अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर थीं। वह 1958 में दिल्ली की मेयर बनी थीं। बताया जाता है कि अरुणा शहरवासियों की समस्याओं को सुनने के लिए तांगे पर ही दिल्ली घूमती थीं। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका अरुणा आसफ अली का राजनीतिक सफर हर भारतीय महिला के लिए मिसाल है। महिला दिवस के अवसर पर जानिए अरुणा आसफ अली की कहानी...
परिवार की मर्जी के खिलाफ शादी की और आजादी की लड़ाई में कूद पड़ीं
अरुणा गांगुली ने 1928 में परिवार के विरुद्ध जाकर कांग्रेसी नेता आसफ अली से विवाह किया। उस वक्त अरुणा की उम्र 23 साल थी। शादी के बाद अरुणा पति के साथ स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में जुट गईं और जेल भी काटी।नमक सत्याग्रह के दौरान अरुणा सार्वजनिक सभाओं में सक्रिय रहीं और जुलूस निकाले। इस पर उन्हें एक साल की जेल भी हुई। यह 1930 की बात है। जब गांधी- इरविन समझौते के तहत सभी राजनीतिक बंदियों को जेल रिहा किया जा रहा था उस वक्त अरुणा जेल में ही थीं। ब्रिटिश सरकार उन्हें जेल से रिहा नहीं करना चाहती थी लेकिन जब उनके समर्थन में आंदोलन हुआ तो अंग्रेजों को मजबूरन उन्हें जेल से छोड़ना पड़ा।
1932 में ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को फिर से बंदी बना लिया और तिहाड़ जेल भेज दिया। भूख हड़ताल करने पर अरुणा को अंबाला में एकांत कारावास में डाल दिया गया। इस तरह अंग्रेजों ने उन्हें काफी वक्त तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम से दूर रखा।
1958 में बनीं दिल्ली की पहली महिला मेयर
1958 में अरुणा दिल्ली की पहली महिला मेयर बनीं। 1948 में अरुणा कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं। दो साल बाद 1950 में अरुणा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बनीं। कम्युनिस्ट पार्टी से मोह भंग होने के बाद 1956 में अरुणा ने पार्टी छोड़ दी। 1975 में अरुणा को लेनिन शांति पुरस्कार दिया गया। 1996 में 87 साल की उम्र में अरुणा का देहांत हो गया।