जलवायु परिवर्तन के कारण जम्मू संभाग के तीन जिलों के औसतन तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव आ गया है। इसके चलते जनजीवन प्रभावित हो रहा है। रियासी के कटड़ा, रामबन के बटोत व बनिहाल और डोडा के भद्रवाह समेत अन्य पहाड़ी इलाकों में निर्धारित समय पर वर्षा नहीं हो रही। वहीं इन जिलों के इलाकों में औसतन तापमान में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
विशेषज्ञों का दावा है कि पिछले तीस सालों में कटड़ा का औसतन तापमान 1.448 डिग्री सेल्सियस, भद्रवाह का 1 .42 डिग्री सेल्सियस और जम्मू का 0.427 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है। वहीं रामबन के बनिहाल का औसतन तापमान 1.518 डिग्री सेल्सियस व बटोत का 0.625 डिग्री सेल्सियस है।
जम्मू विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के विशेषज्ञ डॉ. सरफराज का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से पहाड़ी जिलों के उच्च पर्वतीय इलाके ज्यादा प्रभावित हैं। यह खुलासा उन्होंने 1987 से लेकर 2019 तक किए गए शोध अध्ययन के आधार पर किया है। इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की ई-स्प्रिंजर नाम की पत्रिका में उनके शोध पत्र भी प्रकाशित हो चुके हैं।
उन्होंने कहा कि शोध अध्ययन से जानकारी मिली है कि उच्च पर्वतीय इलाके अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इन इलाकों का मूल ढांचा अधिक कमजोर है। लोगों की आजीविका पर पड़ रहे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने के लिए योजनाकारों और नीति तैयार करने वालों को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। वहीं दूसरी तरफ जम्मू और कठुआ जैसे मैदानी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का कम प्रभाव नजर आ रहा है।
उनका कहना है कि मैदानी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं हैं। लोगों की सामाजिक व आर्थिक स्थिति भी बेहतर है। लेकिन धीरे-धीरे मैदानी क्षेत्र भी प्रभाव की जद में रहे हैं। इन क्षेत्रों में भी भू- जलवायु संबंधी खतरे बढ़ रहे हैं, जो बाढ़ और गर्मी से ग्रस्त हो रहे हैं। इन क्षेत्रों को बाढ़ जैसे खतरे से बचाने के लिए सख्त नीति बनाई जानी चाहिए।
विशेषज्ञों के अनुसार जम्मू संभाग में 20 फीसदी गुज्जर, बकरवाल, गद्दी और सिप्पी समुदाय की आबादी है, जो अपनी आजीविका के लिए कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। इन समुदाय के आवास की स्थिति बदहाल है। जलवायु के बदलाव से इनकी आजीविका ज्यादा संवेदनशील होती जा रही है। आजीविका की स्थिति को बेहतर रखने के लिए जलवायु के प्रभाव से निपटने के लिए गंभीरता से सोचना होगा।
तापमान में हो रही बढ़ोतरी
ग्रीन हाउस, कार्बनडाईऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रोजन आदि गैसों के उत्सर्जन से पृथ्वी के औसत तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। इससे मौसम में बदलाव हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश का कोई समय निर्धारित नहीं है। कभी बारिश होती नहीं, तो कभी बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जाते हैं। इसका कृषि पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है।
किसानों के साथ-साथ जनजातीय समुदाय के लोगों को भी दिक्कत पेश आती है। मौसम बदलते ही जनजातीय समुदाय जिन क्षेत्रों में जाता है। वहां माल मवेशी के लिए समय पर चारा नहीं मिलता। इसका ज्यादा प्रभाव उन लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन का जिम्मेदार इंसान खुद है। पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत रखने के लिए योजना से काम किया जाए, ताकि प्रकृति संतुलन बना रहे।