नरम पड़ने की वजह के पीछे पंजाब सरकार में पूर्व मंत्री रहे एक वरिष्ठ नेता का कहना है दरअसल जिस तरीके से हरसिमरत कौर बादल ने कृषि कानून के बिल मुद्दे पर भाजपा से न सिर्फ नाता तोड़ा था, बल्कि गठबंधन खत्म करके पंजाब में अलग चलने की घोषणा की थी वह राजनीतिक मायनों में अब अकाली दल को छोड़कर दूसरे अन्य राजनीतिक पार्टियों को माइलेज देने जैसा दिख रही है। यही वजह है कि इस संदेश से माना जा रहा है कि अकाली दल ने एक तरीके से अपरोक्ष रूप से संदेश देने की कोशिश की है कि वह केंद्र सरकार की बिल वापसी का समर्थन और धन्यवाद देती है। हालांकि राजनीतिक पार्टी अकाली दल का इस मामले में कोई भी भाजपा को समर्थन देने जैसा संदेश और इशारा सीधे तौर पर नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन श्री अकाल तख्त के जत्थेदार की ओर से आया बयान राजनीतिक हलकों में निश्चित तौर पर तमाम तरीके के मायने बताता है।
दलित सीएम बना कर कांग्रेस को मिला फायदा
दरअसल पंजाब में बीते कुछ समय से अचानक बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रम से पंजाब की पूरी राजनीति का सीन बदलने लगा है। पंजाब की राजनीति में दखल रखने वाली एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का कहना है कि जिस तरीके से अकाली दल और बसपा ने गठबंधन के बाद उप मुख्यमंत्री के पद पर दलित को बिठाने की बात की वह राजनीति की एक बड़ी चाल थी। वह सवाल उठाते हुए कहती हैं कि पंजाब में कांग्रेस ने चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर दलित राजनीति में एक बड़ा दांव खेला है और उसका फायदा पंजाब में होता हुआ उनको दिख रहा है। उनका कहना है सिर्फ दलित मुख्यमंत्री बनने से ही पंजाब में कांग्रेस को बढ़त नहीं मिल रही बल्कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली और कार्यप्रणाली से भी चीजें बदलती हुई नजर आ रही हैं।
पूर्व मंत्री का कहना है कि ऐसे दौर में अकाली-भाजपा गठबंधन की कोई भी हैसियत पंजाब में नहीं दिखती और भाजपा तो कहीं पर स्टैंड भी नहीं करती है। वह कहती हैं कि जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी और बसपा ने सूबे का सबसे बड़ा पद दलित को न देने की बजाय उप मुख्यमंत्री बनाए जाने का वादा किया है, वह दर्शाता है कि उनकी प्राथमिकता में दलित कहीं पर नहीं टिकते हैं। अकाली और बसपा महज वोट लेने के लिए उपमुख्यमंत्री जैसे पद पर दलित को बिठाने की बात कर रही है। भाजपा तो हमेशा से अकालियों के साथ रही है कि ऐसे में उनकी भी प्राथमिकता में दलित कभी शामिल नहीं हुए।
पूर्व मंत्री कहती हैं कि दरअसल अकाल तख्त के जत्थेदार की ओर से दिया गया यह बयान निश्चित तौर पर यह इशारा करता है कि अकाली दल बैकफुट पर है और अब अकाली दल भाजपा से देर-सवेर गठबंधन की राह पर भी चलेगा। हालांकि वह कहती हैं अब इससे किसी भी तरीके का कोई राजनीतिक फायदा उनको मिलता हुआ नहीं दिखता। क्योंकि किसानों के लिए भाजपा और अकाली दल क्या राय रखते हैं या उनके बारे में क्या सोचते हैं यह स्पष्ट हो चुका है। उनके मुताबिक किसी कानून के वापस होने से कुछ नहीं होने वाला है जब तक कि प्रधानमंत्री किसानों के दूसरे मुद्दे पर सब कुछ साफ नहीं कर देते।