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मक्का-धान की जगह खिल रहा गेंदा, पंजाब तक पहुंच रही महक

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भद्रवाह। मिनी कश्मीर के नाम से प्रसिद्ध भद्रवाह की पहचान का मोहताज नहीं है। प्रकृति ने डोडा के उपमंडल भद्रवाह को काफी खूबसूरती से नवाजा है। लेकिन लोग पर्यटन पर ही मोहताज न रह कर नकदी फसलों के जरिये स्वयं को सबल बनाने में जुटे हैं। पहले विदेशी लैवेंडर की खेती शुरू की और अब भद्रवाह के 500 परिवारों ने गेंदे की खेती में हाथ आजमा कर आमदनी में इजाफा किया है। विशेष मौसमी दशाएं होने के चलते यहां का गेंदा जम्मू सहित पंजाब के बाजारों में जगह बना चुका है।
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भद्रवाह के पांच सौ किसान परिवारों ने मक्का और धान की पारंपरिक खेती को छोड़ कर गेंदे की ओर रुख किया है। इससे उन्हें अच्छी खासी आमदनी हो रही है। किसानों की आय दोगुनी करने के प्रधानमंत्री के सपने को सही मायने में सच करके 500 परिवारों की किस्मत तेजी से बदल रही है। भद्रवाह की केलाड़ घाटी में 500 परिवार मक्का और धान के स्थान पर अब व्यापक स्तर पर गेंदे की खेती करने लगे हैं। इस साल जून से जम्मू में 200 क्विंटल की दर गेंदा बेच रहे हैं।
मैदानों में पैदावार कम होते ही भद्रवाह में खिलता है गेंदा
गर्मी के दौरान जब मई से नवंबर तक मैदानी इलाकों से गेंदे की पैदावार कम होती है तो उसी समय भद्रवाह की पहाड़ियों में गेंदा खिलने लगते हैं। अनुकूल दशाओं के चलते लोगाें को काफी लाभ मिल रहा है।
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मंदिरों के शहर का मिल रहा फायदा
जम्मू को मंदिरों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। गेंदे का फूल हिंदू धर्म के सभी त्योहारों में खास स्थान रखता है। इस कारण हर दिन सैकड़ों भक्तों के मंदिरों में पहुंचने और पूजा के लिए फूलों की जरूरत होती है, जिसे अब भद्रवाह पूरी करने लगा है। केलाड़ घाटी के गजोठ पंचायत के फूल उत्पादकों का दावा है कि वह अकेले हर दिन 100 क्विंटल गेंदा की आपूर्ति करते हैं। गेंदे की खेती को अपनाने के बाद आय में चार गुना बढ़ोतरी हुई है। वह फैसले से खुश हैं।
अकेले केलाड़ घाटी के 500 परिवार गेंदा उगा रहे हैं। परिणामस्वरूप गर्मी में जम्मू और पंजाब को गेंदा के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता बन गए हैं। आय भी चार गुना बढ़ गई है। किसानों ने एक सहकारी समिति का भी गठन किया है, ताकि वे वह बिचौलियों के बिना बाजार में फूलों की आपूर्ति का प्रबंधन कर सकें। काम को लेकर विशेषतौर पर केलाड की महिलाएं काफी खुश हैं।
- हिंद भूषण, सदस्य, किसान सलाहकार बोर्ड
फूलों को उगाने से मिलती है खुशी
खुरबा पंचायत की हरदेई (70) ने कहा कि पहले के मुकाबले अब चीजें तेजी से रही हैं। मेरी पोती सहित नई पीढ़ी खुशी-खुशी गेंदे की खेती कर रही है। मक्का और धान की तुलना में फूलों को उगाने में वह एक स्टेटस सिंबल पाते हैं। फूलों के खतों में काम करते हुए वीडियो और तस्वीरें गर्व से अपलोड़ करते हैं। इसमें उन्हें काफी खुशी मिलती है।
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