भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर उनके राजनीतिक विरोधी कभी-कभी यह कहकर निशाना साधते हैं कि वे एक 'तड़ीपार' नेता रह चुके हैं। उन्हें सोहराबुद्दीन मामले की जांच के समय गुजरात में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने कहा कि यह बिल्कुल गलत है। असलियत यह है कि अमित शाह ने खुद अदालत के सामने यह प्रस्ताव दिया था कि वे मामले की जांच होने तक राज्य से बाहर रहने के लिए तैयार हैं जिससे इस मामले की निष्पक्ष जांच की जा सके।
यह मामला एक बार तब फिर सुर्खियों में आ गया जब अदालत ने सोहराबुद्दीन मामले के फैसले में सीबीआई पर यह कठोर टिप्पणी कर दी कि यह मामला 'राजनीति से प्रेरित' था। सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी के पास मामले की जांच से पहले ही एक लिखित पटकथा मौजूद थी। अदालत ने 2010 में अमित शाह को जमानत दिये जाने के समय अदालत के द्वारा कहे गए शब्दों को दुहराया और कहा कि इस मामले को चलाने के पीछे राजनीतिक स्वार्थ छिपा हुआ था।
स्मृति इरानी ने मंगलवार को एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करने के दौरान यह कहा कि अदालत ने अमित शाह को राज्य से बदर (सामान्य भाषा में तड़ीपार) नहीं किया था। चूंकि अमित शाह इस मामले में पूरी तरह निर्दोष थे, इसलिए उन्हें खुद के निर्दोष साबित होने का पूरा भरोसा था और इसीलिए उन्होंने अदालत के सामने यह कहा था कि अगर अदालत चाहे तो वे इस मामले की जांच के दौरान राज्य से बाहर रहने को तैयार हैं जिससे कांग्रेस इस मामले की पूर्ण जांच करा सके।
दरअसल, सोहराबुद्दीन मामले में जज आफताब आलम की कोर्ट में सीबीआई ने यह मांग की थी कि अमित शाह को राज्य से बदर कर दिया जाए। जिससे वे इस मामले की जांच को प्रभावित न कर सकें। इसके बाद 2010 से 2012 के बीच कुछ समय के लिए उन्हें राज्य से बदर कर दिया गया था।
क्या सीबीआई अब गलत नहीं
राहुल गांधी ने अदालत के फैसले के बाद एक ट्विटर पोस्ट किया था। इसमें कहा गया था कि सोहराबुद्दीन और प्रजापति को किसी ने नहीं मारा। इसे सीधे अदालत की टिप्पणी से जोड़कर देखा गया। अगस्ता वेस्टलैंड मामले में मिशेल के ऊपर भी दबाव डालने के आरोप लगाए जा रहे हैं। लेकिन स्मृति इरानी ने इन आरोपों से साफ इनकार किया।
उन्होंने कहा कि सोहराबुद्दीन मामले में यह साफ हो गया है कि सीबीआई पर दबाव डाला गया था। राहुल गांधी को लगता है कि जिस तरह उन्होंने एजेंसी पर दबाव डाला था, उसी तरह दूसरी राजनीतिक पार्टियां भी दबाव डालती हैं। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि सभी दल कांग्रेस के समान व्यवहार नहीं करते हैं।