कोवाक्सिन को भारत बायोटेक की तरफ से तैयार किया गया है।
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भारत में निर्मित कोरोनावायरस वैक्सीन- कोवाक्सिन को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की तरफ से आपात इस्तेमाल की मंजूरी मिल गई है। इसी के साथ कोवाक्सिन भारत का पहला टीका बन गया है, जिसे दुनियाभर में इस्तेमाल किया जा सकेगा। भारत में मार्च में ही कोवाक्सिन को मंजूरी मिल गई थी, लेकिन वैक्सीन की तकनीक को लेकर डब्ल्यूएचओ काफी समय से भारत बायोटेक से डेटा जुटा रहा था। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर कोवाक्सिन किस तकनीक पर बनी है और दुनियाभर के टीकों से यह अलग कैसे है।
क्या है कोवाक्सिन और कैसे होता है इसका निर्माण?
कोरोनावायरस वैक्सीन का निर्माण भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड (बीबीआईएल) ने पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के साथ मिलकर किया है। एनआईवी ने संक्रमित लेकिन बिना लक्षण वाले व्यक्ति से ली गई कोरोनावायरस की एक स्ट्रेन को अलग कर लिया और इसे भारत बायोटेक को मई 2020 को सौंप दिया था। इसके बाद कंपनी ने इस स्ट्रेन पर रिसर्च करने के बाद इनएक्टिवेटेड यानी असक्रिय वायरस की तकनीक पर वैक्सीन बनाने की कोशिशें शुरू कीं।
असक्रिय वायरस की तकनीक से वैक्सीन बनाने का सीधा मतलब यह है कि ऐसे टीकों में मरा हुआ या सुषुप्तावस्था में रखा गया वायरस इस्तेमाल होता है। भारत बायोटेक ने ऐसे टीकों को हैदराबाद स्थित हाई-कंटेनमेंट फैसिलिटी में बनाना शुरू किया। एक बार जब यह वैक्सीन इंसानी शरीर में प्रवेश करती है, तो इसमें संक्रमित करने या खुद को कॉपी करने की क्षमता नहीं होती, क्योंकि यह पहले से ही मृत वायरस होता है। यह इंसानी प्रतिरोधक क्षमता के लिए भी मरा हुआ वायरस होता है, यानी इसके प्रवेश से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन इसके बावजूद इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) इस वायरस की पहचान कर इसके खिलाफ एंटीबॉडी तैयार कर लेता है।
इस डेड वायरस वैक्सीन को इंसानी शरीर में लगाए जाने का असर यह होता है कि अगली बार जब भी सक्रिय कोरोनावायरस इंसानी शरीर में घुसने की कोशिश करता है, तो वैक्सीन पा चुके लोगों का इम्यून सिस्टम पहले से ही तैयार होता है, क्योंकि वह पहले ही वायरस की पहचान कर इसके खिलाफ एंटीबॉडी पैदा कर चुका है। यह एंटीबॉडी कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन पर हमला करती हैं और लोगों को कोरोनावायरस संक्रमित होने से बचाती हैं।
कैसे की गई कोवाक्सिन की टेस्टिंग?
कोवाक्सिन को डेड वायरस तकनीक पर तैयार करने के बाद इसकी प्री-क्लिनिकल टेस्टिंग की गई। इसे गिनी पिग और चूहों पर टेस्ट किया गया, ताकि इसके सुरक्षा मानकों को परखा जा सके। बाद में कंपनी ने इंसानी ट्रायल शुरू करने के लिए सीडीएससीओ का रुख किया, जहां इसे ह्यूमन ट्रायल की मंजूरी मिल गई।
क्यों असक्रिय वायरस की तकनीक पर तैयार की गई कोवाक्सिन?
पारंपरिक तौर पर इनएक्टिवेटेड यानी असक्रिय वायरस की तकनीक से बने टीके दशकों से इस्तेमाल में हैं। फिर चाहे वह सीजनल इन्फ्लुएंजा की वैक्सीन हो या पोलियो रेबीज या जापानी इंसेफ्लाइटिस की। इन सभी से बचाव के लिए असक्रिय वायरस का इस्तेमाल होता है और यह काफी सुरक्षित रहती हैं। यह दुनिया की सबसे भरोसेमंद वैक्सीन तकनीक है।
कैसे की गई कोवाक्सिन की टेस्टिंग?
कोवाक्सिन को डेड वायरस तकनीक पर तैयार करने के बाद इसकी प्री-क्लिनिकल टेस्टिंग की गई। इसे गिनी पिग और चूहों पर टेस्ट किया गया, ताकि इसके सुरक्षा मानकों को परखा जा सके। बाद में कंपनी ने इंसानी ट्रायल शुरू करने के लिए सीडीएससीओ का रुख किया, जहां इसे ह्यूमन ट्रायल की मंजूरी मिल गई।
भारत बायोटेक की वैक्सीन को भी आपात इस्तेमाल की मंजूरी से पहले कुल चार फेज की टेस्टिंग से गुजरना पड़ा...
- पहले फेज में वैक्सीन को एक छोटे समूह पर टेस्ट किया गया, ताकि इंसानों को दी जाने वाली डोज की मात्रा, इसके साइड इफेक्ट्स और इसके लगने के बाद शरीर में पैदा हुई प्रतिरोधक क्षमता का अंदाजा लगाया जा सके।
- दूसरे फेज में इस वैक्सीन को सैकड़ों लोगों के समूह पर टेस्ट किया गया। इसमें वैक्सीन पाने के जरूरतमंदों को विशेष तौर पर चुना गया। यानी इसमें लोगों को उम्र और उनके लिंग के आधार पर बांटा गया। इसके अलावा पहले से किसी बीमारी से पीड़ित और स्वस्थ लोगों को भी वर्गीकृत किया गया। दूसरे फेज का मकसद वैक्सीन का प्रभाव आबादी के अलग-अलग वर्ग में समझने के लिए किया जाता है।
- तीसरे फेज में इस वैक्सीन को हजारों मरीजों पर टेस्ट किया गया। रेगुलेटर से मंजूरी मिलने के बाद वैक्सीन पाने वाले सभी मरीजों पर इसके असर की निगरानी की जाती है। इसके बाद कंपनी को सर्विलांस से जुड़ी जानकारी नियामकों को देनी होती है। चौथे फेज में वैक्सीन के घातक असर की समीक्षा की जाती है और इसके सुरक्षा मानकों के आधार पर इस्तेमाल की मंजूरी जारी की जाती है।