राकांपा नेता ने कहा कि मैं और मनमोहन सिंह कृषि क्षेत्र में कुछ सुधार लाना चाहते थे, लेकिन वैसे नहीं जिस प्रकार से वर्तमान सरकार लाई। उस समय कृषि मंत्रालय ने प्रस्तावित सुधार के बारे में सभी राज्यों के कृषि मंत्रियों और क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ चर्चा की थी।
उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों के मंत्रियों को सुधार को लेकर काफी अपत्तियां थीं और अंतिम निर्णय लेने से पहले कृषि मंत्रालय ने राज्य सरकारों के विचार जानने के लिए कई बार पत्र लिखे। दो बार कृषि मंत्रालय का दायित्व संभालने वाले पवार ने कहा कि कृषि ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ा होता है और इसके लिये राज्यों के साथ विचार-विमर्श करने की जरूरत होती है।
पवार ने कहा कि कृषि से जुड़े मामलों से दिल्ली में बैठकर नहीं निपटा जा सकता है, क्योंकि इससे गांव के परिश्रमी किसान जुड़े होते हैं और इस बारे में बड़ी जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होती है। इसलिए अगर बहुसंख्य कृषि मंत्रियों की कुछ आपत्तियां हैं तो आगे बढ़ने से पहले उन्हें विश्वास में लेने और मुद्दों का समाधान निकालने की जरूरत है।
पवार ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने इस बार न तो राज्यों से बात की और विधेयक तैयार करने से पहले राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ कोई बैठक बुलाई। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने कृषि संबंधी विधेयकों को संसद में अपनी ताकत की बदौलत पारित कराया और इसलिए समस्या उत्पन्न हो गई।
पवार ने कहा कि राजनीति और लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को इन कानूनों को लेकर किसानों की आपत्तियों को दूर करने के लिए बातचीत करनी चाहिए थी।
पवार ने कहा कि लोकतंत्र में कोई सरकार यह कैसे कह सकती है कि वह नहीं सुनेगी या अपना रुख नहीं बदलेगी। एक तरह से सरकार ने इन तीन कृषि कानूनों को थोपा है। अगर सरकार ने राज्य सरकारों से विचार-विमर्श किया होता और उन्हें विश्वास में लिया होता तब ऐसी स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
उन्होंने कहा कि किसान परेशान है क्योंकि उन कानूनों से एमएसपी खरीद प्रणाली समाप्त हो जाएगी और सरकार को इन चिंताओं को दूर करने के लिए कुछ करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए शीर्ष स्तर से भाजपा के उन नेताओं को रखना चाहिए, जिन्हें कृषि क्षेत्र के बारे में बेहतर समझ हो। कृषि क्षेत्र के बरे में गहरी समझ रखने वाले किसानों के साथ बातचीत करेंगे तब इस मुद्दे के समाधान का रास्ता निकाला जा सकता है। उन्होंने हालांकि किसी का नाम नहीं लिया।
पवार ने कहा कि अगर किसान सरकार की प्राथमिकता में होते तो यह समस्या इतनी लंबी नहीं खिंचती और अगर वे कहते हैं कि विरोध करने वालों में केवल हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान हैं, तब सवाल यह है कि क्या इन्होंने देश की संपूर्ण खाद्य सुरक्षा में योगदान नहीं दिया है।