23 मार्च 1932 को शहीद भगत सिंह का पहला शहादत दिवस था। होशियारपुर कांग्रेस कमेटी ने घोषणा की थी कि वो इस मौके पर होशियारपुर की कचहरी पर कांग्रेस का झंडा फहराएगी, लेकिन जब कांग्रेस नेताओं ने सुना कि सेना को बुला लिया गया है तो उन्होंने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया।
16 साल के हरकिशन सिंह सुरजीत ने जब इसका कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि सरकार की तरफ़ से आदेश दिया गया है कि जो भी झंडा फहराने की कोशिश करेगा उसे गोली से उड़ा दिया जाएगा।
सुरजीत के पौत्र संदीप सिंह बसी कहते हैं, “कार्यक्रम के रद्द होने पर सुरजीत ने आपत्ति की, इस पर वहां मौजूद एक कांग्रेसी नेता ने कहा कि अगर आप इतने बहादुर हैं तो खुद ही जा कर झंडा फहरा दें। सुरजीत ने लंबा कुर्ता पहना हुआ था, उन्होंने झंडे को उसमें छिपाया, तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपर पहुंचे और यूनियन जैक को उतारकर कांग्रेस का झंडा फहरा दिया।
सुरजीत को गिरफ़्तार कर लिया गया और अगले दिन जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा तो उन्होंने जवाब दिया मेरा नाम लंदनतोड़ सिंह है।” सुरजीत को इस गुस्ताख़ी के लिए एक साल की सज़ा सुनाई गई।
नेहरू की सभा के लिए उजाड़ दी थी खेत में खड़ी तैयार फसल
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बहुत कम लोगों को पता है कि हरकिशन सिंह सुरजीत ने अपनी जन्मतिथि खुद चुनी थी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी बताते हैं, “उस ज़माने में जन्मतिथि का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था। त्योहारों के आधार पर जन्मतिथि निर्धारित होती थी, जब दसवीं की परीक्षा आई तो उनसे अपनी जन्मतिथि बताने के लिए कहा गया।
उन्होंने अपनी मां से पूछा लेकिन उन्हें इसके बारे में पता नहीं था, उन्होंने अपने हीरो भगत सिंह के शहादत दिवस 23 मार्च को अपनी जन्मतिथि चुना और उसे फ़ॉर्म में लिखवा दिया, जब से अब तक 23 मार्च को ही उनका जन्मदिन मनाया जाता है।”
एक बार जवाहरलाल नेहरू भाषण देने सुरजीत के गांव आए, आम सभा से एक दिन पहले पुलिस ने सभास्थल को अपने कब्ज़े में ले लिया। सुरजीत के खेतों में जौ की फसल लगी हुई थी, अगले दिन जब लोग सोकर उठे तो वहां शामियाना और दरियां बिछी देख कर हैरान रह गए। रात को ही सुरजीत ने आर्थिक नुक़सान की परवाह न करते हुए फसल को उजाड़ कर खेतों को समतल कर दिया था ताकि वहां आम सभा हो सके। वो आम सभा हुई और नेहरू ने ज़बरदस्त भाषण दिया।
सुरजीत की सरलता और स्पष्टवादिता उन्हें अन्य भारतीय नेताओं से अलग करती थी, उनके खरेपन का स्वाद तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव ने चखा था। येचुरी याद करते हैं, “1987 में रूसी क्रांति की 70वीं वर्षगांठ के मौके पर दुनिया भर के कम्युनिस्ट नेता मॉस्को में एकत्रित हुए थे।
मिखाई गोर्बाचोव की उनके सामने ही कर दी थी आलोचना
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भोज के समय जब उनका परिचय गोर्बाचोव से कराया जा रहा था तो उन्होंने नंबूदरीपाद और मेरे सामने उनसे कहा था कि उनका सिद्धांत ग़लत है और वो आने वाले दिनों में कम्युनिस्ट आंदोलन को पूरी दुनिया में पटरी से उतार देगा। वहां मौजूद कई कम्युनिस्ट नेता इसी तरह की सोच रखते थे लेकिन ऐसा कह पाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। गोर्बाचोव सुरजीत की बात सुन कर अवाक रह गए थे और अपना सिर हिलाने लगे थे।”
कम उम्र में ही सुरजीत की शादी प्रीतम कौर से हो गई थी। सुरजीत जब अपनी मां के साथ दुल्हन को घर ला रहे थे तो पुलिस को उनके आने की भनक लग गई। सुरजीत की पत्नी प्रीतम कौर जो इस समय 92 साल की हैं, याद करती हैं, “शादी के बाद हम लोग तांगे से घर लौट रहे थे।
गांव का रास्ता 12-15 किलोमीटर का था, रास्ते में पुलिस उन्हें पकड़ने आ गई। उन्होंने कहा आज ही हमारी शादी हुई है, आप इतनी इजाज़त दे दीजिए कि मैं अपनी घरवाली को घर छोड़ कर आ जाऊं। मुझे घर छोड़ने के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया, कुछ दिनों बाद जब मैं उनसे मिलने जेल गई तो वो मुझे पहचान ही नहीं पाए। मेरी ननद ने उन्हें बताया कि मैं उनकी पत्नी हूं।”
1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद जब क्यूबा की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई तो उन्होंने पार्टी की तरफ़ से क्यूबा को दस हज़ार टन गेहूं भिजवाने का बीड़ा उठाया।
बुरे वक्त में क्यूबा भिजवाया था दस हजार टन गेहूं
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सीताराम येचुरी याद करते हैं, “ये काम कामरेड सुरजीत ही कर सकते थे, उन्होंने जब देखा कि सोवियत संघ बिखर गया है। क्यूबा की स्थिति बहुत गंभीर थी क्योंकि उनकी पूरी अर्थव्यवस्था सोवियत संघ पर निर्भर थी। क्यूबा के ऊपर प्रतिबंध लगा हुआ था जिसके कारण वो अपना सामान दुनिया में कहीं और नहीं भेज सकते थे। उस समय उन्हें मदद की सख़्त ज़रूरत थी, उनके पास नहाने के लिए साबुन नहीं था और न ही खाने के लिए गेहूं।”
येचुरी आगे बताते हैं, “कामरेड सुरजीत ने ऐलान कर दिया कि वो दस हज़ार टन गेहूं क्यूबा को भेजेंगे, उन्होंने लोगों से अनाज जमा किया और पैसे जमा किए। उस ज़माने में नरसिम्हा राव की सरकार थी। उनके प्रयासों से पंजाब की मंडियों से एक विशेष ट्रेन कोलकाता बंदरगाह भेजी गई। मुझे अभी तक याद है उस शिप का नाम था कैरिबियन प्रिंसेज़।
उन्होंने नरसिम्हा राव से कहा कि हम दस हज़ार टन गेहूं भेज रहे हैं तो सरकार भी इतने का ही योगदान दे, सरकार ने भी इतना ही गेहूं दिया। उसके साथ दस हज़ार साबुन भी भेजे गए. वहां पर जब वो पोत पहुंचा तो उसे रिसीव करने के लिए फ़ीदेल कास्त्रो ने ख़ास तौर से सुरजीत को बुलवाया। उस मौके पर कास्त्रो ने कहा कि सुरजीत सोप और सुरजीत ब्रेड से क्यूबा ज़िंदा रहेगा कुछ दिनों तक।”
सुरजीत की पत्नी प्रीतम कौर याद करती हैं कि उन्हें सिर्फ़ पढ़ने लिखने का शौक था। फ़िल्में वगैरह वो नहीं देखते थे, वो बताती हैं, “एक ही फ़िल्म मुझे याद है जो मैंने उनके साथ देखी थी और वो थी मदर इंडिया। एकाध बार वो मुझे विदेश लेकर ज़रूर गए थे, मुझे याद है एक बार हम चीन गए थे और एक बार स्वीडन।
उनके पास एक छोटा रेडियो हुआ करता था जिससे वो दिन में दो बार बीबीसी रेडियो सुना करते थे।” 1996 में जब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने उसका समर्थन किया था। लेकिन जब पार्टी में उसका विरोध हुआ तो उन्होंने अपनी राय उसके ऊपर थोपी नहीं।
ज्योति बसु को पीएम न बनाए जाने के पार्टी के फैसले से थे नाराज
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सीताराम येचुरी याद करते हैं, “यूएफ़ की मीटिंग से लौट कर सुरजीत ने कहा कि ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का एक मत से प्रस्ताव आया है। उनका मानना था कि हमें ये प्रस्ताव मान लेना चाहिए लेकिन सेंट्रल कमेटी ने तय किया कि हमें ये प्रस्ताव नहीं मानना चाहिए।
जब सुरजीत इस फ़ैसले की सूचना देने यूएफ़ की बैठक में गए तो मुझे भी अपने साथ ले गए। जब हम कर्नाटक भवन पहुंचे तो वहां मौजूद सब लोग ये सुन कर बहुत नाराज़ हुए। वो सुरजीत और बसु से कुछ कह नहीं सकते थे।
इसलिए उन्होंने सारा ग़ुस्सा मुझ पर उतारा और मुझे काफ़ी गालियां पड़ीं।” येचुरी आगे बताते हैं, “उन्होंने कहा इस फ़ैसले पर दोबारा विचार हो, हम दोबारा सेंट्रल कमेटी के पास आए। जब तक बहुत से लोग जा चुके थे लेकिन उन्होंने दोबारा कहा कि ज्योति बसु को प्रधानमंत्री का पद नहीं संभालना चाहिए। जाहिर है ये दोनों इस फ़ैसले से खुश नहीं थे लेकिन उन्होंने कम्युनिस्ट सिपाही की तरह उस फ़ैसले को माना।”
पार्टी के इतने बड़े पदों पर काम करने और किंग मेकर की भूमिका निभाने के बावजूद सुरजीत अंत तक एक साधारण किसान की तरह रहे। सीताराम येचुरी को उनके साथ कई बार विदेशों में सम्मेलनों में भाग लेने जाना होता था।
येचुरी कहते हैं, “वो रोज़ सुबह मेरा दरवाज़ा खटखटा कर कहते थे कि चाय तैयार है जिसे वो गीज़र के पानी से टी बैग डाल कर खुद तैयार करते थे। सुबह की चाय के बिना उनका सिस्टम काम नहीं करता था और इस चाय पर ही हम लोग दिन भर के कामों की योजना बनाते थे।”