अमर उजाला शब्द सम्मान समारोह में प्रख्यात रचनाकार गोविंद मिश्र को 'आकाशदीप' अलंकरण से सम्मानित किया गया। उनको प्रख्यात संगीतज्ञ और वायलिन वादक डॉ. एन. राजम ने आकाशदीप सम्मान प्रदान किया।
आकाशदीप सम्मान पाने वाले साहित्यकार गोविंद मिश्र ने कहा कि लेखकों को जानने का सबसे अच्छा तरीका उन तक रचनाओं के माध्यम से पहुंचना है। मनुष्य की स्थिति गाजर मूली जैसी हो गई है, युद्ध को रोकने के बजाय खनिज पर लोगों की नजर है। शब्दों के अर्थ धुंधले और उल्टे सीधे हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुझे अपने गुरुजनों की याद आती है जिन्होंने पढ़ाई और फिर साहित्य से जोड़ा। मैं उनका अनुग्रही हूं।
उन्होंने कहा कि इन दिनों धर्म के बारे में कन्फ्यूजन है। लेकिन तुलसीदास ने बताया कि परहित सरस धर्म नहीं भाई। साहित्य और कर्म की परिभाषाएं हैं। उन्होंने अहमद फ़राज़ का एक शेर पढ़ा कि शिकवा ए जुल्मत ए शब से तो कहीं बेहतर था, कि अपने हिस्से के की कोई शम्मा जलाते जाते। उन्होंने कहा कि लेखन एकांत में पढ़ा जाता है आपकी आत्म से संवाद करता है। संसार में जो कष्ट है उसे झेलने की ताकत देता है। सुंदरता ही संसार को बचाएगी। यानि अच्छाई ही संसार को बचाएगी।
जिसने संवेदना के स्तर पर उद्वेलित किया, उन्ही पर लिखा : गोविंद मिश्र, प्रख्यात रचनाकार
जिसका जो अनुभव का क्षेत्र होता है, वह उस पर लिखता है। मुझे जिन चीजों ने संवेदना के स्तर पर उद्वेलित किया, मैंने केवल उन्हीं चीजों पर लिखा। सायास लेखन मुझसे न हो सका। इन दिनों साहित्य में चमत्कार करने वाले विषय, नए-नए शिल्प और चमत्कृत करने वाली भाषा का प्रयोग अधिक हो रहा है, पर विराटता और संवेदना की गहराई कम हुई है। समाज में भी बदलाव आया है। लोगों को कुछ भी प्रभावित नहीं करता। जिन लोगों पर आप अपने लिखे का असर देखना चाहते हैं, उनका मन आंदोलित नहीं होता, जबकि साहित्य सूक्ष्म है, जिसका असर तात्कालिक नहीं होता। हमने अपना धैर्य खो दिया है।
साहित्य के पास कोई जादू की छड़ी नहीं होती, पर समाज के स्तर पर वह उसे दिखाता है, जो समाज में अच्छा बचा है और व्यक्ति के तौर पर वह पाठक को आत्मबल देता है। लोग कहते हैं, साहित्य में भाषा की गिरावट हो गई है। मेरा मानना है कि भाषा की भावना महत्वपूर्ण है। वह असरकारी होती है। आज जो भाषा साहित्य में लिखी जा रही है, वह जटिल यथार्थ को पकड़ने वाली है। इसी कारण उसके आयाम अलग-अलग हैं। इसे मैं भाषा का विकास मानता हूं।
वैसे साहित्य और विमर्श, दोनों अलग-अलग चीजें हैं। विमर्श को साहित्य के नाम पर नहीं चलाया जा सकता। विमर्श एक शॉर्टकट है, जबकि सर्जना का संबंध हृदय से होता है। किसी रचना में लेखक की संवेदना की तीव्रता और उसका खास ढंग से महसूस करना ही रचना को विशिष्ट बनाता है। सिर्फ यही निष्कर्ष है, जो साहित्य को दूसरे लेखन से अलग बनाता है।
एक वर्ष पहले