अखनूर। गांव घराला में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में प्रवचन करते हुए संत सुभाष शास्त्री ने कहा कि सुख की अभिलाषा तो सब करते हैं, परंतु मन को अपवित्र करके देखो। संसार में मनुष्य के मन में न कहीं पाप है, न कहीं दुख, न बैर, न कोई झगड़ा। आप जरा ऐसी दुनिया की कल्पना करें, जिसमें या तो मनुष्य का नामोनिशान भी न हो या समस्त सुष्यजाति मचियेत अवस्था में हो। तो फिर इस दुनिया में दु:ख नाम की कोई चीज न होगी।
कथा वाचक ने कहा कि इसका अर्थ यह है कि यदि मनुष्य मन को पंक्ति में रखे और विवेक से काम ले तो वह कभी दु:खी नहीं होंगा। मन की पवित्रता का महत्व बताते हुए शास्त्री जी ने कहा- कर्ज लेकर तीर्थ यात्रांक करने की अपेक्षा पाप कर्मों से बचना और अपने मन को पवित्र और शुद्ध रखना अधिक श्रेष्ठ है। व्यक्ति को सुख और दु:ख को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। समदर्शी व्यक्ति को यश- अपयश की भी चिंता नहीं करनी चाहिए और इस सम दृष्टि रखने के लिए मन की पवित्रता का होना जरूरी है।