सुप्रीम कोर्ट ने श्रीनगर के हैदरपोरा में पिछले साल हुई मुठभेड़ में मारे गए चार लोगों में से एक आमिर माग्रे के पिता की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने दफनाए गए शव को सौंपने की गुहार लगाई गई थी।न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने सोमवार को कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि मृतक को सही तरीके से नहीं दफनाया गया था और ऐसे मामलों का फैसला केवल भावनाओं के आधार पर नहीं किया जा सकता था।
पीठ ने हालांकि जम्मू-कश्मीर प्रशासन को निर्देश दिया कि वह परिवार को पांच लाख रुपये का मुआवजा देने के हाईकोर्ट के निर्देश का पालन करे और साथ ही उन्हें उस कब्र स्थल पर प्रार्थना करने की अनुमति दे जहां उसके बेटे के शव को दफनाया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह शवों को कब्र से निकालने (शवोत्खनन) के संबंध में एक कानून लाने पर विचार करे क्योंकि देश में मृतक के परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए अनुरोध से निपटने के लिए ऐसा कोई कानून नहीं है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि शवों को कब्र से निकालने के लिए वैध अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा- 176(3) में निहित है और पोस्टमॉर्टम के उद्देश्य से अपराध का पता लगाने और हत्या, मौत का विवादित कारण, जहर देने आदि का संदेह होने की स्थिति में इस गतिविधि की अनुमति है।
अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी बताया कि भारत में सीआरपीसी की धारा- 176 (3) को छोड़कर, शवों को निकालने से संबंधित कोई कानून नहीं है। बहुत कम देशों में इस संबंध में कानून है। ऐसा ही एक कानून आयरलैंड में उपलब्ध है।