भारत-ईरान ने सोमवार को बहुप्रतिक्षित चाबहार बंदरगाह समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के तहत ईरान का यह बंदरगाह 10 वर्ष के पट्टे पर भारत को मिला है। इस अवधि में भारत इसका विकास-संचालन करेगा। इसे लेकर भारत-ईरान के बीच अटल सरकार के दौर में वार्ता शुरू हुई थी, जिसे दो दशक बाद मोदी सरकार ने अमलीजामा पहनाया।
चाबहार बंदरगाह के संचालन का अनुबंध भारत के लिए उपलब्धि
म्यांमार में सितवे बंदरगाह के उद्घाटन के बाद चाबहार बंदरगाह के संचालन का अनुबंध समुद्री क्षेत्र में भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के तौर पर देखा जा है। इस अनुबंध के जरिए दोनों देशों का उद्देश्य समुद्री क्षेत्र में चीनी उपस्थिति को बेअसर करना है। बता दें कि सर्वानंद सोनोवाल ने पिछले साल मई में म्यांमार के सितवे बंदरगाह का उद्घाटन किया था।
ईरान के चाबहार बंदरगाह को भारत की कनेक्टिविटी पहल के प्रमुख घटक के तौर पर देखा जाता है। यह भारत, अफगानिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के बीच व्यापार का छोटा मार्ग प्रदान करेगा। भारत का लक्ष्य सीआईएस (स्वतंत्र देशों का राष्ट्रमंडल) देशों तक पहुंचने के लिए चाबहार बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) के तहत आवाजाही का केंद्र बनाना है।
जयशंकर ने चाबहार बंदरगाह समझौते पर दी प्रतिक्रिया
केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चाबहार बंदरगाह समझौते को लेकर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा, "मेरे कैबिनेट सहयोगी सर्वानंद सोनोवाल आज ईरान जा रहे हैं। भारत और ईरान के बीच दीर्घकालिक समझौता देखने की उम्मीद है। हम यह उम्मीद करते हैं कि बंदरगाह के उस हिस्से से अधिक निवेश और कनेक्टिविटी मिलेगा। यह निश्चित रूप से एक अच्छी दिशा में जा रहा है।"
आईएनएसटीसी एक बहु-मॉडल परिवहन मार्ग है। यह हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को ईरान के जरिए कैस्पियन सागर और रूस के माध्यम से उत्तरी यूरोप से जोड़ता है। इस साल जनवरी में केंद्रीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी ने चाबहार बंदरगाह विकास योजना में तेजी लाने के लिए चर्चा की थी। इस बैठक में विदेश मंत्री जयशंकर ने ईरान के साथ सहयोग समझौते में रुचि दिखाई थी।