जिले में करीब दो दशक पहले जो पाकिस्तान परस्त आतंकियों के वर्चस्व वाले इलाके थे, अब एक बार फिर आतंकी इन पुराने इलाकों में सक्रिय होते नजर आ रहे हैं। जिले में चार दिन में आतंकियों द्वारा सुरक्षाबलों पर किए हमलों पर गौर करें तो इन हमलों को उन क्षेत्रों के आसपास ही अंजाम दिया गया, जहां 2002 के पहले आतंकियों का वर्चस्व था।
इससे संकेत मिलने लगे हैं कि कहीं न कहीं जिले में आतंकियों का समर्थन करने वालों, उन्हें पनाह और मदद देने वाले कई स्थानीय लोग हैं क्योंकि क्षेत्र में आतंकियों की मौजूदगी की सटीक जानकारी भी सुरक्षाबलों और खूफिया एजेंसियों से दूर होती नजर आ रही है। जिस तरह 1990 से 2000 के बीच आतंकियों की मौजूदगी की काफी कम सूचनाएं सुरक्षाबलों-खूफिया एजेंसियों तक पहुंचती थी, कुछ वैसा ही हाल अब भी है।
आतंकियों के पुराने ठिकाने के आसपास ही हुए हालिया हमले
जिले में आतंकवाद के दौर में जहां सुरनकोट तहसील के सुरन नदी के उस पार के क्षेत्रों में आतंकियों के बड़ी मात्रा में ठिकाने थे। तहसील के मस्तानदरा, मुगलमाड़ा, देहरागली, दराबा में और मेंढर तहसील के संगयोट, मक्का मजंयाड़ी, भाटादूड़ियां व गुरसाई आतंकियों का गढ़ माना जाता था।
ऐसे में अगर चमरेड़ में हुए आतंकी हमले को देखें तो उसके आसपास का इलाका मस्तानदरा व दराबा से सटा हुआ है और हाल ही के भाटादूड़ियां हमले में भी संगयोट, नक्का मंजयाड़ी व गुरसाई का इलाका शामिल है, जहां आतंकवाद के दौर में आतंकियों का गढ़ होता था।
अगर आतंकी गतिविधियों पर गौर किया जाए तो इस तरह के हमले बिना स्थानीय सहयोग के संभव नहीं, क्योंकि इस प्रकार के हमलों को अंजाम देने के लिए आतंकियों को कई दिनों तक उसी क्षेत्र में रहना होता है, जहां उन्हें खाने-पीने से लेकर आश्रय लेने तक की जरूरत होती है।
फिर आतंक की आग लगाने की कोशिश
हाल ही के हमलों से अमर उजाला की वह बात भी पूरी तरह सही साबित हो रही है कि आतंकी संगठनों के आका, आईएसआई और पाकिस्तानी सेना पुंछ व राजोरी को फिर से आतंकवाद की आग में झोंकने का काम कर रही है। क्योंकि राजोरी के थन्नामंडी में, सुरनकोट के चमरेड़ में और मेंढर के भाटादूड़ियां में हुए हमलों में शामिल आतंकी नियंत्रण रेखा के उस पार से घुसपैठ करने के बाद घाटी में न जाकर यहीं डेरा डाले हुए हैं और पूरी योजना के साथ हमलों को अंजाम दे रहे हैं।