केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में कमांडेंट के पद पर आईपीएस को लगाने का चलन अब नहीं है। खासतौर पर बीएसएफ और सीआरपीएफ में डीआईजी के पद से आईपीएस की प्रतिनियुक्ति शुरू होती है। आईपीएस और सीएपीएफ के कैडर अधिकारियों के बीच पदोन्नति को लेकर कई वर्षों तक विवाद चला है। इस बाबत दोनों पक्ष, सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचे हैं। इसके बावजूद सीएपीएफ के कैडर अधिकारी पदोन्नति में पिछड़ रहे हैं। आईपीएस अधिकारी कहते हैं कि अखिल भारतीय सेवा के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप, हमें सीएपीएफ में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मिलती है। यह प्रावधान सीएपीएफ के भर्ती नियमों में है।
60 के दशक में शुरू हुई थी प्रक्रिया
इस संबंध में सीएपीएफ अफसर कहते हैं, आईपीएस की प्रतिनियुक्ति के प्रावधान केवल इस कारण से आस्तित्व में आए थे, क्योंकि पूर्व के दशकों में केंद्रीय बलों के वरिष्ठ पदों को भरने के लिए पर्याप्त कैडर अधिकारी नहीं थे। इन बलों में अधिकारियों की भर्ती 60 के दशक में आरंभ हुई थी। जहां तक भर्ती नियमों का प्रश्न है, तो ये स्वयं आईपीएस अधिकारियों ने ही बनाए हैं। एक पूर्व आईपीएस के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा का हिस्सा होने के कारण आईपीएस, लीडरशिप वाली जगह पर होते हैं। वह चाहे केंद्र, राज्य या सीएपीएफ हो। आईपीएस ने डीआईजी व कमांडेंट के पद पर आना कम किया तो सीएपीएफ अफसरों को आगे बढ़ने का मौका मिल गया।
आईपीएस कहते हैं कि हमारे लिए केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का प्रावधान सीएपीएफ के भर्ती नियमों में है। इसके चलते केंद्र एवं राज्य सुरक्षा बलों में बेहतर तालमेल बना रहता है। दूसरी तरफ, सीएपीएफ के कैडर अफसरों का तर्क है, केंद्रीय पुलिस बल सरदार पटेल की परिकल्पना थी। शुरू में आईपीएस प्रतिनियुक्ति पर आए, क्योंकि पूर्व के दशकों में केंद्रीय बलों में वरिष्ठ पदों को भरने के लिए अधिकारी नहीं थे। सीएपीएफ का पक्ष है कि वे कोर्ट में इसलिए नहीं गए कि आईपीएस की प्रतिनियुक्ति बंद हो। कोर्ट ने सीएपीएफ को 1986 से संगठित सेवा का दर्जा दिया है, जिसे आज तक पूर्णता के साथ लागू नहीं किया जा सका। सीएपीएफ के कैडर अफसरों का आरोप है कि आईपीएस इस राह में बाधा पैदा कर रहे हैं। 2008 में गृह मंत्रालय के एसएसआईएस जो कि आईपीएस थे, उन्होंने माना कि यदि सीएपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिला तो आईपीएस आईजी रैंक तक प्रतिनियुक्ति पर नही जा सकेंगे।
120 पद 10 साल से खाली
सीएपीएफ के भर्ती नियमों में 20 से 25 फीसदी डीआईजी, 50 फीसदी आई एवं 75 फीसदी एडीजी रैंक के पदों पर आईपीएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार 01/01/2006 से एनएफएफयू केवल ओजीएएस के लिए लागू किया गया था। सीएपीएफ के राजपत्रित अधिकारियों ने इसका लाभ पाने के लिए खुद को ओजीएएस घोषित करने की मांग की। इनकी प्रबंधन क्षमता बनाये रखने के लिए सरकार ने इसे स्वीकार नही किया। कैडर अफसरों का तर्क था कि अदालत ने इस संबंध में स्पष्ट निर्णय दे दिया था। एनएफएफयू भी 2006 से लागू है, यह विचारणीय है कि क्या एक ही आदेश के तहत दो प्रकार के एनएफएफयू लागू किए जा सकते हैं, जैसा कि सीएपीएफ अधिकारियों के साथ किया जा रहा है।
जोखिम वाली लंबी ड्यूटी अनुभव के चलते वे अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं, क्या उन्हें उच्च पदों पर पदोन्नति का अधिकार नहीं है। सीएपीएफ में डीआईजी आईपीएस के लिए आरक्षित लगभग 120 पद 10 वर्ष से भी अधिक समय से खाली पड़े रहे हैं। कैडर अधिकारी 29-30 वर्ष की सेवा करने के बाद भी डीआईजी पद पर पदोन्नति का इंतजार करते हैं। सीएपीएफ कैडर अधिकारियों का कहना है कि किसी भी सेवा की किन्ही परिस्थिति में बदलाव होने पर यह आवश्यक है कि उसके सेवा नियमों व भर्ती नियमों में बदलाव किया जाए। सीएपीएफ के मामले में ऐसा नही किया जा रहा है। हमारे लिए न सर्विस नियम और न ही भर्ती नियम बदल रहे हैं।