उधमपुर। देविका किनारे निजी पैलेस में सोमवार से शुरू श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के दूसरे दिन कथावाचक सुभाष शास्त्री ने संगत को अक्षय तृतीया का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि शास्त्रों में अक्षय तृतीया को स्वयंसिद्ध मुहूर्त माना गया है। अक्षय तृतीया के दिन मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार अथवा उद्योग का आरंभ करना अति शुभ फलदायक होता है। सही मायने में अक्षय तृतीया अपने नाम के अनुरूप शुभ फल प्रदान करती है। अक्षय तृतीया पर सूर्य व चंद्रमा अपनी उच्च राशि में रहते हैं।
उन्होंने कहा कि वैशाख के समान कोई मास नहीं है। सत्ययुग के समान कोई युग नहीं है। वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है। उसी तरह अक्षय तृतीया के समान कोई तिथि नहीं है। मान्यता है कि इस दिन जो भी काम किया जाता है, उसमें बरकत होती है। यानी इस दिन जो भी अच्छा काम करेंगे, उसका फल कभी समाप्त नहीं होगा। अगर कोई बुरा काम करेंगे, तो उस काम का परिणाम भी कई जन्मों तक पीछा नहीं छोड़ेगा।
उन्होंने बताया कि धरती पर भगवान विष्णु ने 24 रूपों में अवतार लिया था। इनमें छठा अवतार भगवान परशुराम का था। पुराणों के मुताबिक उनका जन्म अक्षय तृतीया को हुआ था। इस दिन धरती पर गंगा अवतरित हुई। सतयुग, द्वापर व त्रेतायुग के प्रारंभ की गणना इस दिन से होती है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों की इस मान्यता को वर्तमान में व्यापारिक रूप दे दिया गया है, जिसके कारण अक्षय तृतीया के मूल उद्देश्य से हटकर लोग खरीदारी में लगे रहते हैं। वास्तव में यह वस्तु खरीदने का दिन नहीं है। वस्तु की खरीदारी में आपका संचित धन खर्च होता है। नया वाहन लेना या गृह प्रवेश करना, आभूषण खरीदना इत्यादि जैसे कार्यों के लिए तो लोग इस तिथि का विशेष उपयोग करते हैं।
मान्यता है कि यह दिन सभी का जीवन में अच्छे भाग्य और सफलता को लाता है। इसलिए लोग जमीन, जायदाद संबंधी कार्य शुरू करने जैसे काम भी लोग इसी दिन करने की चाह रखते हैं। दुखियों की सेवा करना, वस्त्रादि का दान और शुभ कर्म की ओर अग्रसर रहते हुए मन, वचन व कर्म से मनुष्य धर्म का पालन करना ही अक्षय तृतीया पर्व की सार्थकता है। चारों धामों में से उल्लेखनीय एक धाम भगवान श्री बद्रीनारायण के पट खुलते हैं। अक्षय तृतीया को ही वृंदावन में श्री बिहारी जी के चरणों के दर्शन वर्ष में एक बार ही होते हैं।