छुपाकर रखते हैं,/ जिसकी ताज़ा छत की छाया में एक गीलापन होगा,/ वह मकान मुझे/ एक खड़ी फ़सल की तरह ही दिखाई देगा पहली बार।” नया मकान उन्हें "खड़ी फ़सल" दिखाई देता है। यह तुलना केवल वही कवि कर सकता है जिसने गाँव और शहर दोनों को भीतर से जिया हो। लेकिन कविता यहीं नहीं रुकती। वह अचानक भविष्य के उस यथार्थ की ओर मुड़ती है जिससे आधुनिक भारत लगातार गुजर रहा है “इस इलाक़े का बसना/ उस दिन लगभग पूरा मान लिया जाएगा/ जिस दिन यहाँ पहली हत्या होगी।/ और जिस दिन यहाँ की झोंपड़पट्टियाँ उजाड़ दी जाएँगी,/ वह इसके बसने का आख़िरी दिन होगा।” यहाँ कविता का स्वर अचानक बदल जाता है। बसना केवल घर बनना नहीं है; उसके साथ अपराध, असमानता, अतिक्रमण और सत्ता का हस्तक्षेप भी आता है। और जब झुग्गियाँ उजाड़ी जाती हैं, तब विडम्बना यह है कि उसी दिन सभ्यता स्वयं अपने नैतिक पतन की घोषणा कर देती है। इस कविता का समापन मार्मिक है - “ऐसे ही बसेगा यह इलाक़ा।/ यहाँ बसने के चक्कर में एक दिन पाऊँगा/ उजाड़ होकर ढह चुका है गाँव का घर।/ देखते-देखते वह तब्दील हो चुका है/ एक डीह में।/ जीते-जी हो गया हूँ मैं/ अपना ही पूर्वज।”
"जीते-जी हो गया हूँ मैं अपना ही पूर्वज" यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज के विस्थापन का इतिहास है। आज करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्होंने गाँव छोड़ा है, शहर बसाया है, लेकिन भीतर कहीं अपना पुराना घर अब भी सँजोए हुए हैं। जब वे लौटते हैं तो पाते हैं कि घर नहीं रहा, लोग नहीं रहे, पेड़ नहीं रहे, रास्ते बदल गए। उस क्षण वे अपने ही अतीत के दर्शक बन जाते हैं।
यदि 'बसना' विस्थापन की कविता है तो 'चारुकेशी' पुनर्जन्म की कविता है। 'चारुकेशी' भारतीय संगीत का एक अत्यन्त भावप्रधान राग है। करुणा और माधुर्य से भरे इस राग का उल्लेख करते ही एक विशेष भावभूमि निर्मित हो जाती है। साथ ही 'चारुकेशी' का अर्थ है, सुन्दर केशों वाली स्त्री। चन्दन सिंह ने इस बहुअर्थी शब्द का अत्यन्त रचनात्मक उपयोग किया है। कविता की नायिका अपने लम्बे, घने बालों से प्रेम करती है। वे उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं, उसके सौन्दर्य का भी और उसके आत्मविश्वास का भी। किन्तु कैंसर का उपचार आरम्भ होते ही उसके सारे बाल झड़ जाते हैं। यह केवल शरीर का परिवर्तन नहीं, आत्म-छवि का भी टूटना है। किन्तु कवि इस दुख को अन्तिम सत्य नहीं बनने देता। जब उपचार समाप्त होता है और उसके सिर पर फिर छोटे-छोटे कोमल बाल उगने लगते हैं, तब वही स्त्री उन्हें देखकर प्रसन्न होती है। यह प्रसन्नता केवल बाल लौट आने की नहीं है; यह जीवन के लौट आने की प्रसन्नता है। यहीं यह कविता अपने शीर्षक की सार्थकता सिद्ध करती है। जैसे राग चारुकेशी आरोह और अवरोह से अपना भाव-संसार रचता है, वैसे ही यह कविता भी सुख, पीड़ा और पुनः जीवन, इन तीन स्वरों में विकसित होती है। इसमें करुणा है, लेकिन निराशा नहीं; इसमें बीमारी है, लेकिन पराजय नहीं; इसमें मृत्यु की आहट है, किन्तु अन्ततः जीवन का उत्सव है। इस कविता को पढ़ते हुए लगता है कि चन्दन सिंह केवल कवि नहीं, मनुष्य के भीतर बची हुई आशा के भी कवि हैं।
चन्दन सिंह की कविताओं को पढ़ते हुए एक बात बार-बार अनुभव होती है कि वे संसार को केवल आँखों से नहीं देखते, कानों से भी सुनते हैं। उनके लिए ध्वनि भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना दृश्य। शायद यही कारण है कि उनकी अनेक कविताएँ पढ़ते हुए लगता है मानो भीतर कोई अनसुना संगीत बज रहा हो। यह संगीत केवल शब्दों की लय का नहीं, बल्कि जीवन की लय का संगीत है। ‘पानी गिरने की आवाज़’ ऐसी ही कविता है। कविता छोटी है, किन्तु उसके भीतर जीवन-दर्शन की गहरी व्यंजना छिपी हुई है। कवि लिखते हैं “पानी गिरने की आवाज़/ कुछ न कुछ भरने की आवाज़ है।/ कुछ न कुछ भरता है,/ चाहे गड्ढा,/ या कुँआ,/ या सीपी,/ या कण्ठ,/ या बाल्टी।” कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहजता है। पानी के गिरने की ध्वनि को कवि ने ‘भरने की आवाज़’ कहा है। यह भरना केवल जल से भरना नहीं है। जीवन में जो भी रिक्त है, वह किसी न किसी रूप में भरता रहता है। धरती भी, मन भी, स्मृति भी और मनुष्य का कण्ठ भी। कविता यह याद दिलाती है कि प्रकृति का स्वभाव रिक्तता को भरना है। यही उसकी सबसे बड़ी सांत्वना है। इसी प्रकार ‘साइकिल’ कविता रिश्तों की उस गरमाहट को सामने लाती है जो आज के तेज़ी से बदलते समय में धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही है। दादा के लिए जीवन की सबसे बड़ी चिन्ता अपना बुढ़ापा, अपनी बीमारी नहीं, बल्कि वह साइकिल है जिसे उन्होंने अपने पोते से देने का वादा किया है।
चूँकि चन्दन सिंह दर्शनशास्त्र के अध्यापक रहे हैं, इसलिए उनकी कुछ कविताओं में दार्शनिक चिंतन का सहज प्रवेश दिखाई देता है। उल्लेखनीय बात यह है कि यह दर्शन कहीं भी कविता पर आरोपित नहीं लगता। वह अनुभव से उपजता है। ‘जरा मरण’ इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। बुद्ध के जीवन की सर्वविदित घटना को कवि अत्यन्त सरल शब्दों में नया अर्थ देते हैं -“सिद्धार्थ के पास/ अपना बुढ़ापा नहीं था,/ न अपनी कोई बीमारी,/ और न ही मृत्यु अपनी।/ बुढ़ापा और बीमारी और मृत्यु से/ उन्हें भय हुआ,/ भय अपना था।” यहाँ कवि एक अत्यन्त सूक्ष्म दार्शनिक सत्य की ओर संकेत करते हैं। सिद्धार्थ को जिस वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर वैराग्य हुआ, वह उनका अपना बुढ़ापा या अपनी मृत्यु नहीं थी। किन्तु उस दृश्य में उन्होंने अपना भविष्य देख लिया। मनुष्य को दूसरे की मृत्यु इसलिए विचलित करती है क्योंकि वह उसमें अपनी मृत्यु की सम्भावना पहचान लेता है। यही पहचान उसे आत्मबोध की ओर ले जाती है। इतनी गहन दार्शनिक अवधारणा को इतनी सहज भाषा में व्यक्त कर पाना किसी सिद्ध कवि की ही क्षमता हो सकती है।
इस संग्रह में एक और कविता विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है ‘बाघ का पता’। चन्दन सिंह स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने कविता अपने वरिष्ठ और समकालीन कवियों से सीखी है। यह स्वीकारोक्ति उनके व्यक्तित्व की विनम्रता का परिचायक है। वास्तव में कोई भी बड़ा कवि शून्य से आरम्भ नहीं करता; वह अपने पूर्ववर्तियों की परम्परा को आत्मसात करता है और फिर उसमें अपना स्वर जोड़ता है। कविता में कवि लिखते हैं “जिससे मैं डरने की कोशिश कर रहा था,/ वह बाघ नहीं था।/ जो मुझे नहीं डराने की कोशिश कर रहा था,/ वह भी बाघ नहीं था।/ तो फिर बाघ था कहाँ?/ चलो, दिल्ली चलते हैं/ और कवि केदारनाथ सिंह से पूछ आते हैं/ कि बाघ कहाँ था उस वक़्त।” इन पंक्तियों में एक पूरी साहित्यिक परम्परा के प्रति सम्मान निहित है। समकालीन कविता में पूर्ववर्ती कवियों से संवाद की यह परम्परा अब अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। चन्दन सिंह इस संवाद को अत्यन्त सहज और आत्मीय ढंग से निभाते हैं। इसी प्रकार इस संग्रह में कई स्थानों पर नागार्जुन, अरुण कमल और अन्य कवियों की स्मृति अनायास उपस्थित हो जाती है। किन्तु यह स्मृति प्रभाव का प्रमाण नहीं, बल्कि परम्परा का विस्तार है। हिन्दी कविता की श्रेष्ठ परम्परा सदैव संवाद की परम्परा रही है। तुलसी से निराला तक और निराला से केदारनाथ सिंह तक यह परम्परा निरन्तर विकसित होती रही है। चन्दन सिंह उसी धारा के कवि हैं।
यदि पूरे संग्रह का समग्र मूल्यांकन किया जाए तो सबसे पहले जिस बात पर ध्यान जाता है, वह है इसकी बिम्ब-सृष्टि। चन्दन सिंह की कविता विचारों से अधिक चित्रों में बोलती है। वे कहते कम हैं, दिखाते अधिक हैं। उनके यहाँ धूप केवल धूप नहीं रहती; वह किसी सफेद मकान पर ‘पोचारे-सी’ पड़ती है। मकान केवल मकान नहीं रहता; वह ‘खड़ी फसल’ बन जाता है। मृत्यु केवल मृत्यु नहीं रहती; वह पलकों द्वारा संसार को ‘पोंछ देने’ की क्रिया बन जाती है। बुलडोज़र केवल मशीन नहीं रहता; वह शहर के श्रृंगार की ‘कंघी’ बन जाता है। यही बिम्ब उनकी कविता को स्मरणीय बनाते हैं। संग्रह का दूसरा उल्लेखनीय पक्ष है, इन्द्रियबोध। हिन्दी कविता में ऐसे कवि अपेक्षाकृत कम हैं जिनकी कविताओं में दृश्य, ध्वनि, गन्ध, स्वाद और स्पर्श, पाँचों इन्द्रियाँ एक साथ सक्रिय हो उठती हैं। चन्दन सिंह की कविता पढ़ते हुए कभी भुट्टे की महक आती है, कभी पानी गिरने की आवाज़ सुनाई देती है, कभी धूप आँखों में उतरती है, कभी कच्ची लकड़ी की गन्ध महसूस होती है। उनकी कविता पाठक को केवल विचार नहीं देती, वह अनुभव देती है। संग्रह की तीसरी और सबसे स्थायी उपलब्धि है, उनकी करुणा। उनकी कविता में गरीब किसी आँकड़े की तरह उपस्थित नहीं होता, वह अपने पूरे जीवन, स्वाभिमान और पीड़ा के साथ उपस्थित होता है। मजदूर, किसान, स्त्री, बच्चा, बूढ़ा, सभी उनकी कविता में बराबरी के साथ आते हैं। उनकी कविता का एक और उल्लेखनीय गुण है कि वह पाठक पर विश्वास करती है। वह हर बात समझाती नहीं। वह कई स्थानों पर अर्थ अधूरा छोड़ देती है ताकि पाठक स्वयं उसे पूरा करे। यही कारण है कि इस संग्रह की अनेक कविताएँ बार-बार पढ़े जाने की माँग करती हैं। हर पुनर्पाठ में वे कुछ नया देती हैं।
आश्चर्य होता है कि 2004 में प्रकाशित यह महत्त्वपूर्ण संग्रह उस स्तर की चर्चा प्राप्त नहीं कर सका जिसका वह वास्तविक अधिकारी था। हिन्दी साहित्य में कई बार ऐसा हुआ है कि उत्कृष्ट कृतियाँ अपने समय में अपेक्षित ध्यान नहीं पा सकीं और बाद में उनका महत्त्व अधिक स्पष्ट हुआ। ‘बारिश के पिंजरे में’ भी मुझे ऐसी ही कृतियों में दिखाई देता है। इस संग्रह के लिए कवि केदारनाथ सिंह ने लिखा ‘समकालीन कविता के सुपरिचित मुहावरे को अपने ढंग से बरतता हुआ यह कवि उसके भीतर से अपने लिए नयी सरणियाँ निकालना चाहता है। यह रचनात्मक कोशिश इस संग्रह को खासतौर से उल्लेखनीय बनाती है’। यह अत्यन्त सुखद है कि अनबाउंड स्क्रिप्ट ने इस संग्रह को नए कलेवर में पुनः प्रकाशित किया है। किसी अच्छी पुस्तक का पुनर्प्रकाशन केवल पुनर्मुद्रण नहीं होता; वह साहित्यिक स्मृति का पुनर्जीवन भी होता है। यह संस्करण नई पीढ़ी के पाठकों को चन्दन सिंह की कविता से परिचित होने का अवसर देगा। अच्छी कविताएँ अपने समय से बड़ी होती हैं और वे अपने पाठकों की प्रतीक्षा करती हैं। 'बारिश के पिंजरे में' भी ऐसी ही पुस्तक है। दो दशक पहले प्रकाशित यह संग्रह आज भी उतना ही ताज़ा, उतना ही आर्द्र और उतना ही मानवीय है। शायद इसलिए कि भूख, विस्थापन, प्रेम, स्मृति, मृत्यु और आशा इनमें से कोई भी विषय पुराना नहीं होता। चन्दन सिंह की कविताएँ हमें केवल संसार को नहीं, स्वयं को भी नए सिरे से देखने की दृष्टि देती हैं। यही किसी बड़े कवि की सबसे विश्वसनीय पहचान है।